एकदंत संकष्टी चतुर्थी 2022: बप्पा की पूजा से दूर होंगे सारे कष्ट-क्लेश

Edited By Jyoti, Updated: 18 May, 2022 12:28 PM

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हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक माह में दो चतुर्थी तिथि पड़ती है। शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को विनायक चतुर्थी कहते हैं और कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी के नाम से जाना जाता है।

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हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक माह में दो चतुर्थी तिथि पड़ती है। शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को विनायक चतुर्थी कहते हैं और कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। जैसे कि कल से ज्येष्ठ माह का आरंभ हो रहा है और ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को एकदंत संकष्टी चतुर्थी कहते हैं। मान्यता है कि इस दिन भगवान श्री गणेश की विधि-विधान से पूजा करने से भक्तों के सभी कष्ट दूर होते हैं। तो आइए जानते हैं एकदंत संकष्टी चतुर्थी की तिथि, शुभ मुहूर्त, चंद्रोदय का समय व पूजन विधि।
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सबसे पहले आपको बताते हैं एकदंत संकष्टी चतुर्थी के तिथि के बारे में- 
चतुर्थी तिथि का आरंभ 18 मई को रात 11 बजकर 36 मिनट पर होगा और इसका समापन 19 मई को रात 08 बजकर 23 मिनट पर होगा। तो ऐसे में एकदंत संकष्टी चतुर्थी का व्रत 19 मई, दिन गुरुवार को रखा जाएगा।

पूजा का शुभ मुहूर्त-
संकष्टी चतुर्थी वाले दिन सुबह से साध्य योग बन रहा है, जो कि दोपहर 02 बजकर 58  मिनट तक रहेगा। इसके बाद शुभ योग शुरू हो जाएगा। बता दें कि, ये दोनों ही योग पूजा पाठ के लिए शुभ फलदायी माने गए हैं। इसलिए आप प्रात:काल से ही पूजा पाठ कर सकते हैं। तो वही इस दिन का शुभ समय या अभिजित मुहूर्त सुबह 11 बजकर 50 मिनट से दोपहर 12 बजकर 45 मिनट तक है। इस अवधि में आप कोई भी शुभ कार्य कर सकते हैं।

संकष्टी चतुर्थी पर चंद्रोदय का समय- 
शास्त्रों के अनुसार, संकष्टी चतुर्थी का व्रत तभी पूर्ण माना जाता है, जब उस रात चंद्रमा की पूजा की जाए। इस दिन चंद्रमा देर से निकलता है। बता दें कि एकदंत संकष्टी चतुर्थी की  रात चंद्रमा का उदय 10 बजकर 56 मिनट पर होगा। चंद्रमा को जल अर्पित करने के बाद ही व्रत का पारण करते हैं।

एकदंत संकष्टी चतुर्थी के दिन इस तरह से करें भगवान गणेश जी का पूजन- 

सबसे पहले सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें। इस दिन लाल रंग के वस्त्र पहनें।

फिर गणपति की मूर्ति को फूलों से सजा लें और पूजा करते समय अपना मुंह पूर्व या उत्तर दिशा की ओर ही रखें।
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इसके बाद साफ आसन या चौकी पर भगवान गणेश को विराजित करें।

भगवान की प्रतिमा के सामने धूप-दीप प्रज्वलित करें और ॐ गणेशाय नमः या ॐ गं गणपतये नमः का जाप करें।

फिर गणपति के मस्तक पर रोली कुमकुम का तिलक लगाएं रोली लगाएं।

पूजा के बाद भगवान गणेश को तिल के लड्डू और मोदक का भोग लगाएं। फिर व्रत कथा करके आरती करें।

शाम को फिर से व्रत कथा पढ़कर चांद के दर्शन कर अपना व्रत खोलें।

ध्यान रहे अपना व्रत पूरा करने के बाद दान भी अवश्य करें।
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संकष्टी चतुर्थी का व्रत सूर्योदय से प्रारंभ होता है और सूर्यास्त के बाद चंद्र दर्शन से समाप्त होता है. इस दिन विघ्नहर्ता भगवान गणेश की उपासना करने से घर के सभी नकारात्मक प्रभाव नष्ट हो जाते हैं और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। मान्यता है कि जो व्यक्ति संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखता है उसके पाप हमेशा के लिए मिट जाते हैं और सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है। घर की सुख और समृद्धि में वृद्धि होती है। संकट हरने वाले संकष्टी चतुर्थी व्रत का पालन करने से घर में आने वाली बाधाएं दूर हो जाती हैं और गृह क्लेश से मुक्ति मिल जाती है। इतना ही नहीं संतान सुख की प्राप्ति के लिए इस व्रत को बहुत महत्व दिया गया है। 

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