अमेरिका से बातचीत में ईरान ने ऊर्जा, खनन और विमान सौदों का रखा प्रस्ताव

Edited By Updated: 16 Feb, 2026 12:04 AM

iran proposes energy mining and aircraft deals in talks with us

अमेरिका-ईरान तनाव के बीच ईरान ने कहा है कि वह अमेरिका के साथ ऐसा परमाणु समझौता करना चाहता है जिससे दोनों देशों को आर्थिक फायदा हो। एक ईरानी राजनयिक ने रविवार को बताया कि तेहरान और वॉशिंगटन के बीच होने वाले दूसरे दौर की बातचीत से पहले ईरान आर्थिक...

इंटरनेशनल डेस्कः अमेरिका-ईरान तनाव के बीच ईरान ने कहा है कि वह अमेरिका के साथ ऐसा परमाणु समझौता करना चाहता है जिससे दोनों देशों को आर्थिक फायदा हो। एक ईरानी राजनयिक ने रविवार को बताया कि तेहरान और वॉशिंगटन के बीच होने वाले दूसरे दौर की बातचीत से पहले ईरान आर्थिक सहयोग के कई बड़े प्रस्ताव लेकर आया है।

ईरान और अमेरिका ने इस महीने की शुरुआत में अपने दशकों पुराने परमाणु विवाद को सुलझाने के लिए फिर से बातचीत शुरू की है। उद्देश्य है ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चल रहे तनाव को कम करना और किसी नए सैन्य टकराव से बचना।

सैन्य दबाव के बीच बातचीत

रॉयटर्स के अनुसार, अमेरिका ने क्षेत्र में अपना दूसरा एयरक्राफ्ट कैरियर भेज दिया है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि अगर बातचीत सफल नहीं होती है तो लंबा सैन्य अभियान भी चलाया जा सकता है। अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio ने ब्रातिस्लावा में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा कि राष्ट्रपति Donald Trump कूटनीतिक समाधान चाहते हैं, लेकिन यह तय नहीं है कि समझौता हो ही जाएगा। रुबियो ने कहा, “अब तक कोई भी ईरान के साथ सफल समझौता नहीं कर पाया है, लेकिन हम कोशिश करेंगे।”

ईरान का नरम रुख और आर्थिक प्रस्ताव

ईरान ने पहले चेतावनी दी थी कि अगर उस पर हमला हुआ तो वह मध्य पूर्व में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाएगा। लेकिन रविवार को उसका रुख थोड़ा नरम दिखाई दिया। विदेश मंत्रालय में आर्थिक कूटनीति के उप-निदेशक हमीद गनबरी ने कहा कि समझौते को लंबे समय तक टिकाऊ बनाने के लिए जरूरी है कि अमेरिका को भी जल्दी और बड़े आर्थिक फायदे मिलें। उन्होंने बताया कि तेल और गैस के साझा क्षेत्र, संयुक्त खनन निवेश और यहां तक कि विमान खरीद जैसे मुद्दे भी बातचीत में शामिल हैं। उनका कहना है कि साल 2015 के परमाणु समझौते से अमेरिका को पर्याप्त आर्थिक लाभ नहीं मिला था।

2015 का समझौता और 2018 में अमेरिका का बाहर होना

साल 2015 में ईरान ने कई विश्व शक्तियों के साथ परमाणु समझौता किया था, जिसके तहत उसने अपने परमाणु कार्यक्रम पर कुछ सीमाएं लगाईं और बदले में उस पर लगे प्रतिबंधों में राहत दी गई। लेकिन 2018 में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका को इस समझौते से बाहर कर लिया और ईरान पर फिर से कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए।

जिनेवा में होने वाली अहम बैठक

सूत्रों के मुताबिक, अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल जिसमें स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर शामिल हैं, मंगलवार को जिनेवा में ईरानी अधिकारियों से मुलाकात करेगा। इस बैठक की पुष्टि एक वरिष्ठ ईरानी अधिकारी ने भी की है। रुबियो ने कहा कि ये दोनों प्रतिनिधि अहम बैठकों के लिए रवाना हो चुके हैं, हालांकि उन्होंने ज्यादा जानकारी नहीं दी।

इस बार की बातचीत सिर्फ ईरान और अमेरिका के बीच हो रही है, जबकि 2015 की वार्ता कई देशों की भागीदारी से हुई थी। मौजूदा बातचीत में ओमान मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araqchi जिनेवा के लिए रवाना हो चुके हैं। वे वहां अमेरिका के साथ अप्रत्यक्ष परमाणु वार्ता में हिस्सा लेंगे और संयुक्त राष्ट्र की परमाणु निगरानी संस्था IAEA के प्रमुख से भी मुलाकात करेंगे।

समझौते पर समझौता करने की तैयारी, लेकिन शर्तों के साथ

ईरान के उप-विदेश मंत्री माजिद तख्त-रवांची ने बीबीसी से कहा कि अब यह अमेरिका पर निर्भर है कि वह साबित करे कि वह समझौता करना चाहता है। ईरान के परमाणु प्रमुख ने भी संकेत दिया है कि देश अपने सबसे अधिक संवर्धित यूरेनियम को कम स्तर पर लाने के लिए तैयार हो सकता है, अगर उस पर लगे प्रतिबंध हटा दिए जाएं। इसे ईरान की लचीलापन दिखाने वाली पहल माना जा रहा है।

हालांकि, ईरान ने साफ कर दिया है कि वह “शून्य यूरेनियम संवर्धन” की शर्त नहीं मानेगा। अमेरिका का मानना है कि ईरान में यूरेनियम संवर्धन परमाणु हथियार बनाने की दिशा में कदम हो सकता है, जबकि ईरान लगातार कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है।

सैन्य और आर्थिक दबाव जारी

जून में अमेरिका ने इज़राइल के साथ मिलकर ईरान के परमाणु ठिकानों पर हवाई हमले किए थे। इसके साथ ही अमेरिका आर्थिक दबाव भी बढ़ा रहा है। हाल ही में व्हाइट हाउस में हुई बैठक में राष्ट्रपति ट्रंप और इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने सहमति जताई कि अमेरिका ईरान के चीन को होने वाले तेल निर्यात को कम करने की दिशा में काम करेगा। रिपोर्ट के अनुसार, चीन ईरान के कुल तेल निर्यात का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा खरीदता है। अगर इस व्यापार में कमी आती है तो ईरान की तेल से होने वाली आय पर बड़ा असर पड़ सकता है।

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