Edited By Sahil Kumar,Updated: 13 Jul, 2026 01:58 PM

भारत में हृदय रोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और मोटापे जैसी जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों के बढ़ते मामलों के बीच प्रिवेंटिव कार्डियोलॉजी (Preventive Cardiology) का महत्व लगातार बढ़ रहा है। इस क्षेत्र में रोगों के उपचार के साथ-साथ उनकी रोकथाम, जोखिम कारकों...
नई दिल्ली: भारत में हृदय रोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप और मोटापे जैसी जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों के बढ़ते मामलों के बीच प्रिवेंटिव कार्डियोलॉजी (Preventive Cardiology) का महत्व लगातार बढ़ रहा है। इस क्षेत्र में रोगों के उपचार के साथ-साथ उनकी रोकथाम, जोखिम कारकों के नियंत्रण और दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इसी दिशा में डॉ. रोहित साने का शोध कार्य आयुर्वेद आधारित जीवनशैली हस्तक्षेपों और आधुनिक हृदय मूल्यांकन पद्धतियों के समन्वित अध्ययन पर केंद्रित रहा है।
डॉ. साने के प्रकाशित शोध इस्केमिक हार्ट डिजीज, क्रॉनिक हार्ट फेल्योर, उच्च रक्तचाप, मधुमेह और अन्य चयापचय संबंधी विकारों के प्रबंधन से जुड़े हैं। उनके अध्ययनों में यह मूल्यांकन किया गया है कि नियंत्रित जीवनशैली, संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और आयुर्वेद आधारित उपचारों को आधुनिक चिकित्सा के साथ पूरक (Adjunct) रूप में किस प्रकार उपयोग और परखा जा सकता है। इन शोधों का उद्देश्य पारंपरिक चिकित्सा को आधुनिक उपचार का विकल्प बताना नहीं, बल्कि समन्वित उपचार पद्धतियों की संभावनाओं का वैज्ञानिक परीक्षण करना रहा है।
डॉ. साने के सह-लेखन वाले कई शोध Indian Heart Journal सहित अन्य वैज्ञानिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। इन अध्ययनों में उपचार के प्रभाव का आकलन कार्डियक स्ट्रेस टेस्ट, इकोकार्डियोग्राफी, मेटाबोलिक इक्विवेलेंट्स (METs), पीक ऑक्सीजन उपभोग (VO₂ Peak) और कार्यात्मक क्षमता जैसे आधुनिक चिकित्सीय मानकों के आधार पर किया गया। ये परीक्षण हृदय रोगियों की व्यायाम क्षमता, रोग की गंभीरता और उपचार के प्रभाव का मूल्यांकन करने के लिए व्यापक रूप से उपयोग किए जाते हैं।
क्रॉनिक हार्ट फेल्योर पर प्रकाशित एक अध्ययन में मानक चिकित्सा के साथ आयुर्वेद आधारित उपचार को सहायक रूप में शामिल किया गया। अध्ययन में कुछ नैदानिक मानकों, विशेषकर व्यायाम क्षमता और कार्यात्मक प्रदर्शन में सुधार दर्ज किया गया। इसी प्रकार इस्केमिक हार्ट डिजीज पर किए गए एक अन्य अध्ययन में कार्डियक स्ट्रेस टेस्ट के माध्यम से उपचार के बाद रोगियों की व्यायाम क्षमता में सकारात्मक बदलाव देखने को मिले। हालांकि शोधकर्ताओं ने स्वयं स्पष्ट किया है कि इन निष्कर्षों की पुष्टि के लिए बड़े नमूना आकार, स्वतंत्र अनुसंधान और दीर्घकालिक अनुवर्ती अध्ययनों की आवश्यकता बनी हुई है।
डॉ. साने के शोध कार्य की एक प्रमुख विशेषता यह रही है कि उन्होंने आयुर्वेद आधारित हस्तक्षेपों का मूल्यांकन केवल रोगियों के अनुभवों या लक्षणों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि आधुनिक नैदानिक परीक्षणों के माध्यम से उनके प्रभाव का अध्ययन किया। विशेषज्ञों के अनुसार, समन्वित चिकित्सा (Integrative Medicine) के क्षेत्र में यह दृष्टिकोण महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इससे पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों का वैज्ञानिक मानकों पर मूल्यांकन संभव हो पाता है।
उपलब्ध अकादमिक जानकारी के अनुसार, डॉ. साने ने प्रिवेंटिव कार्डियोलॉजी, हृदय पुनर्वास और जीवनशैली आधारित उपचारों पर कई शोध-पत्र प्रकाशित किए हैं। उनके शोधों का विभिन्न वैज्ञानिक प्रकाशनों में उल्लेख और उद्धरण भी किया गया है। इसके अलावा उन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सम्मेलनों में अपने शोध प्रस्तुत किए हैं, जिनमें ऑस्ट्रेलिया में आयोजित विश्व कार्डियोलॉजी सम्मेलन में सहभागिता भी शामिल है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में आयुर्वेद और समन्वित चिकित्सा पर अनुसंधान का दायरा लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में इस क्षेत्र में किए जा रहे अध्ययन भविष्य में उपचार संबंधी नई संभावनाओं को समझने में सहायक हो सकते हैं। हालांकि साक्ष्य-आधारित चिकित्सा के मौजूदा मानकों के अनुसार किसी भी उपचार पद्धति की व्यापक स्वीकृति के लिए स्वतंत्र शोध, बहु-केंद्रित क्लीनिकल परीक्षण, व्यवस्थित समीक्षाओं और दीर्घकालिक परिणामों का मूल्यांकन आवश्यक माना जाता है।