शिक्षाग्रह पुरस्कार: सक्षम नेतृत्व से बदलेगी देश की शिक्षा: प्रो. सुब्रमणियन रंगन

Edited By Updated: 03 Feb, 2026 12:36 PM

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शिक्षाग्रह पुरस्कार के ज्यूरी चेयर प्रो. सुब्रमणियन रंगन कहते हैं कि शिक्षा में असली बदलाव तकनीक से नहीं, बल्कि ऐसे नेतृत्व से आएगा जो बच्चों की सीखने की क्षमता को सशक्त कर उन्हें भविष्य के लिए तैयार करे।

नई दिल्ली/टीम डिजिटल। शिक्षाग्रह पुरस्कार के ज्यूरी चेयर प्रो. सुब्रमणियन रंगन कहते हैं कि शिक्षा में असली बदलाव तकनीक से नहीं, बल्कि ऐसे नेतृत्व से आएगा जो बच्चों की सीखने की क्षमता को सशक्त कर उन्हें भविष्य के लिए तैयार करे।

1.प्रश्न: आप इस वर्ष शिक्षाग्रह पुरस्कार की ज्यूरी के चेयर हैं। इस पहल ने आपको किस तरह प्रेरित किया और आपके अनुसार आज के शैक्षिक दृष्टिकोण में यह पहल क्यों आवश्यक और समयोचित है?

 उत्तर: भारत का युवा डिविडेंड तभी सार्थक होगा जब हमारे बच्चे मानसिक रूप से संतुलित, उत्पादक और समाज से जुड़े हुए बनें। बच्चों को भविष्य के लिए तैयार करने के लिए उनकी सीखने की प्रक्रिया को सशक्त करना अनिवार्य है। सीखना ही वह ताला है; और रुचिकर, संलग्न करने वाली शिक्षा वह चाबी है जो इसे खोलती है। शिक्षाग्रह के पुरस्कार प्राप्तकर्ता वे लोग हैं जो इस ताले को खोलने के नयाब रास्ते ढूँढते हैं — वे सीखने को साध्य बनाने में प्रयोगरत और नवाचारी हैं।
वे बुनियादी ढांचे से लेकर खेल-आधारित शिक्षण तक की चुनौतियों को नवाचार, दृढ़ता और समावेशन के साथ संबोधित करते हैं। ये उदाहरण हमें बताते हैं कि तत्काल चमत्कार नहीं होते, पर शिक्षा नेतृत्व से कक्षाएँ, समुदाय और देश धीरे-धीरे बदलते हैं। इसलिए मुझे इस आंदोलन ने आकर्षित किया—यह परिवर्तनकारी शिक्षा नेतृत्व की मान्यता देता है।
 जहाँ तकनीक और एआई पर ध्यान बढ़ा है, वहीं असल में शिक्षा नेतृत्व ही सीखने, विकास, उत्पादकता और सामाजिक कल्याण की नींव बना रहेगा।

2. प्रश्न: ज्यूरी चेयर के नाते नामांकनों का आकलन करते समय आप किन मानदंडों को सबसे अधिक महत्व देते हैं? किन नेतृत्व-कुशलताओं पर आपका जोर रहता है?

उत्तर: सबसे पहले हम उन लोगों को महत्व देते हैं जो बुनियादी परंतु निर्णायक चुनौतियों से जूझ रहे हैं, जैसे स्कूल की मूल संरचना, खेल के माध्यम से सीखना, जातिगत असमानताएँ तोड़ना, सुरक्षा सुनिश्चित करना और नशीले पदार्थों से रोकथाम। ये मुद्दे हल हुए बिना सीखना संभव नहीं।
हमें केवल जोश नहीं चाहिए; टिकाऊ परिवर्तन के लिए सहनशीलता और लगातार सुधार की आदतें जरूरी हैं। छोटे-छोटे, नियमित और उद्देश्यपूर्ण कार्य समय के साथ बड़ा प्रभाव देते हैं, यही हम प्राथमिकता देते हैं। 
नवाचार भी अहम है, जटिल समस्याओं के लिए ताज़ा सोच और नए समाधान। और अंततः सूक्ष्म-सुधारों (micro-improvements) का असर देखना पड़ता है: क्या ये सूक्ष्म-सुधार मापनीय सीखने के नतीजे दे रहे हैं? सच्चा शैक्षिक नेतृत्व हर बच्चे के सीखने के मार्ग खोलता है।


3. प्रश्न: लॉन्च वर्ष 2024–25 में नामांकन समीक्षा के दौरान आपको क्या अप्रत्याशित या खास मिला — कोई ऐसा पैटर्न जो आपने बार-बार देखा?

उत्तर: जो सबसे अलग लगा वह यह था कि ये नेता केवल आइडिया तक सीमित नहीं थे — उन्होंने जमीनी समस्याओं का सामना किया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि दूरदराज के इलाकों में भी बच्चे पढ़ें, या वह काम किया जिससे लड़कियाँ स्कूल तक पहुँच सकें। उनके समाधान जमीनी समझ पर आधारित थे और ऐसे बनाये गए थे कि वे कठिनाइयों और बाधाओं के बावजूद टिके रहें। ये नेता संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करते, व्यवहारिक लक्ष्य रखते और ऐसी प्रणालियाँ बनाते जो उनके न रहने पर भी काम करती रहें। वे जानते थे कि शिक्षा में बदलाव सालों में आता है, महीनों में नहीं। उन्होंने परिवारों, समुदायों, प्रशासन और व्यवसायों के साथ साझेदारी बनाकर स्थायी प्रभाव के लिए आधार तैयार किया।
 सबसे प्रभावशाली बात यह थी कि वे केवल अच्छे शिक्षक ही नहीं, बल्कि समग्र सीखने के सिस्टम को मजबूत करने वाले ‘लर्निंग-बूस्टर’ थे — और इन्हीं को शिक्षाग्रह सम्मान देता है।


4. प्रश्न: आप अक्सर कहते हैं कि नेतृत्व पदनामों से कहीं ऊपर होता है। शिक्षाग्रह का मॉडल आपके उस अकादमिक नज़रिए से किस तरह मेल खाता है जिसमें आप 'सक्षम करने वाला नेतृत्व' देखते हैं?

उत्तर: शिक्षाग्रह का सार यही है कि नेतृत्व पद-आधारित नहीं बल्कि संबंध-आधारित है। मेरे शोध का फोकस भी यही रहा है — पारंपरिक नेतृत्व से हटकर ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता जो दूसरों को सक्षम बनाए। इन शिक्षण नेताओं ने सामूहिक कार्रवाई जुटाना, समुदायों को सक्रिय करना और दूसरे लोगों की संभावनाओं को उजागर करना सीख लिया है। अर्थव्यवस्था लेन-देनों पर टिकी है, पर समाज रिश्तों से बँधा है — और यही सोच हमें ऐसे नेतृत्व की तरफ ले जाती है जो शिक्षा समानता को आगे बढ़ाकर समाज के जीवन स्तर और आजीविका पर असर डाल सके।

5. प्रश्न: शिक्षाग्रह का लक्ष्य 2030 तक सूक्ष्म-सुधारों के ज़रिये दस लाख सरकारी स्कूलों तक असर पहुँचाना है। किस तरह के सूक्ष्म हस्तक्षेप सबसे जल्दी और टिकाऊ तरीके से बढ़ाए जा सकते हैं?

उत्तर: जब हम सूक्ष्म-सुधारों को विस्तृत पैमाने पर ले जाने की बात करते हैं तो सबसे पहले रिश्तों और जुड़ाव को मजबूत करने वाले उपाय उठते हैं—छात्र-छात्र, शिक्षक-छात्र, शिक्षक-अभिभावक और स्कूल-समुदाय के बीच। ऐसे संबंध बदले हुए व्यवहार और साझेदारी को जन्म देते हैं; जब ये मजबूत होते हैं, तो बाकी सब कुछ स्वाभाविक रूप से सुधरता है। डिजिटल उपकरण इस प्रभाव को तेज कर सकते हैं—एक शिक्षक का सफल अभ्यास साझा होने पर हजारों शिक्षकों तक पहुँच सकता है। तकनीक तब प्रभावी होती है जब वह शिक्षकों और नेतृत्व को जोड़ती है और सफल प्रथाओं को फैलाती है। साथ ही, छोटे-छोटे दैनिक अभ्यास जो चरित्र और व्यवहार बनाते हैं—सहानुभूति, ईमानदारी, सहयोग—वे भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितना साक्षरता और गणितीय कौशल। ताकत किसी एक कदम में नहीं, बल्कि इन सभी छोटे सुधारों के परस्पर जुड़ने में निहित है।


6. प्रश्न: स्थानीय स्तर पर स्थायी शिक्षा समानता के लिये सरकार, नागरिक समाज और शैक्षणिक संस्थानों के बीच किस तरह की साझेदारी आवश्यक है?

उत्तर: वास्तविक परिवर्तन तभी संभव है जब विभिन्न पक्ष साथ आएँ। सरकार और व्यवसाय नियमावली और संसाधन दे सकते हैं, पर स्थानीय समुदाय, नागरिक समाज और शैक्षणिक संस्थान मिलकर ही समावेशी समाधान बनाते हैं। समुदाय स्थानीय-संदर्भ की समझ देता है; नागरिक संगठनों से कमजोर समूहों की रक्षा और समर्थन होता है; शिक्षा संस्थान तकनीकी विशेषज्ञता और कार्यान्वयन क्षमता प्रदान करते हैं। इन सबका समन्वय जब होता है तो ही शिक्षा समानता और बेहतर सीखना संभव है। स्थानीय नेतृत्व खासकर प्रभावशाली होता है क्योंकि निकटता निर्णयों को स्थानीय संदर्भ में ढालने और लोगों का स्वामित्व सुनिश्चित करने में मदद करती है। जब माता-पिता, युवा और स्थानीय नेता सशक्त होते हैं, वे बदलाव के पैमाने को आगे बढ़ाते हैं। शिक्षाग्रह इसी काम को कर रहा है—बच्चों की सीखने की क्षमता को खोलकर उन्हें भविष्य के लिए तैयार और सक्षम नागरिक बनाने का प्रयास।

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