खाद के आने वाले संकट से कैसे निपटें

Edited By Updated: 07 Jun, 2022 05:46 AM

how to deal with the impending manure crisis

खाद का संकट आने वाला है। इस खरीफ की बुवाई के समय संकट से बच भी गए तो रबी की फसल आते-आते तो निश्चित ही देश में डी.ए.पी. और पोटाश की किल्लत होने की आशंका है। ऐसे में हाय-तौबा मचेगी, अखबारों में किसानों के रोष की खबरें छपेंगी, फिर

खाद का संकट आने वाला है। इस खरीफ की बुवाई के समय संकट से बच भी गए तो रबी की फसल आते-आते तो निश्चित ही देश में डी.ए.पी. और पोटाश की किल्लत होने की आशंका है। ऐसे में हाय-तौबा मचेगी, अखबारों में किसानों के रोष की खबरें छपेंगी, फिर सुबह 3 बजे से किसान खाद के लिए लाइनों में खड़े पाए जाएंगे। यह संकट सिर्फ इस साल का नहीं है। आने वाले सालों में यह संकट और गहरा होगा। कुछ दिन पहले ‘रूरल वॉयस’ और सोक्रेटस संस्थाओं ने एक परिचर्चा में इस संकट की तरफ देश का ध्यान खींचा। सवाल है कि क्या हम अभी से इस संकट के तात्कालिक और दीर्घकालिक समाधान पर काम करना शुरू करेंगे, या फिर आग देखने के बाद ही कुआं खोदना शुरू करेंगे? 

खाद के संभावित संकट का तात्कालिक कारण यूक्रेन का युद्ध है। हम रासायनिक खाद के लिए लगभग विदेश से आयात पर निर्भर हैं। हमारा 100 प्रतिशत पोटाश, 55 प्रतिशत डी.ए.पी. और 30 प्रतिशत यूरिया सीधा विदेश से आयात किया जाता है। जो यूरिया हमारे यहां बनता है, वह भी विदेश से आयातित गैस से बनता है। इस युद्ध के चलते रूस से खाद की सप्लाई कम हो गई है, चीन ने अपने भंडार भरने शुरू किए हैं और बाहर खाद का निर्यात कम कर दिया है। दीर्घकाल में तेल और प्राकृतिक गैस की सप्लाई कम होने से यूरिया का संकट भी गहरा होगा। फिलहाल  यूरिया तो जरूरत भर का है, लेकिन डी.ए.पी. जरूरत से एक चौथाई और पोटाश तथा एन.पी.के. तो जरूरत का एक दशांध ही स्टॉक में है। यदि तुरंत आयात न किया तो संकट अनिवार्य है। 

आयात में सरकार हाथ रोक कर बैठी है। युद्ध की वजह से पैट्रोलियम पदार्थों और खाद के दाम चढ़ गए हैं। इसके चलते सरकार खाद कंपनियों को जो अनुदान देती है, उसका खर्चा बढ़ गया है। वित्त मंत्री ने पिछले बजट में खाद की सबसिडी के लिए 1.05 लाख करोड़ रुपए रखे थे, लेकिन आज के दाम के हिसाब से यह खर्च दोगुने से ज्यादा यानी 2.1 से 2.3 लाख करोड़ रुपए तक जाएगा। इसलिए सरकार खाद के आयात को हतोत्साहित कर रही है। संकट आसन्न है, लेकिन सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है। 

जाहिर है कुछ समय बाद जब संकट सामने आ खड़ा होगा, तब सबका ध्यान तात्कालिक समाधान की तरफ जाएगा। खाद की कालाबाजारी रोकने के लिए आदेश दिए जाएंगे। खाद वितरण के लिए पुलिस प्रशासन की मदद ली जाएगी। किसानों को खाद कम इस्तेमाल करने के उपदेश दिए जाएंगे। रातों-रात गोबर और गौमूत्र की महिमा का बखान शुरू होगा। लेकिन सरकार चाहे तो इस तात्कालिक संकट से निपटने के लिए कुछ कदम अभी से उठाए जा सकते हैं। विदेश मंत्रालय और वाणिज्य मंत्रालय को अभी से खाद आयात की संभावनाओं को तलाश करना होगा। अभी से डी.ए.पी. और पोटाश की जगह सिंगल सुपर फास्फेट (एस.एस.पी.) और अन्य मिश्रण का प्रचार-प्रसार करना होगा। जमीन में छिड़कने की बजाय खाद को स्प्रे करने जैसे तरीकों को बढ़ावा देना होगा जिससे उसकी खपत कम हो। लेकिन यह संकट इतना बड़ा है कि हमें तात्कालिक समाधान से आगे सोचना होगा।

संकट सिर्फ यह नहीं है कि रासायनिक खाद की सप्लाई कम है और दाम ज्यादा। असली संकट यह है कि रासायनिक खाद अपने आप में समस्या बन गई है। रासायनिक खाद के अत्यधिक प्रयोग के चलते हमारी मिट्टी की गुणवत्ता कम हो रही है, खाने में जहर बढ़ रहा है और ये रसायन हमारी हवा, पानी में घुल रहे हैं। सरकार द्वारा सॉयल हैल्थ कार्ड के लिए किए गए टैस्ट से पता लगता है कि देश में 97 प्रतिशत मिट्टी के सैंपल में नाइट्रोजन की कमी है, 83 प्रतिशत में फास्फोरस की, 49 प्रतिशत में ऑर्गैनिक कार्बन की कमी है। पंजाब और हरियाणा में तो मिट्टी के 99 प्रतिशत सैंपल में ऑर्गैनिक कार्बन की कमी है। मतलब यह कि देर-सवेर हमें रासायनिक खाद के इस्तेमाल को कम करना पड़ेगा, लेकिन इस तरह से कि उत्पादन पर असर न पड़े। 

इस दिशा में 3 बड़े कदम उठाने की जरूरत है। पहला तो सरकार को रासायनिक खाद की सबसिडी कंपनियों को न देकर सीधे किसानों को देनी चाहिए। इस वर्ष खाद पर सबसिडी के 2 लाख करोड़ रुपए के बजट को अगर देश के कुल 40 करोड़ एकड़ खेतों में बांट दिया जाए तो हर किसान को हर साल प्रति एकड़ खाद की 5000 रुपए सबसिडी दी जा सकती है। लेकिन इस सबसिडी को रासायनिक खाद की खरीद से न जोड़ा जाए। यानी यह फैसला किसान पर छोड़ दिया जाए कि वह रासायनिक खाद डालना चाहता है या नहीं और कितनी। ऐसा करते ही रासायनिक खाद का उपयोग अपने आप घट जाएगा। 

दूसरा कदम है ऐसी फसलों को प्रोत्साहित करना जो कम खाद की मांग करती हैं और जिनसे मिट्टी की गुणवत्ता सुधरती है। हमारे देश में गन्ना, आलू और कपास जैसी फसलों में सबसे ज्यादा खाद लगती है, लेकिन चना, मूंग, मसूर जैसी दालों और ज्वार, बाजरा जैसे मोटे अनाज में कम रासायनिक खाद लगती है। अगर किसान को इन फसलों पर भी उचित दाम मिलना शुरू हो तो वह खुशी से इन फसलों की तरफ रुख करेंगे और खाद की मांग अपने आप घट जाएगी। तीसरा कदम होगा देश में जैविक खाद को बड़े पैमाने पर प्रोत्साहन देना। इसमें अनेक विकल्प हैं।

गोबर और गौमूत्र के अलावा पराली, फसल के अन्य अवशेष, जलकुंभी, राख, केंचुए, जानवरों की हड्डी, रसोई के कूड़े की कंपोस्ट और बायोगैस जैसे अनेक तरीकों से बहुत सस्ते में खाद बनाई जा सकती है। पिछले कुछ वर्षों से सरकार ने प्राकृतिक खेती की बात तो शुरू की, लेकिन व्यवहार में जीरो बजट फार्मिंग का मतलब सरकार का जीरो बजट हो जाता है। अब सरकार के पास जैविक खाद को प्रोत्साहन देने की योजनाएं भी हैं और नियम भी, लेकिन पैसा नहीं है। 

रासायनिक खाद बनाने वाली कंपनियों को लाखों करोड़ का अनुदान मिलता है, लेकिन प्राकृतिक खेती पर उसका 1 प्रतिशत भी खर्च नहीं होता। हाल ही में सैंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमैंट ने ‘स्टेट ऑफ बायो फॢटलाइजर एंड ऑर्गैनिक फर्टिलाइजर्स इन इंडिया’ नामक रिपोर्ट में इस दिशा में कई अच्छे सुझाव दिए हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि इस वर्ष रासायनिक खाद की कमी जैविक खाद के विषय में राजनीतिक इच्छा की कमी को पूरा करेगी।-योगेन्द्र यादव

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