स्कूलों में 'गुड टच-बैड टच' और कॉलेजों में 'सहमति' का पाठ: केंद्र का सुप्रीम कोर्ट में बड़ा हलफनामा, S#X एजुकेशन होगी अनिवार्य

Edited By Updated: 15 Jul, 2026 11:42 AM

sex education will now be compulsory in schools and colleges

देश के शिक्षण संस्थानों में अब तक जिस विषय पर बात करने में हिचक और सामाजिक वर्जना महसूस की जाती थी, उसे अब कानूनी तौर पर अनिवार्य बनाने की तैयारी पूरी हो चुकी है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर कर स्कूलों और कॉलेजों में व्यवस्थित...

News Delhi: देश के शिक्षण संस्थानों में अब तक जिस विषय पर बात करने में हिचक और सामाजिक वर्जना महसूस की जाती थी, उसे अब कानूनी तौर पर अनिवार्य बनाने की तैयारी पूरी हो चुकी है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर कर स्कूलों और कॉलेजों में व्यवस्थित रूप से कम्प्रीहेंसिव सेक्स एजुकेशन लागू करने का पूरा ब्लूप्रिंट पेश कर दिया है।

मिली जानकारी के मुताबिक, दरअसल महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की एडिशनल सेक्रेटरी की अध्यक्षता वाली 26 सदस्यीय विशेषज्ञ समिति ने इस संबंध में सरकार को अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपी थी, जिसे केंद्र ने मंजूर कर लिया है। अब इस रिपोर्ट को कानूनी अमलीजामा पहनाने के लिए सरकार ने शीर्ष अदालत से मंजूरी मांगी है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस ब्लूप्रिंट को बेहद सकारात्मक बताते हुए इसे वक्त की बड़ी जरूरत करार दिया है। सोमवार को जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ के सामने एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने सरकार के इस बड़े कदम की जानकारी दी

विशेषज्ञ पैनल में कौन-कौन थे शामिल?
इस पूरे खाके को तैयार करने वाली 26 सदस्यीय समिति में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) के विशेषज्ञ, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट (मनोवैज्ञानिक), विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों व राज्य सरकारों के अफसर, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) और नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी (NALSA) के प्रतिनिधि शामिल थे।

प्राइमरी से लेकर कॉलेज तक: ऐसा होगा पढ़ाई का खाका
इस नए पाठ्यक्रम को बच्चों की उम्र और समझ के हिसाब से अलग-अलग चरणों में बांटा गया है:-
प्राइमरी स्तर
बच्चों को बिल्कुल शुरुआती स्तर पर 'गुड टच और बैड टच' (सुरक्षित और असुरक्षित स्पर्श) के बीच अंतर पहचानना सिखाया जाएगा।

मिडिल और हाई स्कूल स्तर
जैसे-जैसे बच्चों की उम्र बढ़ेगी, सिलेबस का दायरा बड़ा होगा। इसमें शरीर में होने वाले हार्मोनल व शारीरिक बदलावों, प्रजनन स्वास्थ्य (Reproductive Health), जेंडर संवेदनशीलता और आपसी रिश्तों में 'सहमति' (Consent) के कानूनी व नैतिक महत्व की वैज्ञानिक जानकारी दी जाएगी।

कॉलेज स्तर
उच्च शिक्षा में भी इसे अनिवार्य रूप से लागू किया जाएगा ताकि युवा अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों को लेकर जागरूक हो सकें।

आखिर क्यों पड़ी इसकी जरूरत? 
इस बड़े कदम की पृष्ठभूमि पिछले साल तैयार हुई थी। साल 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत किशोरों (टीनएजर्स) के आपसी सहमति वाले रिश्तों के अपराधीकरण (Criminalization) और नाबालिग लड़कियों में प्रेगनेंसी के बढ़ते मामलों पर गहरी चिंता जताई थी। अदालत ने कहा था कि इस समस्या का कोई व्यावहारिक और ठोस समाधान निकाला जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के इसी निर्देश के बाद केंद्र सरकार ने इस नेशनल एक्सपर्ट कमेटी का गठन किया था, जिसकी सिफारिशों को अब देश भर के शिक्षण संस्थानों में लागू करने की तैयारी है।

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