सुप्रीम कोर्ट से सेवारत शिक्षकों को बड़ी राहत, TET उत्तीर्ण करने को लेकर दे दी नई गाइडलाइन

Edited By Updated: 29 May, 2026 08:21 PM

the supreme court has provided major relief to serving teachers issuing new gui

उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को दोहराया कि सेवारत शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) उत्तीर्ण करना अनिवार्य है। इसी के साथ न्यायालय ने सेवा में बने रहने के लिए परीक्षा उत्तीर्ण करने की समय सीमा 31 अगस्त, 2028 तक बढ़ा दी है। न्यायमूर्ति...

नेशनल डेस्क: उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को दोहराया कि सेवारत शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) उत्तीर्ण करना अनिवार्य है। इसी के साथ न्यायालय ने सेवा में बने रहने के लिए परीक्षा उत्तीर्ण करने की समय सीमा 31 अगस्त, 2028 तक बढ़ा दी है। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने अंजुमन इशात-ए-तालीम ट्रस्ट मामले में अदालत के पहले के फैसले को चुनौती देने वाली कई राज्य सरकारों, शिक्षक संघों और व्यक्तिगत शिक्षकों द्वारा दायर 65 से अधिक पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज कर दिया। 

पहले दो वर्षों के भीतर टीईटी परीक्षा उत्तीर्ण करना था
याचिकाकर्ताओं ने न्यायालय के 2025 के उस फैसले पर पुनर्विचार की मांग की थी जिसमें कहा गया था कि निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम, 2009 के लागू होने से पहले नियुक्त सेवारत शिक्षकों, जिनकी सेवानिवृत्ति में पांच वर्ष से अधिक का समय शेष है, को एक सितंबर, 2025 से दो वर्षों के भीतर टीईटी परीक्षा उत्तीर्ण करनी होगी। एक आदेश में न्यायालय ने कहा, ''संबंधित अधिकारियों द्वारा टीईटी परीक्षा शीघ्रता से आयोजित की जानी चाहिए, क्योंकि इसके लिए आवश्यक समय और संसाधन सीमित हैं, इसलिए हम समय सीमा को दो वर्ष से बढ़ाकर तीन वर्ष करते हैं, और मूल रूप से निर्देशित 31 अगस्त, 2027 के बजाय 31 अगस्त, 2028 तक योग्यता प्राप्त करनी होगी।

 न्यूनतम योग्यताएं प्राप्त करनी होगी
हालांकि, अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि समय में कोई और विस्तार नहीं दिया जाएगा। टीईटी की आवश्यकता को कानून का पूर्वव्यापी अनुप्रयोग मानने वाले तर्क को खारिज करते हुए पीठ ने कहा कि आरटीई अधिनियम के वैधानिक ढांचे में स्पष्ट रूप से यह परिकल्पना की गई है कि सेवारत शिक्षकों को भी निर्धारित समय सीमा के भीतर न्यूनतम योग्यताएं प्राप्त करनी होंगी। निर्णय में कहा गया कि आरटीई अधिनियम विशेष रूप से कानून के प्रारंभ होने के समय सेवा में कार्यरत शिक्षकों से संबंधित है और उन्हें निर्धारित योग्यताएं प्राप्त करने के लिए समय दिया गया है। पीठ ने कहा कि अधीनस्थ कानूनों या राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (एनसीटीई) द्वारा जारी अधिसूचनाओं में निहित छूट मूल कानून को रद्द नहीं कर सकती।

 शैक्षिक भविष्य पर असर पड़ेगा
अदालत ने कहा, ''इस आधार पर फैसले को रद्द करना कि इसके परिणामस्वरूप हजारों शिक्षक बेरोजगार हो जाएंगे, इसका अर्थ यह होगा कि जिन शिक्षकों के पास टीईटी योग्यता नहीं है, वे सेवा में बने रहेंगे, जिससे आने वाली पीढ़ियों के शैक्षिक भविष्य पर असर पड़ेगा।'' याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि आरटीई अधिनियम और एनसीटीई अधिनियम में 2011 के संशोधन से पहले नियुक्त शिक्षकों को उनके करियर के मध्य में टीईटी उत्तीर्ण करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह सेवा शर्तों में अनुचित परिवर्तन है।

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    शिक्षक बेरोजगार हो जाएंगे
    अदालत ने कहा, ''इस तर्क के आधार पर फैसले को अप्रभावी घोषित करना कि इसके परिणामस्वरूप हजारों शिक्षक बेरोजगार हो जाएंगे, इसका मतलब यह होगा कि जिन शिक्षकों के पास टीईटी योग्यता नहीं है, वे सेवा में बने रहेंगे, जिससे आने वाली पीढ़ियों के शैक्षिक भविष्य पर असर पड़ेगा।'' अदालत ने कहा, ''आरटीई अधिनियम एक बाल-केंद्रित कानून है और इसे इसी रूप में पढ़ा जाना चाहिए। शिक्षकों की सेवा बच्चों के शैक्षिक भविष्य की कीमत पर नहीं हो सकती।

    टीईटी परीक्षाएं नियमित रूप से आयोजित करें
    राज्यों ने यह भी तर्क दिया था कि कम समय में टीईटी की शर्त लागू करने से बड़ी संख्या में शिक्षकों की नौकरी जा सकती है, जिससे सार्वजनिक शिक्षा और स्कूलों में शिक्षण की निरंतरता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। व्यावहारिक कठिनाइयों को स्वीकार करते हुए अदालत ने कहा कि प्राथमिक शिक्षा में निरंतरता और बच्चों के कल्याण के लिए एक व्यावहारिक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। न्यायालय ने राज्यों और सक्षम अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे टीईटी परीक्षाएं नियमित रूप से आयोजित करें, अधिमानतः वर्ष में दो बार लगभग छह महीने के अंतराल पर, ताकि योग्य शिक्षकों को उत्तीर्ण होने के उचित अवसर मिल सकें। समय सीमा बढ़ाने वाले संशोधन के साथ, सभी पुनर्विचार याचिकाएं खारिज कर दी गईं। 

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