इस्लामिक क्रांति दिवस पर ईरान का Shocking ऐलान: परमाणु हथियार नहीं बनाएंगे, अमेरिका से वार्ता को तैयार

Edited By Updated: 11 Feb, 2026 07:35 PM

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ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने इस्लामिक क्रांति की 47वीं वर्षगांठ पर कहा कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत और किसी भी सत्यापन के लिए तैयार है। हालांकि अमेरिका के दबाव, IAEA निरीक्षण संकट और क्षेत्रीय तनाव के बीच वार्ता का भविष्य...

International Desk:  अमेरिका के साथ परमाणु वार्ता अधर में लटकी होने के बीच ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने 1979 की इस्लामिक क्रांति की 47वीं वर्षगांठ पर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत के लिए तैयार है और उसका इरादा परमाणु हथियार बनाने का नहीं है। तेहरान में आयोजित वर्षगांठ समारोह में अपने संबोधन के दौरान पेजेश्कियन ने कहा, “हमारा देश परमाणु हथियार बनाने की कोशिश नहीं कर रहा है और किसी भी प्रकार के सत्यापन के लिए तैयार है।”

 

हालांकि, जमीनी हकीकत यह है कि संयुक्त राष्ट्र की परमाणु निगरानी संस्था IAEA बीते कई महीनों से ईरान के परमाणु भंडार का निरीक्षण और सत्यापन करने में असमर्थ रही है। इससे पश्चिमी देशों की चिंताएं और गहरी हो गई हैं। ईरान पर इस वक्त कई मोर्चों से दबाव बना हुआ है। एक ओर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा पश्चिम एशिया में एक और लड़ाकू विमानवाहक पोत भेजने की धमकी दी गई है, वहीं दूसरी ओर ईरान में हालिया देशव्यापी प्रदर्शनों और उनके हिंसक दमन को लेकर अंतरराष्ट्रीय आलोचना तेज़ है।

 

पेजेश्कियन ने अमेरिका और यूरोप पर अविश्वास का माहौल बनाने का आरोप लगाते हुए कहा, “अमेरिका और यूरोप ने अपने बयानों और कार्रवाइयों से अविश्वास की ऊंची दीवार खड़ी कर दी है, जो वार्ताओं को किसी नतीजे तक नहीं पहुंचने देती।”इसके बावजूद ईरानी राष्ट्रपति ने जोर देकर कहा कि उनका देश पड़ोसी देशों के साथ मिलकर क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के लिए पूरी दृढ़ता से बातचीत में जुटा हुआ है।

 

इसी कड़ी में ईरान का एक शीर्ष सुरक्षा अधिकारी बुधवार को कतर पहुंचा, जबकि इससे पहले वह ओमान का दौरा कर चुका था। ओमान इस दौर की परमाणु वार्ता में मुख्य मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। अधिकारी के कतर पहुंचने से ठीक पहले कतर के शासक और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के बीच फोन पर बातचीत भी हुई। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर परमाणु वार्ता विफल होती है, तो पश्चिम एशिया एक बार फिर व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष की ओर बढ़ सकता है। फिलहाल यह साफ नहीं है कि बातचीत किसी ठोस समझौते तक पहुंचेगी या नहीं।

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