विकेंद्रीकृत भंडारण, सशक्त किसान: सहकारिता क्षेत्र में दुनिया की सबसे बड़ी अनाज भंडारण योजना

Edited By Updated: 28 Apr, 2026 02:09 PM

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भारत आज वैश्रिक कृषि मानचित्र पर एक महाशिक्त के रूप में स्थापित है, जो दुनिया के शीर्ष दस खाद्य उत्पादकों में अपनी जगह बनाए हुए है। लेकिन 311 MMT से अ धक के रिकॉड उत्पादन के बावजूद, भारतीय कृषि के सामने सबसे बड़ी समस्या भंडारण की भारी कमी रही है।...

नेशनल डेस्क: भारत आज वैश्रिक कृषि मानचित्र पर एक महाशिक्त के रूप में स्थापित है, जो दुनिया के शीर्ष दस खाद्य उत्पादकों में अपनी जगह बनाए हुए है। लेकिन 311 MMT से अ धक के रिकॉड उत्पादन के बावजूद, भारतीय कृषि के सामने सबसे बड़ी समस्या भंडारण की भारी कमी रही है। वर्तमान में उत्पादन और भंडारण क्षमता के बीच लगभग 47% का विशाल अंतर है, जिसका सीधा खामियाजा देश के अन्नदाता को भुगतना पड़ता है।

पयाप्त सुविधाओं के अभाव में हर साल हजारों करोड़ का अनाज खेतों से मंडियों तक पहुचंने से पहले ही नमी, कीटों और खराब प्रबंधन के कारण नष्ट हो जाता है। इस बुनयादी संकट को जड़ से समाप्त करने के लए भारत सरकार ने एक क्रांतिकारी और ऐतिहासिक कदम उठाया है, सहकारी क्षेत्र में वश्व की सबसे बड़ी अनाज भंडारण योजना। यह केवल ईंट और कंक्रीट के गोदाम बनाने की योजना नहीं है, बिल्क यह प्राथिमक कृषि ऋण समतयों (PACS) के विशाल नेटवक का लाभ उठाकर खेती की पूरी आपूति श्रृंखला को बदलने का एक महा-अ भयान है। इस वकेंद्रीकृत प्रणाली का उद्देश्य कसानों को बिचौलियों के चंगुल और मजबूरी में बक्री से बचाकर उन्हें अपनी उपज का सही मूल्य दलाने के लए सशक्त बनाना है।

 भारत में कृषि भंडारण चुनौतियां और वर्तमान परिदृश्य 
 भारत दुनिया के प्रमुख कृषि उत्पादक देशों में से एक है, वर्तमान में भारत की कुल भंडारण क्षमता लगभग 145 MMT ( मिलियन मीट्रिक टन) है, जबिक वार्षिक खाद्यान्न उत्पादन 311 MMT से अधिक हो चुका है। इसका सीधा अथ है क देश में लगभग 47% (यानी 166 MMT) भंडारण क्षमता की कमी है। पारंपरक भंडारण और सरकारी क्षमता  आंकड़ों के अनुसार, उत्पा दत अनाज का लगभग 60-70% हस्सा छोटे कसानों द्वारा घरेलू स्तर पर ही रखा जाता है। भंडारण के ये पारंप रक तरीके अक्सर गैर-वैज्ञा नक होते हैं, जिससे अनाज की गुणवत्ता प्रभावित होती है। वहीं अगर सरकारी तंत्र की बात करें, तो जुलाई 2024 तक भारतीय खाद्य नगम (FCI) और अन्य राज्य एजें सयों के पास कुल 837.68 लाख मी ट्रक टन ढकी हुई भंडारण क्षमता उपलब्ध थी। कोल्ड स्टोरेज और बबादी का संकट अनाज के साथ-साथ फलों और सिब्जयों की स्थित भी चंताजनक है। अपयाप्त कोल्ड चेन सु वधाओं के कारण 40% फल और सिब्जयां खराब हो जाती हैं। नेशनल सेंटर फॉर कोल्ड चेन डेवलपमेंट (NCCD) के अनुमान के मुता बक, भारत में 12.6 म लयन टन कोल्ड स्टोरेज क्षमता की कमी है। इसके अलावा, बु नयादी ढांचे का वतरण भी असमान है; भारत की कुल कोल्ड स्टोरेज क्षमता का लगभग 60% हस्सा केवल चार राज्यों में कें द्रत है, जिससे अन्य क्षेत्रों के कसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। 

अर्थिक और भौतिक नुकसान 
खराब भंडारण प रिस्थ तयों का खा मयाजा देश को आ थक रूप से भी भुगतना पड़ रहा है। खराब रखरखाव के कारण लगभग 6.58% खाद्यान्न नष्ट हो जाता है। एक अनुमान के अनुसार, देश को हर साल ₹7,000 करोड़ से अ धक का वा षक भंडारण नुकसान होता है। भंडारण की कमी से होने वाले गंभीर नुकसान औने-पौने दाम पर मजबूरी में बक्री : जब कसानों के पास फसल रखने की सुर क्षत जगह नहीं होती, तो वे 'मजबूरी में बक्री' का शकार होते हैं। फसल कटते ही बाजार में आवक बढ़ जाती है, जिससे कीमतें गर जाती हैं। भंडारण की सु वधा न होने के कारण कसान कीमतों के बढ़ने का इंतजार नहीं कर पाते और उन्हें अपनी मेहनत की उपज बचौ लयों या व्यापा रयों को बहुत कम दामों पर बेचनी पड़ती है।

 निजी भंडारण का भारी खर्च
बता अगर निजी भंडारण की करे तो जो किसान अपनी फसल को बचाना चाहते हैं, उन्हें नजी कोल्ड स्टोरेज या गोदामों का सहारा लेना पड़ता है। इन नजी केंद्रों का किराया इतना अधिक होता है कि छोटे और सीमांत कसानों के लए इसे वहन करना नामुमिकन हो जाता है। अक्सर भंडारण का किराया और परिवहन लागत इतनी बढ़ जाती है कि अंत में किसान का मुनाफा न के बराबर रह जाता है।

 कर्ज का चक्र में किसान 
 ज्यादातर किसान खेती के लिए साहूकारों या बैंकों से कर्ज लेते हैं। फसल कटने के तुरंत बाद उन्हें यह कर्ज चुकाना होता है। भंडारण की जगह न होने पर वे फसल को तुरंत बेच देते हैं, भले ही उस समय भाव कम क्यों न हो। कम कीमत मलने के कारण वे अपना पूरा कज नहीं उतार पाते और अगले सीजन के लिए  कर्ज लेने को मजबूर हो जाते हैं, जिससे वे 'कर्ज के जाल' में फंस जाते हैं।

फसल की गुणवत्ता में गिरावट
भंडारण की वैज्ञानिक सुविधा न होने पर किसान अनाज को कच्चा या खुले में रखते हैं। नमी  के कारण अनाज में कवक लग जाता है और एफ्लाटॉक्सन जैसे जहरीले तत्व पैदा हो जाते हैं, जिससे वह अनाज खाने योग्य नहीं रहता। इसके अलावा, चूहों और कीटों का हमला अनाज के वजन और गुणवत्ता दोनों को कम कर देता है, जिससे बाजार में उसकी वैल्यू और गर जाती है। 

मौसम की मार और असुरक्षा
भारत में अक्सर बेमौसम बारिश या ओलावृष्टि होती है। जब अनाज को कवड गोडाउन के बजाय तरपाल के नीचे या खुले आसमान के नीचे रखा जाता है, तो बारिश का पानी अनाज को सड़ा देता है। यह न केवल आर्थिक नुकसान है, बिल्क देश की खाद्य सुरक्षा के लिए भी एक बड़ा खतरा है। 

सहकार  से समृद्ध: गांव की उपज, गांव में ही सुरक्षा
 भारत सरकार की सहकार से समृद् ध प रकल्पना के तहत अनाज भंडारण योजना के तहत PACS (प्राथमिक कृषि ऋण समितियां) को अनाज भंडारण के आधु नक केंद्रों के रूप में वक सत कया जा रहा है, जो ग्रामीण अथव्यवस्था की तस्वीर बदल सकता है। इस योजना का सबसे बड़ा लाभ वकेंद्रीकृत भंडारण है, जिससे अब कसानों को अपनी उपज दूर के शहरों में ले जाने की जरूरत नहीं होगी । उनके अपने गांव या ब्लॉक स्तर पर ही अत्याधु नक गोदाम उपलब्ध होंगे। ये गोदाम सहकारी स म तयों द्वारा संचा लत होने के कारण नजी गोदामों की तुलना में काफी सस्ते और सुलभ होंगे, जिससे छोटे किसानों पर आ थक बोझ कम होगा। 

केंद्रीकृत भंडारण: गांव से मंडी तक की नई व्यवस्था
सरकार ने अब पारंप रक केंद्रीकृत मॉडल (जहां अनाज को गांव से दूर बड़े FCI गोदामों में भेजा जाता था) को बदलकर वकेंद्रीकृत मॉडल अपनाया है। इस नई व्यवस्था के तहत, प्रत्येक ब्लॉक स्तर पर और हर पंचायत की जमीन पर PACS के माध्यम से आधुनिक गोदाम बनाए जा रहे हैं। इसका सबसे बड़ा उद्देश्य प रवहन की अनावश्यक लागत और समय को बचाना है। जब किसान के पास अपने ही गांव या पंचायत में भंडारण की सुविधा होगी, तो उसे अपनी उपज को दूर की मं डयों या सरकारी खरीद केंद्रों तक ले जाने के लए भारी कराया नहीं चुकाना पड़ेगा। यह मॉडल न केवल भंडारण की समस्या सुलझाता है, बिल्क राशन दुकानों (PDS) की कायक्षमता को भी बढ़ाता है। स्थानीय स्तर पर भंडारण होने से, भारतीय खाद्य नगम (FCI) को अनाज ढोने की लंबी प्रकिया से मुक्ति मलेगी और वहीं अनाज सीधे स्थानीय राशन दुकानों तक पहुंचाया जा सकेगा। इससे अनाज के रखरखाव में होने वाला नुकसान कम होगा और सरकार का लॉजिस्टक्स खच भी बचेगा, जिसका सीधा लाभ अंततः कसानों और उपभोक्ताओं को मलेगा। 

विश्व की सबसे बड़ी अनाज भंडारण योजना में NABARD का योगदान
NABARD (राष्ट्रीय कृ ष और ग्रामीण वकास बैंक) भारत सरकार की "सहकारी क्षेत्र में वश्व की सबसे बड़ी अनाज भंडारण योजना" के सफल कायान्वयन में एक महत्वपूण रणनी तक भागीदार के रूप में काय कर रहा है। यह संस्थान न केवल राज्य सहकारी बैंकों (StCBs) और जिला केंद्रीय सहकारी बैंकों (DCCBs) को योजना के प्रभावी निष्पादन के लिए निरंतर मार्गदर्शन और तकनीकी सहायता प्रदान कर रहा है, बिल्क बुनियादी ढांचे के नमाण के लए आवश्यक वत्तीय मजबूती भी सु निश्चत कर रहा है। योजना के शुरुआती चरण में, NABARD और इसकी परामश शाखा (NABCONS) के सहयोग से ही देश के 11 राज्यों के 11 PACS (प्राथामिक कृषि ऋण समितियों) में सफलतापूवक गोदामों का नमाण कर 9,750 मी ट्रक टन की भंडारण क्षमता वक सत की गई है। वत्तीय मोच पर, NABARD अपनी ' वशेष पुन वत्त योजना' (Special Refinance Scheme) के माध्यम से PACS को 'बहु-सेवा केंद्रों' (MSC) के रूप में वक सत करने के लए अत्यंत सस्ती दरों पर धन उपलब्ध करा रहा है। NABARD द्वारा राज्य सहकारी बैंकों को 3% की रयायती दर पर पुन वत्त दया जाता है, जिससे PACS को केवल 4% की दर पर ऋण मल पाता है। सबसे महत्वपूण बात यह है क जब इसे 'कृ ष अवसंरचना कोष' (AIF) के साथ जोड़ा जाता है, तो मलने वाली 3% की अ त रक्त ब ्याज छूट के कारण PACS के लए प्रभावी ब्याज दर घटकर मात्र 1% रह जाती है। NABARD इन स म तयों को क्रे डट गारंटी की सु वधा भी प्रदान कर रहा है, िजससे ग्रामीण स्तर पर अनाज भंडारण की वयवस्था को आधुनिक, कफायती और टकाऊ बनाने में मदद मल रही है। 

योजना का विस्तार और वर्तमान प्रगति 
सहकारी क्षेत्र में वश्व की सबसे बड़ी अनाज भंडारण योजना को 31 मई 2023 को मंजूरी दी गई थी, जो अब अपने सफल कायान्वयन के चरण में है। इस योजना के पायलट प्रोजेक्ट के तहत 11 राज्यों की 11 पैक्स (PACS) में 9,750 मी ट्रक टन की कुल भंडारण क्षमता सफलतापूवक वक सत की जा चुकी है। पायलट प ् रोजेक्ट की सफलता से उत्सा हत होकर, राज्य और केंद्र शा सत प्रदेशों की सरकारों ने इस योजना के वस्तार के लए 500 से अ धक अ त रक्त पैक्स (PACS) की पहचान की है। यह पूरी प रयोजना 'होल-ऑफ-गवनमेंट'दृिष्टकोण पर आधा रत है, जहाँ कृ ष अवसंरचना कोष (AIF), कृ ष वपणन अवसंरचना योजना (AMI), कृ ष यंत्रीकरण पर उप- मशन (SMAM) और प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना जैसी प्रमुख योजनाओं को एक साथ जोड़कर  वत्तीय सहायता प्रदान की जा रही है। इस योजना के तहत पैक्स (PACS) को न केवल भंडारण केंद्र, बिल्क खरीद केंद्र और प्रसंस्करण इकाइयों के रूप में भी सशक्त बनाया जा रहा है| 

समृद्ध किसान और आत्मनिर्भर भारत की ओर ठोस कदम 
भारत में कृषि भंडारण की समस्या दशकों पुरानी है, ले कन सरकार द्वारा उठाए गए ये मजबूत कदम इस संकट को एक अवसर में बदलने की क्षमता रखते हैं। गांव और ब्लॉक स्तर पर PACS के माध्यम से गोदामों का जाल बछाना केवल अनाज को सुरक्षित रखना नहीं है, बिल्क यह कसान को आ थक सवतंत्रता देने की दशा में एक बड़ा बदलाव है। जब कसान को अपनी ही पंचायत की जमीन पर सस्ता और वैज्ञानिक भंडारण मलेगा, तो उसे प रवहन की भारी लागत और मजबूरी में कम दाम पर बक्री जैसे दोहरे नुकसान से मुक्ति मलेगी। यह मॉडल न केवल स्थानीय स्तर पर राशन दुकानों (PDS) की आपू त को सुगम बनाएगा, बिल्क भारतीय खाद्य नगम (FCI) के लॉजिस्टक्स खच में भी करोड़ों रुपये की बचत करेगा। सहकारी स म तयों की भागीदारी और वकेंद्रीकृत भंडारण का यह तालमेल भारत की खाद्य सुरक्षा को मजबूत करेगा और खेत से थाली तक की बबादी को न्यूनतम स्तर पर ले जाएगा। यह योजना सही मायने में सहकारिता से समृद्धि के सपने को साकार करते हुए भारतीय कसानों को वैश्विक मानकों के करीब खड़ा करेगी। 
 

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