Edited By ,Updated: 27 Sep, 2026 05:39 AM

एक साल से भी अधिक समय से, मैं मतदाता सूचियों के ‘विशेष सघन पुनरीक्षण’ (एस.आई.आर.) के बारे में आलोचनात्मक रूप से लिखता रहा हूं। मैंने ऐसा कुछ संकोच के साथ किया। भारत का निर्वाचन आयोग (ई.सी.आई.) एक ऐसा संस्थान है, जहां मैंने कई वर्षों तक सेवा की है।
एक साल से भी अधिक समय से, मैं मतदाता सूचियों के ‘विशेष सघन पुनरीक्षण’ (एस.आई.आर.) के बारे में आलोचनात्मक रूप से लिखता रहा हूं। मैंने ऐसा कुछ संकोच के साथ किया। भारत का निर्वाचन आयोग (ई.सी.आई.) एक ऐसा संस्थान है, जहां मैंने कई वर्षों तक सेवा की है। मैं इसकी खूबियों को जानता हूं और मैंने अक्सर इसे हमारे संविधान के महान उपहारों में से एक कहा है।
एक अंग्रेजी अखबार के खुलासों के बाद, मुझे आश्चर्य होता है कि क्या मैं पर्याप्त रूप से आलोचनात्मक था? जांच रिपोर्ट बताती है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार उन फैसलों और आदेशों पर आपत्तियां दर्ज कराईं, जिनके बारे में उन्होंने कहा कि वे उनकी जानकारी के बिना लिए गए थे। उनकी चिंताएं ई.सी.आई. के मूल कामकाज से जुड़ी थीं, जिसमें मतदाताओं का पंजीकरण और विलोपन, नामों की बहाली, फॉर्म 6, चुनावी मामलों में अपील और नामावलियों की डिजिटल संरचना पर नियंत्रण शामिल था। अब सवाल सिर्फ यह नहीं रह गया कि क्या एस.आई.आर. बुद्धिमानी भरा, निष्पक्ष या प्रशासनिक रूप से सही था। एक वास्तविक सवाल उठता है-क्या ये फैसले वास्तव में ई.सी.आई. द्वारा लिए जा रहे हैं? यदि नहीं, तो क्या इन्हें कानूनी माना जा सकता है?
कानून स्पष्ट है।
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 की धारा 18(2) में प्रावधान है कि आयोग का सारा कामकाज, जहां तक संभव हो, सर्वसम्मति से निपटाया जाएगा। यदि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों में मतभेद होता है, तो मामले का फैसला ‘बहुमत की राय के अनुसार किया जाएगा’। धारा 18(1) इससे भी आगे जाती है-कामकाज के संचालन और उसके आबंटन की प्रक्रिया को भी केवल सर्वसम्मत फैसले द्वारा ही विनियमित किया जा सकता है। सर्वसम्मति ही वैधानिक नियम है। जहां यह विफल होती है, वहां बहुमत तय करता है। एकतरफा फैसलों के लिए यहां कोई जगह नहीं है। यह सिद्धांत इस कानून से भी पुराना है। टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ (1995) के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर बल दिया था कि अनुच्छेद 324 चुनावों की जिम्मेदारी ई.सी.आई. को सौंपता है, किसी एक व्यक्ति को नहीं।
यदि दो आयुक्त मुख्य चुनाव आयुक्त (सी.ई.सी.) से असहमत होते हैं, तो धारा 18 बताती है कि किसका दृष्टिकोण मान्य होगा। कानूनी परिणाम गंभीर हैं। किसी ऐसे ठोस फैसले पर विचार करें जो कानून आयोग में निहित करता है लेकिन आयोग के समक्ष रखे बिना या कामकाज के विधिपूर्वक अपनाए गए आबंटन के दायरे के बिना ‘चुनाव आयोग’ के नाम पर लिया गया हो, ऐसा निर्णय प्रथम दृष्टया, अधिकारक्षेत्र से बाहर है। कोई लैटरहैड वह अधिकार प्रदान नहीं कर सकता, जिसे कानून रोकता है। आयोग 3 सदस्यीय संवैधानिक निकाय है। यह इसके अध्यक्ष का दूसरा नाम नहीं है।
एस.आई.आर. विवाद के दौरान ई.सी.आई. को लगभग एक अखंड सार्वजनिक चेहरा बनाए रखते देखकर, मुझे कभी-कभी आश्चर्य होता था कि क्या दोनों आयुक्त बहुत डरपोक थे और क्या उनकी चुप्पी का मतलब सहमति था? रिपोर्ट इसके उलट संकेत देती है। वे फाइल पर आपत्तियां दर्ज करा रहे थे, फैसलों पर सवाल उठा रहे थे, चुनावी डाटाबेस के इर्द-गिर्द सुरक्षा उपायों की मांग कर रहे थे और यहां तक कि जब उन्हें लगा कि संस्थागत प्रक्रियाओं का उल्लंघन हुआ है, तो उन्होंने कैबिनेट सचिव से भी संपर्क किया।
प्रतिक्रिया संस्थागत होनी चाहिए, दलगत नहीं। एक आयोग के रूप में बैठक करते हुए आयोग को निम्नलिखित कदम उठाने चाहिएं-यह खुलासा करना चाहिए कि एस.आई.आर. के किन बड़े फैसलों को सर्वसम्मति से मंजूरी दी गई थी, किन्हें बहुमत से तय किया गया था और किस वैध अधिकार के तहत अन्य फैसले जारी किए गए थे। ऐसे हर फैसले की समीक्षा की जाए, जिसे दो आयुक्तों ने मंजूरी के अभाव के रूप में चुनौती दी है और जिसे भी बिना वैध अधिकार के लिया गया पाया जाए, उसे वापस लिया जाए। फॉर्म 6 को वैधानिक नियमों के अनुरूप बहाल किया जाए। ईसीआईनैट को एक स्वतंत्र तकनीकी और कानूनी ऑडिट के अधीन किया जाए। यह सुनिश्चित किया जाए कि वैधानिक ई.आर.ओ. उन शक्तियों का प्रयोग कर सकें जो संसद ने उन्हें दी हैं। उस प्राधिकारी का खुलासा किया जाए, जिसके तहत ई.सी.आई. के नाम पर अपीलें दायर की गईं। जहां आयोग कार्रवाई नहीं करेगा, वहां सर्वोच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करना होगा।
सालों से, ई.सी.आई. के बारे में केंद्रीय सवाल यह रहा है कि क्या यह कार्यपालिका से स्वतंत्र है? आज एक और सवाल अपरिहार्य हो गया है-क्या चुनाव आयोग एक आयोग के रूप में कार्य कर रहा है? संविधान ने एक आयोग का निर्माण किया था। संसद ने सामूहिक निर्णय लेने की व्यवस्था निर्धारित की थी। सर्वोच्च न्यायालय ने किसी व्यक्ति को संस्थान पर हावी होने देने के खिलाफ आगाह किया था। एक संवैधानिक प्राधिकरण, जो लगभग एक अरब मतदाताओं से चुनावी कानून के सख्त अनुपालन की मांग करता है, उसे खुद को नियंत्रित करने वाले कानून का सख्ती से पालन करके शुरुआत करनी चाहिए।-एस.वाई. कुरैशी(भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त)