उद्धव ठाकरे: मुख्यमंत्री जिनके कार्यकाल को बागियों ने पूरा नहीं होने दिया

Edited By Updated: 30 Jun, 2022 07:07 PM

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मुंबई, 30 जून (भाषा) वर्ष 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले तक बहुत लोगों ने नहीं सोचा होगा कि शिवसेना सुप्रीमो बाला साहेब ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे पुरानी सहयोगी भाजपा के साथ दशकों पुराने गठबंधन को तोड़कर मुख्यमंत्री बनेंगे एवं...

मुंबई, 30 जून (भाषा) वर्ष 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले तक बहुत लोगों ने नहीं सोचा होगा कि शिवसेना सुप्रीमो बाला साहेब ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे पुरानी सहयोगी भाजपा के साथ दशकों पुराने गठबंधन को तोड़कर मुख्यमंत्री बनेंगे एवं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) तथा कांग्रेस के साथ नामुमकिन माना जाने वाला गठबंधन कर सरकार का नेतृत्व करेंगे।
पिता बाला साहेब ठाकरे के आक्रामक रुख के उलट मृदु भाषी माने जाने वाले उद्धव ने नवंबर 2019 में तीन पार्टियों के गठबंधन महा विकास आघाडी (एमवीए) के मुखिया के तौर पर मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। वह परिवार के पहले सदस्य थे जिन्होंने कोई सार्वजनिक पद ग्रहण किया था। हिंदुत्व के चेहरा रहे उनके पिता, जिन्होंने शिवसेना की स्थापना की थी, ने कभी सार्वजनिक पद ग्रहण नहीं किया था, लेकिन वर्ष 1995-99 में बनी पहली शिवसेना-भाजपा गठबंधन सरकार को ‘‘रिमोट कंट्रोल’’ की भांति चलाया।
कुशल फोटोग्राफर उद्धव ठाकरे स्वभाव से मिलनसार हैं लेकिन 2019 के विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री पद की मांग भाजपा के सामने रखते हुए उन्होंने अपने पिता की तरह ही आक्रामक तेवर दिखाए थे।
उद्धव ठाकरे ने स्वयं कई बार कहा था कि महा विकास आघाडी बनने के बाद वह मुख्यमंत्री बनने के इच्छुक नहीं थे लेकिन राकांपा अध्यक्ष शरद पवार ने उनके शीर्ष पद की जिम्मेदारी लेने पर जोर दिया।
लेकिन सत्ता पर काबिज होने के करीब ढाई साल बाद मुख्यमंत्री के तौर पर उद्धव ठाकरे (61 वर्षीय) की राजनीतिक पारी बुधवार को अचानक समाप्त हो गई क्योंकि शिवसेना के वरिष्ठ नेता एकनाथ शिंदे ने उनसे बगावत कर दी थी और पार्टी के अधिकतर विधायक बागी गुट में शामिल हो गए थे।
बाल ठाकरे के सबसे छोटे बेटे उद्धव ठाकरे जिन्हें ‘‘दिग्गा’’के नाम से भी जाना जाता है, ने अपने पिता की पार्टी के कार्यों में 1990 से ही मदद करनी शुरू कर दी थी। उद्धव ठाकरे को 2003 में पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया जबकि उनके चचेरे भाई राज ठाकरे को अधिक करिश्माई और आक्रामक नेता माना जाता था। यह संयोग है कि राज ठाकरे ने स्वयं उद्धव ठाकरे का नाम इस पद के लिए महाबलेश्वर सम्मेलन में प्रस्तावित किया था।
उद्धव ठाकरे की इस पदोन्नति से अंतत: पार्टी में टूट हुई। वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे ने भी राज ठाकरे का अनुकरण किया और वर्ष 2005 में शिवसेना से अलग हो गए। हालांकि, इस झटके के बावजूद शिवसेना अहम बृह्नमुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) और ठाणे नगर निगम (टीएमसी) चुनाव वर्ष 2002,2007, 2012 और 2017 में जीतने में सफल रही।
वर्ष 2012 में जब बाल ठाकरे का निधन हुआ तो पार्टी के कई आलोचकों का कहना था कि शिवसेना समाप्त हो सकती है। लेकिन इन बातों को गलत साबित करते हुए उद्धव ठाकरे पार्टी को एकजुट रखने में सफल रहे। उन्होंने इसके साथ ही सड़क पर लड़ने वाली पार्टी की पुरानी छवि में बदलाव ला कर शिवसेना को अधिक परिपक्व राजनीतिक दल बनाने पर जोर दिया।

उद्धव ठाकरे वन्य जीव फोटोग्राफर हैं। महाराष्ट्र के कुछ किलों की उनके द्वारा खींची गई तस्वीरें दिल्ली में स्थापित नए महाराष्ट्र सदन की दीवारों पर लगी हैं।
ठाकरे ड्राइविंग करना भी पसंद करते हैं और बुधवार को वह स्वयं गाड़ी चलाकर ‘मातोश्री’ (ठाकरे परिवार का आवास) से राजभवन इस्तीफा सौंपने गए।
वर्ष 2014 में जब शिवसेना और भाजपा ने अलग-अलग चुनाव लड़ा, तब उद्धव ठाकरे ने पार्टी के प्रचार की जिम्मेदारी संभाली और शिवसेना विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी के बाद दूसरे सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। हालांकि, बाद में शिवसेना ने दोबारा भाजपा से हाथ मिलाया और राज्य में सरकार बनाई।
वर्ष 2019 में दोनों पार्टियां फिर मुख्यमंत्री पद को लेकर अलग हो गईं और शिवसेना ने कांग्रेस और राकांपा से हाथ मिला लिया।
ठाकरे ने पिछले हफ्ते फेसबुक लाइव पर कहा, ‘‘मैं जो भी करता हूं, चाहे इच्छा से या अनिच्छा से...मैं पूरी प्रतिबद्धता से करता हूं।’’
उनकी यह प्रतिबद्धता उनके पूरे राजनीतिक करियर में एक समान रही। उन्होंने कार्यकारी अध्यक्ष और बाला साहेब ठाकरे के निधन के बाद पूर्णकालिक पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद के कार्यकाल में बगावत सहित शिवसेना में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं।

उनके कार्यकाल में कोरोना वायरस महामारी का सबसे बुरा दौर आया जिसमें उनके कार्य की प्रशंसा हुई। लेकिन शिवसेना नेताओं के एक धड़े ने शिकायत की कि मुख्यमंत्री और पार्टी अध्यक्ष उनकी पहुंच से दूर हैं।
कई शिवसेना नेता घोर विरोधी कांग्रेस और राकांपा से गठबंधन को भी लेकर असहज थे।

पार्टी में नाराजगी उस समय अपने चरम पर पहुंची जब शिंदे ने खुले तौर पर बगावत कर दी और कई विधायक उनके पक्ष में चले गए। इस बगावत के बाद कई राजनीतिक घटनाएं हुई और ठाकरे ने पिछले सप्ताह अपना आधिकारिक आवास छोड़ दिया। अंतत: उन्होंने सदन में विश्वासमत हासिल करने से पहले ही मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया।
इस बीच, ठाकरे ने स्पष्ट किया है कि भले ही उन्होंने मुख्यमंत्री का पद छोड़ दिया है लेकिन वह पार्टी मुख्यालय शिवसेना भवन में बैठेंगे और कार्यकताओं व नेताओं से मिलेंगे।

अब ठाकरे के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी को एकजुट रखने और बगावत की वजह से कमजोर हो चुकी पार्टी को फिर से मजबूत स्थिति में लाने की होगी।


यह आर्टिकल पंजाब केसरी टीम द्वारा संपादित नहीं है, इसे एजेंसी फीड से ऑटो-अपलोड किया गया है।

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