प्रकृति के संरक्षण से ही बचेगा जीवन

Edited By Updated: 28 Jul, 2026 04:07 AM

only by conserving nature can life be saved

बदलते हुए समय में हम प्रकृति और पर्यावरण का महत्व तो समझ गए हैं लेकिन गंभीरता के साथ प्रकृति को संरक्षित करने के प्रयास नहीं कर रहे। हमें यह समझना होगा कि प्रकृति हमारे जीवन का आधार है। खिलते हुए फूल, सुहानी हवा, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु, ऊंचाई से गिरते...

बदलते हुए समय में हम प्रकृति और पर्यावरण का महत्व तो समझ गए हैं लेकिन गंभीरता के साथ प्रकृति को संरक्षित करने के प्रयास नहीं कर रहे। हमें यह समझना होगा कि प्रकृति हमारे जीवन का आधार है। खिलते हुए फूल, सुहानी हवा, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु, ऊंचाई से गिरते झरने, बहता हुआ पानी, नदियां व पहाड़, सूरज, चांद और तारे, ये सब प्रकृति के ही अवयव हैं। संसार का अधिकांश साहित्य प्रकृति, प्रेम और सौन्दर्य को विषय बनाकर ही रचा गया है। प्रकृति हमें एक नया सौन्दर्यबोध प्रदान करती है। धरती को सौन्दर्य प्रदान करने में प्रकृति ने अतुलनीय योगदान दिया है। पेड़-पौधे, फूल-पत्तियां, झरने और पहाड़ धरती के आभूषण ही हैं। कल्पना कीजिए कि इन आभूषणों से रहित धरती हमें कैसी दिखाई देगी। यह हम सबका कत्र्तव्य है कि हम धरती के इन आभूषणों की चमक फीकी न पडऩे दें। हमें यह समझना होगा कि यह धरती सुन्दर रहेगी तो हमारा जीवन भी सुन्दर रहेगा। 

सवाल यह है कि हमसे प्यार करने और हमारे अन्दर प्रेम के बीज अंकुरित करने वाली प्रकृति से क्या हम प्यार करते हैं? शायद नहीं। तभी तो हम प्रकृति के प्रति पत्थर दिल हो गए हैं। कभी हम प्रकृति के विभिन्न अवयवों का क्षरण कर प्रदूषण बढ़ाते हैं, तो कभी जलवायु परिवर्तन के लिए स्वयं जिम्मेदार होते हुए भी प्रकृति को कोसते हैं। यह दुखद है कि कभी धरती का बढ़ता हुआ तापमान प्रकृति को जख्म दे रहा है तो कभी हमारा व्यवहार प्रकृति के जख्मों को कुरेद रहा है। कुल मिलाकर हम उसी प्रकृति से बेवफाई कर रहे हैं जो हमें हमेशा वफा की सीख देती है।

विभिन्न अध्ययनों के माध्यम से यह बात सामने आती है कि प्रदूषण और धरती का तापमान बढऩे के कारण सम्पूर्ण विश्व को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। इन समस्याओं में सूखा, बाढ़, ग्लेशियरों का पिघलना, समुद्र का स्तर बढऩा, अनेक जीव-जन्तुओं और पेड़-पौधों का विलुप्त होना आदि शामिल हैं। विचारणीय प्रश्न यह है कि जब हम इन प्राकृतिक समस्याओं से जूझने में व्यस्त होंगे तो प्यार के बारे में सोचने की फुर्सत किसे होगी? हालांकि प्राचीन समय में हमने प्रकृति से कई रिश्ते जोड़े। प्रकृति के विभिन्न अवयवों को हमने अपने परिवार की तरह माना। प्रकृति के इन अवयवों को हमने ईश्वर का दर्जा भी दिया। तभी तो हम आज तक धरती को धरती माता, तुलसी को तुलसी माता, गाय को गाय माता, सांप को नाग देवता, गंगा को गंगा मैया, चांद को चंदा मामा तथा सूरज को सूर्य देवता कह रहे हैं। क्यों न हम इस दौर में इसी शृंखला को आगे बढ़ाते हुए प्रकृति से प्यार का एक नया रिश्ता जोड़ें। जैसे एक स्त्री मां, बहन, पत्नी और बेटी, किसी भी रूप में हमारे सामने हो सकती है, उसी तरह प्रकृति भी विभिन्न रूपों में हमारे सामने हो सकती है। 

प्रकृति मानसिक तनाव दूर करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। चिकित्सक भी मानसिक तनाव दूर करने के लिए हमें प्रकृति के बीच रहने की सलाह देते हैं। यह दुखद ही है कि प्रकृति जो शान्ति हमें प्रदान करना चाहती है, हम अपने व्यवहार से उस शान्ति को भंग कर देना चाहते हैं। मानसिक तनाव का एक बड़ा कारण यह भी है कि इस दौर में हम लगातार प्रकृति से दूर होकर यांत्रिक होते जा रहे हैं। प्रकृति से दूर होना हमें भावनात्मक स्तर पर भी कमजोर कर रहा है। महानगरों में निवास करने वाले लोग तो कई-कई दिनों तक प्रकृति के दर्शन ही नहीं कर पाते। सुबह फ्लैट से बाहर निकलकर जाम से जूझते हुए कार्यालय पहुंचना तथा शाम को पुन: जाम से जूझते हुए घर पहुंचना उनकी नियति बन गई है।

ऐसी स्थिति में शरीर के अन्दर पहुंची प्रदूषित वायु जीवन की लय बिगाड़ देती है। जीवन की इस लय को सुधारने के लिए हम प्रकृति के सान्निध्य में समय बिताना चाहते हैं। यह प्रकृति की उदारता और सहिष्णुता ही है कि वह उसे जख्म देने वाले इन्सान को अपना सान्निध्य देकर उस पर सब कुछ लुटा देना चाहती है। जब हम चारों तरफ से हार मान जाते हैं, तो प्रकृति ही हमें आशा की किरण दिखाकर एक नई ऊर्जा देती है। प्रकृति का स्नेहिल और शीतल स्पर्श हमें अवसाद के गहन अन्धकार से बाहर निकालने में सहायता प्रदान करता है।

दरअसल हमने आज तक प्रकृति का ध्यान इसलिए नहीं रखा क्योंकि हम प्रकृति से प्यार का रिश्ता नहीं जोड़ पाए। आज प्रकृति को बचाने के लिए विभिन्न कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं लेकिन प्रकृति के जख्म बढ़ते ही जा रहे हैं। ये कार्यक्रम केवल कुछ लोगों की जेबें भर रहे हैं। इनके जरिए केवल औपचारिकता निभाई जा रही है। यही कारण है कि आज प्रकृति को बचाने के लिए हल्ला तो मच रहा है लेकिन उससे प्यार का रिश्ता कायम नहीं हो पा रहा। हालांकि प्रकृति के विभिन्न अवयवों के साथ हमारा रिश्ता लगातार बना रहता है। प्रकृति स्वस्थ होगी तो हम भी स्वस्थ होंगे। तो आइए प्रकृति से अपने प्यार के रिश्ते को और मजबूत करें।-रोहित कौशिक 
 

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