कुंभ मेले के बाद समय है एक ‘पवित्र यात्रा’ का

Edited By Updated: 05 Feb, 2020 09:26 AM

kumbh mela and gangasagar mela

कुंभ मेले के बाद गंगासागर मेला हिंदू तीर्थयात्रियों का दूसरा सबसे बड़ा एकत्र होता है। यह पवित्र उत्सव प्रत्येक वर्ष और केवल पश्चिम बंगाल में सागरद्वीप या समुद्र में बने एक द्वीप पर आयोजित किया जाता है।

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कुंभ मेले के बाद गंगासागर मेला हिंदू तीर्थयात्रियों का दूसरा सबसे बड़ा एकत्र होता है। यह पवित्र उत्सव प्रत्येक वर्ष और केवल पश्चिम बंगाल में सागरद्वीप या समुद्र में बने एक द्वीप पर आयोजित किया जाता है। हर साल मकर संक्रांति के दौरान देश भर से तीर्थयात्री पवित्र गंगा नदी तथा बंगाल की खाड़ी के संगम पर डुबकी लगाने आते हैं, जिसके बाद वे कपिल मुनि के मंदिर में प्रार्थना करते हैं। खुद मंदिर के साथ कई दंतकथाएं जुड़ी हैं और श्रद्धालुओं के बीच यह अत्यंत सम्माननीय है। सागरद्वीप कोलकाता से लगभग 100 किलोमीटर इस बंगाल की खाड़ी की कांटीनैंटल शैल्फ पर गंगा के डैल्टा पर स्थित है। यदि आप इस ओर जाते हैं तो भीड़ का सामना करने को तैयार रहें और अपनी यात्रा की शुरूआत करने से पूर्व अपनी कार की सर्विस करवाना न भूलें।

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गंगासागर मेला
गंगासागर मेला बंगाल में हुगली नदी के मुहाने पर जनवरी-फरवरी के महीनों में गंगा सागर द्वीप पर आयोजित किया जाता है। हालांकि मकर संक्रांति के दिनों में यहां श्रद्धालु सबसे अधिक संख्या में पहुंचते हैं। प्रति वर्ष लाखों की संख्या में तीर्थ यात्री इस मेले में भाग लेते हैं। मेले के दौरान यहां पानी में डुबकी लगाने को अत्यंत पवित्र माना जाता है। कहा जाता है कि मकर संक्रांति के दिन, जो आमतौर पर 14 जनवरी को होती है, जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है, यहां डुबकी लगाना मोक्ष का एक स्रोत बन जाता है।

मेले के साथ जुड़ी कहानियां भी बहुत दिलचस्प हैं। गंगोत्री ग्लेशियर से शुरू होकर और फिर ऋषिकेश तथा हरिद्वार के मैदानी क्षेत्रों से होते हुए पवित्र गंगा नदी पश्चिम बंगाल पहुंचती है, जहां इसे हुगली नाम मिल जाता है। यहां पवित्र नदी समुद्र में मिल जाती है। दंतकथा के अनुसार, हजारों वर्ष पूर्व ऐसा होने से ठीक पहले, गंगा के पानी ने राजा भागीरथ के दादा राजा सागर के 60,000 बेटों के अवशेषों को अपने पानी से स्नान करवा कर उनकी आत्मा को हमेशा के लिए जीवन-मृत्यु के चक्र से मुक्ति दे दी। यहां पवित्र नदी में डुबकी लगाने के बाद लोग आमतौर पर नजदीकी कपिल मुनि मंदिर जाते हैं और धर्मनिष्ठा के तौर पर वहां स्थापित प्रतिमा की पूजा करते हैं। कहा जाता है कि इस पवित्र मेले में भाग लेने के लिए 10 लाख से अधिक श्रद्धालु आते हैं।

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कपिल मुनि का मंदिर
कपिल मुनि के मंदिर का भी अपना एक इतिहास है। एक बार फिर, सदियों पहले, राजा सागर ने सारी दुनिया को जीतने के लिए अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। जब उनका अश्व सारी दुनिया पर विजय पूर्ण करने ही वाला था, स्वर्ग के राजा इंद्र सतर्क हो गए। उन्होंने भाग्यशाली अश्व को चुरा लिया और कपिल मुनि के आश्रम के नजदीक बांध दिया। राजा सागर के 60,000 बेटों ने समझा कि कपिल मुनि ने ही अश्व को बंदी बनाने का अपराध किया है और जब वह गहरे ध्यान में थे तो परेशान करके उनका ध्यान भंग कर दिया। क्रोधित होकर कपिल मुनि ने उन्हें राख में बदलने का श्राप दे दिया। ऐसा कहा जाता है कि तब राजा भागीरथ, जो राजा सागर के एकमात्र पौत्र थे, ने गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित होने तथा अपने पूर्वजों के अवशेषों को धोकर उन्हें मोक्ष का वरदान देने के लिए मनाने हेतु वर्षों तक साधना की। आज भी गंगासागर कपिल मुनि के आश्रम में अपनी उपस्थिति दर्शाता है।

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