Mahabharat: ये हैं धर्मात्मा के लक्षण, देखें आप में हैं कितने गुण

Edited By Updated: 25 Apr, 2026 08:04 AM

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Mahabharat: महाराजा धर्मराज युधिष्ठिर जब अपने चारों भाइयों तथा रानी द्रौपदी के साथ विराट नगर में छिपे हुए थे, उस समय उनका पता लगाने के लिए व्यग्र दुर्योधन को पितामह भीष्म उनकी पहचान बतलाते हुए कहते हैं-

Mahabharat: महाराजा धर्मराज युधिष्ठिर जब अपने चारों भाइयों तथा रानी द्रौपदी के साथ विराट नगर में छिपे हुए थे, उस समय उनका पता लगाने के लिए व्यग्र दुर्योधन को पितामह भीष्म उनकी पहचान बतलाते हुए कहते हैं-

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जिस नगर और ग्राम में राजा युधिष्ठिर रहते होंगे, उस देश के मनुष्य दानशील, उदार, जितेंद्रिय तथा बुरे कामों में लज्जा करने वाले होने चाहिएं। राजा युधिष्ठिर जहां रहते होंगे वहां के मनुष्य प्रिय बोलने वाले, सदा इंद्रियों को जीते हुए, श्री सम्पन्न, सत्य परायण, हृष्ट-पुष्ट, पवित्र तथा चतुर होने चाहिएं।
 
जहां राजा युधिष्ठिर रहते होंगे वहां के लोग दूसरे के गुणों में दोषारोपण करने वाले, डाह करने वाले, अभिमानी, मत्सरता वाले नहीं होकर सब धर्म का अनुसरण करने वाले होंगे। वहां अत्यधिक वेदध्वनियां, यज्ञों की पूर्णाहुतियां और बड़ी-बड़ी दक्षिणा वाले बहुत से यज्ञ होते रहेंगे। वहां मेघ आवश्यकतानुसार सदा अच्छी वर्षा करते होंगे, इसमें कोई संदेह नहीं और पृथ्वी पीड़ारहित तथा बहुत अन्न पैदा करने वाली होगी। वहां गुणकारी अन्न, रस भरे फल, सुगंधित पुष्प और शुभ शब्दों से युक्त वाणी होगी।
 
जहां युधिष्ठिर रहते होंगे, वहां सुख स्पर्श वायु चलती होगी। वहां के मनुष्यों का धर्म और ब्रह्म विषयक ज्ञान पाखंड रहित होगा तथा भय को कहीं प्रवेश करने की जगह नहीं मिलेगी। वहां बहुत सी गौएं होंगी और वे निर्बल तथा दुबली-पतली नहीं होंगी। वहां दूध, दही और घृत रसयुक्त तथा हितकारक होंगे। वहां खाने-पीने के पदार्थ रसभरे और गुणकारी होंगे।

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जहां राजा युधिष्ठिर रहते होंगे उस देश में रस, गंध, शब्द और स्पर्श गुणों से भरे होंगे तथा रूप (दृश्य) भी रमणीय दिखाई देंगे।
 
इस तेरहवें वर्ष में राजा युधिष्ठिर जहां रहते होंगे, वहां के सब द्विज धर्म का पालन करते होंगे और धर्म स्वयं अपने गुणों से सम्पन्न होंगे। हे तात! जिस देश में पांडव रहते होंगे, वहां सब लोग परस्पर प्रेम करने वाले, संतोषी, पवित्र और अकाल मृत्यु से रहित होंगे। वहां लोग देवता और अतिथि की पूजा में सर्वात्मभाव से प्रीति रखने वाले, इष्ट और दान में महान उत्साह रखने वाले और अपने-अपने धर्म में तत्पर होंगे। जहां राजा युधिष्ठिर रहते होंगे वहां के मनुष्य अशुभ का त्याग करके शुभ की चाह करने वाले, यज्ञ में प्रीति करने वाले और शुभ व्रतों को धारण करने वाले होंगे।
 
हे तात ! जहां युधिष्ठिर रहते होंगे, वहां मनुष्य असत्य वचनों का त्याग करने वाले, शुभ, कल्याण तथा मंगल से युक्त, कल्याण की इच्छा वाले और शुभ बुद्धि वाले होंगे। वे नित्य परम सुख देने वाले शुभ कार्यों में तत्पर होंगे।

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हे तात ! ऐसे जिन धर्मात्मा युधिष्ठिर में सत्य, धैर्य, दान, पराशांति, अविचल क्षमा, लज्जा, श्री र्कीत, महान तेज, दयालुता, सरलता आदि गुण नित्य निवास करते हैं, उन धर्मराज को ब्राह्मण भी नहीं पहचान सकते, फिर साधारण मनुष्य को पहचान ही कैसे सकते हैं।

वस्तुत: धर्म का पालन और आसुरी सम्पदा रूप अधर्म का त्याग करने से ही मनुष्य सदा के लिए परम शांति और परमानंद को प्राप्त हो सकता है। वह स्वयं ही सुखी होता है, ऐसी बात नहीं, वह जिस गांव, जिस नगर में रहता है, उसमें जितने लोग रहते हैं, प्राय: सबको अपने धर्मबल से सुखी बना सकता है। जहां सच्चा धर्मात्मा मनुष्य रहता है वहां उसके धर्म के प्रताप से भूकंप, महामारी, अकाल आदि दैवी कोप से प्रजा पीड़ित नहीं हो सकती। दैवयोग से यदि कभी ऐसी कोई विपत्ति आ जाती है तो भी उनकी परोपकार वृत्ति से लोग उस विपत्ति से सहज ही छूट जाते हैं। 

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