पंजाब कांग्रेस बुरी तरह बिखराव की शिकार

Edited By Updated: 30 Jul, 2026 04:08 AM

punjab congress is facing severe disintegration

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की आलाकमान ने पंजाब के चुनावी कुरुक्षेत्र में उतरने से पहले कांग्रेस को  सुनियोजित, सुनिश्चित और सुसंगठित करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण कमेटियों का गठन किया, जिसमें अपने महारथियों और राजनीति में गहन तजुर्बा रखने वाले धुरंधर...

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की आलाकमान ने पंजाब के चुनावी कुरुक्षेत्र में उतरने से पहले कांग्रेस को  सुनियोजित, सुनिश्चित और सुसंगठित करने के लिए कुछ महत्वपूर्ण कमेटियों का गठन किया, जिसमें अपने महारथियों और राजनीति में गहन तजुर्बा रखने वाले धुरंधर नेताओं को जिम्मेदारियां सौंपीं, ताकि वे उन्हें खूबसूरत तरीके से सरअंजाम देकर  कांग्रेस को पंजाब में सत्तासीन कर सकें और  लोगों के जज्बात की तर्जुमानी करके पंजाब में शांति, समृद्धि और विकास की नीतियों को अमलीजामा पहना सकें। परंतु चंद रोज बाद पंजाब कांग्रेस के एक बड़े गुट ने सर्वसम्मति से यह फैसला लिया कि वह न तो प्रदेश प्रधान के नेतृत्व में विश्वास रखते हैं और न ही उसका समर्थन करेंगे। इस खबर ने पंजाब के अन्य नेताओं और कार्यकत्र्ताओं को मायूस ही नहीं किया, बल्कि उनकी आशाओं पर पानी फेर दिया। इससे स्पष्ट हो गया कि कांग्रेस बुरी तरह बिखराव की शिकार है। 

हकीकत में पंजाब कांग्रेस के लंबे इतिहास में पहली बार कांग्रेस के एक बड़े गुट ने आलाकमान को पार्टी हित में सुझाव दिया है, चुनौती दी है या बगावत की है। जब पिछले साढ़े 4 वर्षों से प्रदेश प्रधान को सहयोग दे रहे थे तो फिर चुनावों के नजदीक उसको बदलने के लिए आलाकमान पर दवाब क्यों डाला जाने लगा? यह मंसूबा समझ से परे है, संशयपूर्ण है और दाल में कुछ काला तो जरूर लगता है।

इतिहास साक्षी है कि सभी राजनीतिक दलों के आलाकमान ही सर्वोपरि होते हैं और प्रदेशों में  नियुक्तियां भी उनके अधिकार क्षेत्र में आती हैं। कई बार वे प्रदेशों के प्रतिष्ठित नेताओं से सलाह-मशविरा कर लेते हैं और कई बार अपनी रिपोर्ट के आधार पर नेताओं को जिम्मेदारियां सौंपते हैं। जिन्हें बिना किसी किंतु-परंतु के प्रदेश का पार्टी नेतृत्व सहर्ष स्वीकार कर लेता है। यही परम्परा पिछले कई वर्षों से चली आ रही है और भविष्य में भी ऐसे ही चलती रहेगी। कांग्रेस भारत की 141 वर्ष पुरानी आलीशान और गौरवमयी इतिहास की पार्टी रही है और उसका शीर्ष नेतृत्व ही प्रदेशों से संबंधित फैसला लेते आया है। ये फैसले राजनीतिक तौर पर फलदायक रहें या नुकसानदायक, यह चर्चा का विषय हो सकता है। एक गुट के दबाव में यदि आलाकमान घुटनों पर आ जाती है तो फिर दूसरे प्रदेशों में भी ऐसे बगावती सुर उठने लगेंगे, जो उनके अधिकार क्षेत्र को ही चुनौती होगी। यदि कोई मांग उचित भी हो तो उसका समाधान करने का तरीका युक्तिसंगत, समयानुकूल और हालाते  हाजरा की जरूरीयात के मुताबिक हो। समस्या को लटकाना भी समस्या का समाधान नहीं होता। कांग्रेस पार्टी के प्रादेशिक संगठनों में यदि गुटबाजी है तो आलाकमान भी अपनी कमियों, कमजोरियों और गुटों को प्रोत्साहित करने की गैर-मामूली जिम्मेदारियों  से  बच नहीं सकती। पंडित नेहरू और सरदार पटेल के समय भी 2 गुट थे, परंतु दोनों के मुख्य उद्देश्य बड़े सकारात्मक, सृजनात्मक और रचनात्मक थे।

वह पार्टी के हितों से ऊपर  राष्ट्र के हितों को ही सर्वोच्च मानते थे। एक ने समूचे राष्ट्र को एकता  के सूत्र में पिरोया और दूसरे ने हर क्षेत्र में विकास की बुनियाद रखी। वर्तमान समय में गुटबाजी निजी स्वार्थों तक सीमित होती जा रही है जो अति विनाशकारी साबित हो रही है। कांग्रेस आलाकमान पहले ही जल्दबाजी, गुटबाजी और खुशामदियों के सलाह-मशविरे से असम गंवा बैठी है। हरियाणा में जीतती-जीतती पराजित हो गई और पंजाब में जिस फैसले को मास्टर स्ट्रोक कहते थे, वही कांग्रेस को ले डूबा और पार्टी विधानसभा में 18 सीटों तक सीमित रह गई। यह जानते हुए भी कि युद्ध के मैदान में घोड़े नहीं बदले जाते, फिर भी उन्होंने चुनाव से कुछ महीने पहले कैप्टन अमरिंदर सिंह को बदल कर हिमालय से भी बड़ी गलती की। हकीकत में लोकप्रिय नेता को बदलने का न समय ठीक था और न ही फैसला, जिसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ा।राजनीति शतरंज के मोहरों की तरह शह और मात का खेल होता है। मामूली गलती से कई बार बादशाह भी मारा  जाता है।

कांग्रेस के ठीक समय पर ठीक फैसले न लेने से तमिलनाडु, बंगाल, यू.पी. और बिहार हाथ से निकल गए और आज  तक कांग्रेस के इन प्रदेशों में पांव नहीं जमे। हकीकत में कांग्रेस का संरचनात्मक और कार्यात्मक प्रकोष्ठ अति कमजोर हो चुके हैं। प्रदेशों के संगठनात्मक ढांचे भी शिथिल हो रहे हैं। देश में 90 करोड़ मतदाताओं में आधी महिलाएं हैं, परंतु महिला कांग्रेस का प्रभाव भी फीका पड़ रहा है । युवा कांग्रेस, कांग्रेस का एक मकबूल और शक्तिशाली फोर फ्रंट था, जो अब कई छोटे-छोटे संकीर्ण गुटों में बंटा हुआ है। इन पर भी प्रभावशाली विधायकों और मंत्रियों का नियंत्रण है। इंटक कांग्रेस का एक बड़ा ही शक्तिशाली विंग था, जिसमें  लाखों औद्योगिक, व्यापारिक और कृषि क्षेत्र से संबंधित मजदूर होते थे जो अब अपना वर्चस्व खो चुका है। इसी तरह सेवा दल, जिसके मुखिया कभी पंडित नेहरू थे, आज थोड़े से लोगों के हाथों में सिमट कर रह गया है। जबकि आर.एस.एस. की भारत में करीब 80 हजार के लगभग शाखाएं हैं, जो  हर समय सक्रिय रहते हैं। यद्यपि कांग्रेस के पास आज भी करोड़ों कार्यकत्र्ता हैं, पर उन्हें एकता के सूत्र में बांधने वालों की भारी कमी है।

‘आप’ सरकार मुफ्तखोरी के नाम पर अपना वर्चस्व बनाए हुए है। अकाली दल पिछले चुनाव में बुरी तरह पराजित होने के बाद अभी भी हिचकोले खा रहा है। भाजपा इतिहास में पहली बार अपने दम पर चुनाव लड़कर कुछ नया करने के लिए संकल्पित है। चुनाव के नजदीक आने पर भी कांग्रेस के पांव देवताओं की तरह जमीं को छूते नजर नहीं आ रहे।
खुदा पंजाब कांग्रेस पर नजरे इनायत रखे। इस संबंध में एक शे’र नजर करता हूं।
आदमी खुद को कभी यूं भी सजा देता है, 
अपने दामन से खुद शोलों को हवा देता है। 
मुझे उस सियासतदान की सियासत पर तरस आता है, 
जो अपने मफाद के लिए पार्टी  हितों को कुर्बान करता है॥-प्रो. दरबारी लाल पूर्व डिप्टी स्पीकर, पंजाब विधानसभा
    

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