Edited By ,Updated: 22 Jul, 2026 04:59 AM

सागर किनारे खड़े होकर उसकी गहराई का पता नहीं लगाया जा सकता, समुद्र की गहराई तो उसमें डूब कर ही पता लगाई जा सकती है। उसी तरह प्रेम के ढाई आखर को समझने के लिए, प्रेम, प्यार को समझने के लिए गहन ङ्क्षचतन में डुबकी लगानी पड़ती है। प्रेम में है त्याग,...
सागर किनारे खड़े होकर उसकी गहराई का पता नहीं लगाया जा सकता, समुद्र की गहराई तो उसमें डूब कर ही पता लगाई जा सकती है। उसी तरह प्रेम के ढाई आखर को समझने के लिए, प्रेम, प्यार को समझने के लिए गहन चिंतन में डुबकी लगानी पड़ती है। प्रेम में है त्याग, नि:स्वार्थ की भावना, विशालता और उदारता। किसी में खो जाना, उसके प्रेम में डूब जाने का नाम ‘प्यार’ है। अपना कुछ नहीं, सब ‘तेरा’। तेरा तुझको सौंपिओ, क्या लागे है मेरा’ प्रेम की भावना में निहित है, ‘मैं नहीं तू’। ढाई आखर प्रेम के, जो पढ़े, सो पंडित होए। प्रेम एक गहरी अनुभूति है, जो लगाव, स्नेह, समर्पण और नि:स्वार्थ पर आधारित है। यह केवल एक भावना ही नहीं बल्कि एक मानसिक और आध्यात्मिक लगाव है। प्रेम एक भावनात्मक लगाव है। जब व्यक्ति अपने-आप को खो देता है, फिर वह स्वयं को पा लेता है। स्वयं को पा लेना ही प्रेम है।
प्रेम तीन प्रकार का होता है-प्रेम जो आकर्षण से पैदा होता है; जो सुख-सुविधा के लोभ से होता है तथा तीसरा है ‘दिव्य प्रेम’। जो प्रेम आकर्षण से पैदा होता है वह ‘क्षणिक’ है क्योंकि ऐसा प्रेम अज्ञान या ‘सम्मोहन’ के कारण पैदा होता है। ऐसे प्रेम से व्यक्ति का मोह जल्दी भंग हो जाता है क्योंकि आकर्षण स्थायी नहीं होता। आकर्षण खत्म तो प्रेम भी खत्म। जिस प्रेम में सुख-सुविधा मिलती है, वह मात्र घनिष्ठता है। ऐसे प्रेम में कोई जोश, उत्साह या आनंद नहीं रहता। सुख-सुविधा प्राप्त करना व्यक्ति की आदत बन जाती है। आदत में प्रेम नहीं होता।
‘दिव्य प्रेम’ रांझा ने किया। दोनों हीर और रांझा सात्विक रहे। सस्सी पुन्नू के प्यार में दीवानी बनी, मरुस्थलों में आहें भरती रही, सोहनी महिवाल के प्रेम में पक्के और कच्चे घड़े में अंतर ही न कर सकी और दरिया में डूब गई। साहिबां ने मिरजे-खान को अपने भाईयों से मरवा दिया परन्तु प्रेम में सात्विकता सभी प्रेमियों ने बनाए रखी। प्रेम में मीरा दीवानी हो गई। द्रौपदी ने संकट में अपने कृष्ण को पुकारा तो वह दौड़े चले आए। प्रेम राधा ने किया, इसलिए कृष्ण से पहले उसका नाम आया। गोपियां कृष्ण के साथ पहले रास-रचाती रहीं, फिर उनकी विरह में रोती रहीं। तुलसीदास प्रेम में संन्यासी हो गए और ‘रामचरित मानस’ की रचना कर अमर हो गए। प्रेम में कोई ताजमहल बना गया, कई रेल की पटरियों पर कट मरे। प्रेम में सोनम ने अपने प्रेमी की खातिर अपने नव-विवाहित पति को मरवा दिया। प्रेम में सिया गोयल ने अपने प्रेमी के लिए अपने करोड़पति मंगेतर को लोहागढ़ किले से धक्का देकर 400 फुट की गहरी खाई में धकेल दिया। यह प्रेम नहीं बदला है, इसमें घृणा है। प्रेम में घृणा तो पाप है। जिस प्यार में बदला लेने का भाव हो, ऐसा प्रेम समय के साथ दूषित हो जाता है।
दिव्य प्रेम तो आकाश जैसा विशाल और विस्तृत है। जैसे आकाश की कोई सीमा नहीं वैसे ही दिव्य प्रेम की कोई सीमा नहीं। जो ‘दिव्य प्रेम’ में रंग गया, उसके लिए सब तरफ हरा ही हरा है। दिव्य प्रेम में प्रकाश ही प्रकाश है। प्रेम किसी शब्दकोष में नहीं ढूंढा जा सकता। प्रेम को किसी परिभाषा में नहीं बांधा जा सकता। दिव्य प्रेम अनुभव से आता है। प्रेम एक आग है, जिस तरह सोना जितना ही अग्नि में डालते जाओ वह लगातार निखरता ही जाता है। उसी तरह प्रेम की अग्नि में जलकर व्यक्ति में शुद्धता आती है। प्रेम में व्यक्ति पाप रहित हो जाता है। मनुष्य में जो कुछ व्यर्थ है वह जल जाता है। धुल जाता है। प्रेम ही परमात्मा है। ‘जिन प्रेम कियो तिन ही प्रभ पायो।’ पापी-मनुष्य में प्रेम नहीं होता। प्यार की कमी के कारण ही समाज में अराजकता है। ङ्क्षहसा है। जहां प्रेम नहीं, वहां शांति नहीं। प्रेम जोड़ता है, तोड़ता नहीं। जैन धर्म के संस्थापक स्वामी महावीर जी ने कहा है कि अहिंसा का अर्थ है-प्रेम। बौद्धमत के संस्थापक महात्मा बुद्ध कहते हैं-करुणा का अर्थ है ‘प्रेम’। संत अगस्टाइन से किसी ने पूछा धर्म का अर्थ क्या है? संत ने उत्तर दिया, ‘प्रेम’ यानी बाकी चिंताएं आप छोड़ दो।
प्रेम की गैरमौजदूगी में पैदा होने वाले हिंसक होते हैं। उनके मन में सदा अंधेरा ही अंधेरा है। अंधेरे घर में चोर-लुटेरे सदा झांकते रहते हैं। सांप, बिच्छू, मकडिय़ां जाले बनाने लग जाती हैं। परन्तु यदि उस घर में प्रकाश हो तो ये सब जन्तु उस घर को धीरे-धीरे छोडऩे लगते हैं। अत: जिस व्यक्ति के मन में प्यार है, उसमें प्रकाश है, वहां से सब पाप भागने लगेंगे। प्रेम है ‘सृजन’, यदि व्यक्ति में सृजन नहीं, तो वह करेगा क्या? जीवन बर्बाद हो जाएगा। संत और शैतान में क्या भेद है? शैतान अपना जीवन बर्बाद कर रहा है और संत प्रेम में डूब कर ‘जीवन शक्ति’ का निर्माण करते हैं। यदि आप समाज को रहने योग्य बनाना चाहते हैं तो प्रेम करना सीखें। ‘दिव्य प्रेम’ में डूब जाओ। परमात्मा से प्रेम करोगे तो आपका जीवन ‘रंगीन’ हो जाएगा। प्रेम नहीं होगा तो संगीनें तनी रहेंगी। अत: प्रेम सागर में गोते लगाते रहो, आप सागर की गहराई पा लेंगे। प्रेम-विहीन जग जहन्नुम बन जाएगा। ‘दिव्य प्रेम’ से जुड़ जाओ। लोक-परलोक सुधर जाएगा।-मा. मोहन लाल (पूर्व परिवहन मंत्री, पंजाब)