Edited By Niyati Bhandari,Updated: 13 Mar, 2026 08:21 AM
Dasha Mata Ki Katha दशा माता की कथा: हिंदू धर्म में दशा माता का व्रत विशेष महत्व रखता है। यह व्रत चैत्र कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को रखा जाता है। वर्ष 2026 में यह पर्व 13 मार्च को मनाया जा रहा है। इस दिन महिलाएं अपने घर-परिवार की सुख-समृद्धि और अच्छे...
Dasha Mata Ki Katha दशा माता की कथा: हिंदू धर्म में दशा माता का व्रत विशेष महत्व रखता है। यह व्रत चैत्र कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को रखा जाता है। वर्ष 2026 में यह पर्व 13 मार्च को मनाया जा रहा है। इस दिन महिलाएं अपने घर-परिवार की सुख-समृद्धि और अच्छे समय की कामना के लिए व्रत रखती हैं तथा विधि-विधान से दशा माता की पूजा करती हैं।
इस व्रत में महिलाएं कच्चे सूत का 10 तार वाला डोरा बनाती हैं, जिसमें 10 गांठें लगाई जाती हैं। इसके बाद महिलाएं पीपल के पेड़ की पूजा करती हैं और यह डोरा गले में धारण करती हैं। मान्यता है कि ऐसा करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है और जीवन की बुरी दशा समाप्त हो जाती है।
दशा माता की पावन कथा
धार्मिक मान्यता के अनुसार प्राचीन समय में राजा नल नाम के एक प्रतापी राजा थे और उनकी पत्नी का नाम रानी दमयंती था। उनके राज्य में सभी लोग सुख और शांति से जीवन व्यतीत करते थे।
एक दिन एक ब्राह्मणी रानी के पास आई। उसके गले में एक पीला डोरा बंधा हुआ था। रानी ने उससे उस डोरे के बारे में पूछा। तब ब्राह्मणी ने बताया कि यह दशा माता का डोरा है। इसे धारण करने से घर में धन-धान्य और सुख-समृद्धि बनी रहती है। उसने रानी को भी एक डोरा दे दिया और रानी ने उसे अपने गले में पहन लिया।
जब राजा ने रानी के गले में डोरा देखा तो उन्होंने पूछा कि यह क्या है। रानी ने पूरी बात बताई, लेकिन राजा ने कहा कि तुम्हें किसी चीज की कमी नहीं है, इसलिए यह डोरा पहनने की आवश्यकता नहीं है। राजा ने क्रोध में आकर वह डोरा तोड़कर फेंक दिया।
रानी ने राजा को ऐसा न करने के लिए कहा, लेकिन राजा नहीं माने। उसी रात राजा को स्वप्न में दशा माता वृद्धा के रूप में दिखाई दीं और बोलीं, “हे राजा, तूने मेरा अपमान किया है। अब तेरी अच्छी दशा समाप्त होगी और बुरी दशा शुरू होगी।”
इसके बाद राजा की संपत्ति, सुख और वैभव धीरे-धीरे नष्ट होने लगा।
राजा-रानी को छोड़ना पड़ा अपना राज्य
स्थिति इतनी खराब हो गई कि राजा और रानी को अपना राज्य छोड़कर दूसरे देश जाना पड़ा। रास्ते में उन्होंने अपने दोनों बच्चों को एक भील राजा के महल में अमानत के रूप में छोड़ दिया।
आगे चलते हुए वे राजा के एक मित्र के गांव पहुंचे। मित्र ने उनका खूब आदर-सत्कार किया और उन्हें अपने शयन कक्ष में ठहराया। उसी कमरे में एक खूंटी पर उसकी पत्नी का हीरों का हार टंगा था।
रात में रानी ने देखा कि वह खूंटी उस हार को निगल रही है। यह देखकर दोनों डर गए और सोचा कि सुबह हार गायब मिलेगा तो उन पर चोरी का आरोप लगेगा। इसलिए वे रात में ही वहां से चले गए।
सुबह जब हार नहीं मिला तो मित्र की पत्नी ने राजा-रानी पर चोरी का आरोप लगा दिया, हालांकि मित्र को अपने दोस्त पर विश्वास था।
रास्ते में कई कठिन परीक्षाएं
आगे चलते हुए वे राजा की बहन के गांव पहुंचे। बहन ने उनकी हालत देखकर केवल कांदा-रोटी दी। राजा ने तो खा ली, लेकिन रानी ने उसे जमीन में गाड़ दिया।
फिर रास्ते में नदी मिली। राजा ने मछलियां पकड़कर रानी से उन्हें भूनने को कहा और स्वयं भोजन लेने गांव गए। वहां से भोजन लेकर लौटते समय एक चील ने झपट्टा मारकर सारा भोजन गिरा दिया।
उधर रानी मछलियां भूनने लगी, लेकिन दुर्भाग्य से मछलियां जीवित होकर वापस नदी में चली गईं। दोनों एक-दूसरे के बारे में गलतफहमी में थे, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा और आगे बढ़ गए।
रानी बनी अपने ही महल में दासी
आगे चलकर वे रानी के मायके के गांव पहुंचे। रानी महल में दासी बनकर काम करने लगी और राजा ने एक तेली के घाने पर काम शुरू कर दिया।
कुछ समय बाद दशा माता के व्रत का दिन आया। सभी रानियों के साथ दासी ने भी स्नान किया और उनके बाल संवारने लगी। जब राजमाता ने उसके सिर में पद्म का चिन्ह देखा तो उन्हें अपनी बेटी की याद आ गई और उनकी आंखों से आंसू निकल पड़े।
तब दासी ने बताया कि वह उनकी ही बेटी दमयंती है और दशा माता के प्रकोप के कारण उसकी यह स्थिति हुई है। उसने दशा माता का व्रत रखकर क्षमा मांगी।
इसके बाद राजा नल को भी ढूंढकर महल में लाया गया और उनका सम्मान किया गया।
दशा माता की कृपा से बदली किस्मत
दशा माता के व्रत और पूजा के बाद धीरे-धीरे राजा नल और दमयंती की बुरी दशा समाप्त होने लगी। वे अपने बच्चों को भी वापस ले आए और फिर अपने राज्य लौट गए। नगरवासियों ने उनका भव्य स्वागत किया और दशा माता की कृपा से उनका राज्य, धन और वैभव सब कुछ वापस मिल गया।
धार्मिक मान्यता
मान्यता है कि दशा माता का व्रत श्रद्धा और विश्वास के साथ करने से जीवन की बुरी दशा समाप्त होती है और सुख-समृद्धि आती है। इसलिए महिलाएं इस दिन व्रत रखकर कथा सुनती हैं और पीपल के पेड़ की पूजा करती हैं।