कभी सत्ता की सबसे ताकतवर चेहरें थीं मायावती-ममता, अब राजनीतिक अस्तित्व बचाने की जंग...आखिर जनता ने क्या मोड़ लिया मुंह?

Edited By Updated: 27 May, 2026 08:58 PM

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उत्तर प्रदेश में मायावती और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी कभी राजनीति की सबसे ताकतवर महिला नेताओं में गिनी जाती थीं। एक दौर ऐसा था जब इन दोनों नेताओं के फैसलों से प्रदेश की राजनीति की दिशा तय होती थी। लेकिन बदलते राजनीतिक समीकरण और कमजोर होते जनाधार...

नेशनल डेस्क: उत्तर प्रदेश में मायावती और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी कभी राजनीति की सबसे ताकतवर महिला नेताओं में गिनी जाती थीं। एक दौर ऐसा था जब इन दोनों नेताओं के फैसलों से प्रदेश की राजनीति की दिशा तय होती थी। लेकिन बदलते राजनीतिक समीकरण और कमजोर होते जनाधार ने अब इन दोनों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। जहां मायावती अपने राजनीतिक वजूद को बचाने की जंग लड़ रही हैं, वहीं ममता बनर्जी के सामने पार्टी के विधायकों और सांसदों को एकजुट बनाए रखने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।

यूपी में क्यों कमजोर हुई मायावती 
Mayawati उत्तर प्रदेश में चार बार मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। उनका आखिरी कार्यकाल 13 मई 2007 से 15 मार्च 2012 तक रहा, जब बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई थी। उसके बाद से Mayawati का जनाधार कुछ वर्षों में लगातार कमजोर हुआ है। इसके पीछे कई राजनीतिक और सामाजिक कारण माने जाते हैं। 

कोर वोट बैंक में सेंध
बहुजन समाज पार्टी (BSP) का सबसे मजबूत आधार दलित वोट रहा है। लेकिन पिछले चुनावों में दलित वोट का एक हिस्सा BJP और अन्य दलों की ओर शिफ्ट हुआ। खासकर गैर-जाटव दलित समुदाय में BSP की पकड़ कमजोर हुई।

ग्राउंड एक्टिविटी में कमी
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि BSP पहले की तरह सड़क पर सक्रिय नहीं दिखती। बड़े आंदोलनों, विरोध प्रदर्शनों और जनसंपर्क अभियानों की कमी से कार्यकर्ताओं का मनोबल भी प्रभावित हुआ।

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    युवा नेतृत्व की कमी
    पार्टी में नया और आक्रामक चेहरा सामने नहीं आ पाया। दूसरी पार्टियों ने सोशल मीडिया और युवा राजनीति में तेजी से जगह बनाई, जबकि BSP अपेक्षाकृत पीछे रही।
    समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन और फिर अलगाव ने BSP के पारंपरिक समर्थकों में भ्रम पैदा किया। कई वोटर स्थायी राजनीतिक दिशा चाहते थे।

    BJP की सामाजिक इंजीनियरिंग
    Narendra Modi और Yogi Adityanath के नेतृत्व में BJP ने दलित, पिछड़ा और गरीब वर्ग तक योजनाओं और संगठन के जरिए मजबूत पहुंच बनाई। जब से उत्तर प्रदेश में योगी की सरकार आई है। तब से स्थानीय नेतृत्व BSP का कमजोर होता चला रहा है। BSP के कई पुराने नेता पार्टी छोड़ चुके हैं या निष्क्रिय हो गए। इससे बूथ स्तर का नेटवर्क प्रभावित हुआ।

    चुनावी प्रदर्शन में गिरावट
    लगातार कमजोर चुनावी नतीजों से वोट खराब होने की धारणा भी बनी, जिसके कारण कुछ समर्थक जीतने वाली पार्टियों की ओर चले गए। हालांकि BSP अभी भी उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण ताकत मानी जाती है, खासकर दलित राजनीति में उसका प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। कई क्षेत्रों में पार्टी का स्थायी वोट बैंक अब भी मौजूद है। 

    बंगाल में ममता क्यों पिछड़ी 
    Mamata Banerjee और All India Trinamool Congress की पश्चिम बंगाल चुनाव में हार के पीछे कई राजनीतिक, संगठनात्मक और जनभावना से जुड़े कारण बताए जा रहे हैं। प्रमुख वजहें इस प्रकार मानी जा रही हैं

    भ्रष्टाचार के आरोप
    शिक्षक भर्ती घोटाला, नगर निकाय भर्ती विवाद और कई नेताओं पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों ने सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया। विपक्ष ने इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया। जिस वजह से भाजपा को इसका फायदा मिला और पार्टी ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। 

    एंटी-इनकंबेंसी फैक्टर
    लंबे समय तक सत्ता में रहने के कारण सरकार के खिलाफ नाराजगी बढ़ी। कई इलाकों में स्थानीय स्तर पर जनता बदलाव चाहती थी। इस को TMC ने गंभीरता से नहीं लिया इस वजह से पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। 

    संगठन में अंदरूनी असंतोष
    चुनाव के बाद पार्टी नेताओं के बयान और सोशल मीडिया पोस्ट से यह संकेत मिला कि पार्टी के भीतर सबकुछ सामान्य नहीं था। कुछ नेताओं ने नेतृत्व और रणनीति पर अप्रत्यक्ष सवाल भी उठाए। जिसे ऐसा लगाता है कि पार्टी की गुटवाजी की वजह से ही अपने लोगों ने पार्टी से हटकर काम किया जिसका परिणाम पार्टी को भुगतना पड़ा। 

    हिंसा और कानून व्यवस्था के मुद्दे
    चुनावी हिंसा, राजनीतिक टकराव और कानून व्यवस्था को लेकर विपक्ष लगातार सरकार को घेरता रहा। इसका असर शहरी और युवा वोटरों पर पड़ा। Bharatiya Janata Party ने बंगाल में मजबूत चुनावी अभियान चलाया। हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और केंद्रीय योजनाओं को लेकर पार्टी ने ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में पकड़ बढ़ाई।

    महिला और युवा वोट में बदलाव
    पहले TMC को महिला वोटरों का बड़ा समर्थन मिलता था, लेकिन बेरोजगारी, महंगाई और स्थानीय मुद्दों ने कुछ इलाकों में युवा और महिला वोट बैंक को प्रभावित किया। कई सीटों पर उम्मीदवार चयन और स्थानीय नेताओं के व्यवहार को लेकर असंतोष देखा गया, जिससे पार्टी को नुकसान हुआ।

    ग्रामीण बनाम शहरी वोटिंग पैटर्न
    कुछ शहरी और औद्योगिक क्षेत्रों में TMC का प्रदर्शन कमजोर रहा, जहां विपक्ष को अधिक समर्थन मिला। हालांकि Mamata Banerjee अब भी बंगाल की सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिनी जाती हैं और उनकी पार्टी का राज्य में मजबूत कैडर नेटवर्क मौजूद है। फिलहाल बंगाल में TMC दूसरे नम्बर की पार्टी है। लेकिन यह देखना होगा कि क्या बंगाल चुनाव का असर 2027 विधान सभा चुनाव पर पड़ता है या नहीं। 


     

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