सरकारी स्कूलों में सुधार एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना

Edited By Updated: 22 Sep, 2026 04:47 AM

reforms in government schools became a major political issue

केरल को छोड़कर, शायद, भारतीय राजनेता अपने निर्वाचन क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों की तीसरे दर्जे की हालत से कभी भयभीत नहीं हुए, न ही सरकारी अस्पतालों, ट्रेनों या मतदाताओं द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली किसी भी चीज की स्थिति से। वे कभी इस बात से भी नहीं...

केरल को छोड़कर, शायद, भारतीय राजनेता अपने निर्वाचन क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों की तीसरे दर्जे की हालत से कभी भयभीत नहीं हुए, न ही सरकारी अस्पतालों, ट्रेनों या मतदाताओं द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली किसी भी चीज की स्थिति से। वे कभी इस बात से भी नहीं डरे कि उनकी रहस्यमय रूप से अर्जित संपत्ति उजागर हो जाएगी। ऐसा लगता है मानो भारत के लोग किसी ऐसी चीज के लिए वोट नहीं करते जो वास्तव में मायने रखती हो। लेकिन अब कुछ नया हो रहा है, जिसका उन्हें शायद एहसास नहीं है कि वह राजनीतिक सुनामी बन सकता है।
कॉकरोच जनता पार्टी आंदोलन पूरे देश में सरकारी स्कूलों की स्थिति को उजागर करके खुद को जीवित रखे हुए है। यह लंबे समय से केवल राजनीतिक दलों के लिए ही नहीं, बल्कि मीडिया के लिए भी एक गैर-आकर्षक मुद्दा रहा है। लेकिन ऐसे कारण हैं जिनसे सरकारी स्कूलों के लिए लड़ाई बड़ी राजनीति बन सकती है। खासकर अब, जब भारतीय समाज पुराने, बेकार मुद्दों से ऊबता हुआ दिखाई दे रहा है।

भारत के अधिकांश हिस्सों में एक सरकारी स्कूल हमारे साथ जो कुछ भी गलत है, उसका प्रतीक है। कुछ स्कूलों में इमारतें नहीं हैं, कुछ में शिक्षक नहीं हैं। लाखों बच्चे ऐसे स्कूलों से गुजर चुके हैं, जहां शायद उन्हें कोई शिक्षा ही नहीं मिली। मुख्य रूप से, एक सरकारी स्कूल भ्रष्टाचार, अयोग्यता, कार्य-नैतिकता की कमी और अवमानना को उजागर करता है। सरकार की सभी बुराइयां और विफलताएं एक ही इमारत में समा जाती हैं, जो लोगों की समझ से कहीं अधिक भावनात्मक चीज है। एक सरकारी स्कूल केवल भारत के बहुसंख्यक लोगों के लिए एक परिचित दृश्य ही नहीं, बल्कि ऐसी चीज है जो उनमें से अधिकांश से जुड़ी हुई है। उनके बच्चे वहां पढ़ें या न पढ़ें, लेकिन वह आमतौर पर इतना खराब होता है कि भारत के नए निम्न-मध्यवर्ग पर अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेजने के साहसी प्रयास का बड़ा खर्च डाल देता है। इसलिए अब, जब एक चतुर संगठन ने इस मुद्दे को उठाना शुरू कर दिया है, सरकारी स्कूल खराब शासन का अप्रत्याशित प्रतीक बन सकता है।

‘कॉकरोच’ सरकारी स्कूलों में घुस रहे हैं और हमें ऐसी तस्वीरें दिखा रहे हैं जो हमें झकझोरती हैं। यह आश्चर्यजनक है कि वे अपने खिलाफ चल रहे राजनीतिक उपहास के बावजूद ऐसा करना जारी रख पाए हैं। यह उनके उद्देश्य के लिए ठोस समर्थन का संकेत देता है, भले ही यह हमेशा स्पष्ट न हो। एक और कारण कि अनुभवी राजनेता इसका मुकाबला नहीं कर पाए हैं, यह कि सार्वजनिक शिक्षा को बदलने की आवश्यकता के खिलाफ कोई नैतिक तर्क नहीं है। इसमें उस तरह की अस्पष्टता नहीं है जो किसी बेकार सांस्कृतिक मुद्दे में होती है। उच्च शिक्षा के बारे में तर्क हो सकते हैं लेकिन किसी बच्चे को स्कूल से दूर रखने के पक्ष में तर्क करना कठिन है, चाहे वह सरकारी स्कूल ही क्यों न हो। एक स्कूल, अपनी कमियों के बावजूद, एक अत्यंत नैतिक विचार है। यह विचार कि एक बच्चे को मानव जाति द्वारा ज्ञात सभी बुनियादी बातें सीखनी चाहिएं।

सीजनल राजनेताओं ने पहले तो इंकार करके कॉकरोचों का सामना किया, फिर उन्होंने वादा किया कि वे स्कूलों को बदल देंगे। लेकिन वे यह नहीं जानते कि इसे अच्छी तरह कैसे कहा जाए। उन्हें बेकार मुद्दों को प्रभावशाली ढंग से पेश करने या खोखले वादे करने के लिए प्रशिक्षित किया गया है। अधिकांश को यह पता ही नहीं लगता कि वास्तव में क्या किया जाना चाहिए।

आप तर्क दे सकते हैं कि यदि सरकारी स्कूल में राजनीतिक मुद्दा बनने की क्षमता थी, तो गरीब इतने दशकों तक चुप क्यों रहे? लेकिन, गरीब उस तरह विद्रोह नहीं करते जैसा अधिकांश लोग कल्पना करते हैं। एक असंतुष्ट सामाजिक अभिजात वर्ग को उन्हें संगठित करना पड़ता है। कॉकरोच उस असंतुष्ट अभिजात वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं और वे ठीक-ठीक जानते हैं कि भारतीय सरकारी स्कूलों की भयावह स्थिति के बारे में कैसे बात करनी है।

गरीबों के स्कूलों की स्थिति से सभी तरह के उच्च वर्ग प्रभावित होते हैं। सहानुभूति आत्ममुग्धता का एक रूप है और एक सामंती आश्वासन भी कि जिस व्यक्ति के प्रति सहानुभूति दिखाई जा रही है, वह कोई खतरा नहीं है। इसलिए अमीर माता-पिता भी लाखों बच्चों को एक बदहाल सरकारी स्कूल में अपना जीवन शुरू करते देखकर पीड़ा महसूस करते हैं। यह आसान सहानुभूति इतने अधिक कर चुकाने के उनके गुस्से के साथ मिली हुई है। आखिर किस लिए? उन प्रांतीय राजनेताओं को खिलाने के लिए, जो बच्चों को उनके उचित स्कूल देने से इंकार करते हैं।-मनु जोसेफ

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