छोटे स्कूली बच्चों की यूनिफॉर्म में ‘टाई’ नहीं होनी चाहिए!

Edited By Updated: 21 Jul, 2026 05:00 AM

there should be no tie in the uniform of small school children

कई साल पहले की बात है। किसी मित्र ने अपने पड़ोसी के बच्चे के  साथ हुई घटना बताई थी। एक दोपहर स्कूल में खाने की छुट्टी के समय मैदान में बच्चे खेल रहे थे। दो छोटे बच्चों में किसी बात पर कहा-सुनी हो गई। पहले तो वे बातों से ही एक-दूसरे से लड़ते रहे। फिर...

कई साल पहले की बात है। किसी मित्र ने अपने पड़ोसी के बच्चे के  साथ हुई घटना बताई थी। एक दोपहर स्कूल में खाने की छुट्टी के समय मैदान में बच्चे खेल रहे थे। दो छोटे बच्चों में किसी बात पर कहा-सुनी हो गई। पहले तो वे बातों से ही एक-दूसरे से लड़ते रहे। फिर एक बच्चे ने दूसरे बच्चे पर हमला बोल दिया। पहले उसे खूब चांटे और मुक्के मारे। फिर उसके गले में  पहनी टाई को इतनी जोर से खींचा कि टाई ने गले को कस लिया। बच्चे का दम घुटने लगा और वह जमीन पर गिर पड़ा। ऐसा होते देख, दूसरे बच्चे शोर मचाने लगे। रोने लगे।

वहां आसपास बड़ी क्लास में पढऩे वाले बच्चे भी खेल रहे थे। उन्होंने छोटे बच्चों का रोना और चीखें सुनीं, तो वे उस तरफ दौड़े, जहां बच्चा गिरा था। कुछ बच्चे अध्यापकों के पास भी पहुंचे। बड़े बच्चों ने गिरे बच्चे को देखा, तो उन्हें बात समझते देर न लगी। एक बड़े बच्चे ने फौरन छोटे बच्चे की टाई को ढीला किया। दूसरे बच्चे ने मुंह पर पानी के छींटे मारे। जब नीचे गिरे बच्चे ने आंखें खोलीं, तो उसे पानी पिलाया। तब तक कई अध्यापक भी वहां आ पहुंचे। बच्चे को मैडीकल रूम में ले जाया गया। उसका उपचार किया गया। उसके घर वालों को बुलाया गया। बच्चा अब ठीक था। घर वाले उसे अपने साथ ले गए। 

खैरियत थी कि बड़े बच्चों की जागरूकता और स्कूल की चिकित्सकीय सुविधाओं के कारण छोटे बच्चे की जान बच गई। इस हादसे में बच्चों की आपसी लड़ाई तो जिम्मेदार थी ही, वह टाई भी जिम्मेदार थी, जिसे खींचने से बच्चे की जान जाते-जाते बची थी। लेकिन उस वक्त न स्कूल, न माता-पिता, किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया कि क्या बच्चों की स्कूली यूनिफॉर्म में टाई का होना जरूरी है? बल्कि इस घटना से उस या किसी अन्य स्कूल ने शायद ही कोई सबक लिया। उस समय जिस बच्चे के साथ दुर्घटना होने से बची थी, वह इस हादसे से बुरी तरह घबरा गया। उसने स्कूल जाने से मना कर दिया। स्कूल जाने की बात सुनते ही वह जोर-जोर से रोने लगता। खाना-पीना छोड़ देता। फिर उसका एडमिशन दूसरे स्कूल में करा दिया गया।

बड़ी मुश्किल से उसे स्कूल जाने के लिए मनाया गया लेकिन अफसोस कि नए स्कूल में भी उसे यूनिफॉर्म की टाई से छुटकारा नहीं मिला। यह तो मात्र एक घटना थी। ऐसी न जाने कितनी बेशुमार घटनाएं आए दिन होती होंगी, जो पता भी नहीं चलती होंगी। पता चलें भी तो एक-आध दिन चर्चा करके लोग भूल जाते हैं। जब यह घटना पता चली, तो यही सोचने लगी कि आखिर छोटे बच्चों की यूनिफॉर्म में टाई क्यों होनी चाहिए? वैसे भी भारत जैसे गर्म देश में टाई की कोई जरूरत भी नहीं होती। यह बस साहबी दिखावे और अंग्रेजों की नकल करने का एक तरीका भर है। 

खैर, हाल ही में जब हरियाणा राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने भी स्कूली बच्चों को गांठ वाली टाई पहनने पर एतराज जताया, तो ऊपर लिखी घटना याद आ गई। आयोग ने राज्य के निजी और सरकारी सहायता प्राप्त सभी स्कूलों के लिए एडवाइजरी जारी की है, जिसमें कहा गया है कि स्कूलों में पढऩे वाले बच्चे गांठ वाली टाई के स्थान पर क्लिप वाली टाई या विल्क्रो यानी कि हुक वाली टाई पहनें। आयोग ने भी वही कहा, जिस घटना का जिक्र ऊपर किया गया है। आयोग ने कहा कि गांठ वाली टाई पहनने से देश के विभिन्न स्कूलों से ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जिनसे दैनिक स्कूली गतिविधियों में बच्चे दुर्घटनाग्रस्त हुए हैं। यहां तक कि बच्चों ने जीवन भी गंवाया है। यही नहीं, स्कूलों के झूलों, हुकों तथा अन्य उपकरणों में भी बच्चों की टाइयां उलझ  जाती हैं और उनका जीवन खतरे में पड़ा जाता है। इसलिए  स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा पहली प्राथमिकता है। उससे कोई समझौता नहीं किया जा सकता। आयोग द्वारा जारी की गई एडवाइजरी में यह भी कहा गया है कि जब तक सभी विद्यालय टाइयों से संबंधित नई सुरक्षा व्यवस्था लागू न कर लें, बच्चों को शारीरिक शिक्षा, खेलकूद तथा ऐसे ही अन्य कामों से दूर रखा जाए, जिनसे उनके जीवन के लिए मुश्किल पैदा हो सकती है।

बाल संरक्षण आयोग ने हरियाणा में शिक्षा से संबंधित अधिकारियों  को भी पत्र लिखा है। अधिकारियों से मांग की गई है कि वे आयोग द्वारा जारी एडवाइजरी को स्कूलों में लागू कराएं, जिससे कि बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। हरियाणा बाल संरक्षण आयोग की यह पहल सराहनीय है। कायदे से तो इसे सिर्फ हरियाणा तक ही नहीं, पूरे देश में लागू किया जाना चाहिए। क्योंकि टाई वाली यूनिफॉर्म का प्रचलन अपने देश में सिर्फ महानगरों, नगरों, कस्बों तक ही सीमित नहीं है यह गांव-गांव तक जा पहुंचा है। पीली बसों में ऐसी ही यूनिफॉर्म में बच्चे स्कूल जाते दिखते हैं। जिस यूनिफॉर्म को अपने बच्चों को पहनाकर माता-पिता गौरवान्वित महसूस करते हैं, उन्हें नहीं पता, या वे इस ओर ध्यान ही नहीं देते कि वही यूनिफॉर्म बच्चे के लिए जानलेवा भी हो सकती है। बच्चों के लिए ऐसी यूनिफॉर्म हो, जो उन्हें पहनने में आसानी हो। अधिक महंगी भी न हो। आए दिन फायदे के लिए स्कूल उसे न बदलें।-क्षमा शर्मा
 

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