स्वर्ग या नरक कैसा जीवन जीना चाहते हैं आप

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Friday, July 14, 2017-9:45 AM

आपका मन ही आपके भीतर स्वर्ग या नरक रचता है। यह सब इस पर निर्भर करता है कि आप अपने दिमाग का उपयोग कैसे करते हैं। आपको अपने भीतर करुणा की जगह बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए तब हम ज्यादा बेहतर जीवन जी पाएंगे। हमारे जीवन का उद्देश्य सिर्फ दिन काटना नहीं, बल्कि आत्मशांति की खोज है। जब आपके जीवन में संतोष होगा तो आप असफलताओं से आहत नहीं होंगे। जब आप दूसरों के साथ तुलना करते हैं तो आपको अपना कद हमेशा छोटा ही नजर आता है क्योंकि कोई न कोई ऐसा व्यक्ति मिल ही जाता है जो आपसे दौड़ में आगे खड़ा होता है।


खेल की दुनिया में भी जो रिकॉड्रस बने हैं, वे एक न एक दिन टूटेंगे ही। इसलिए तुलना ऐसी चीज है जो आपको असफलता के रास्ते पर ले जाती है लेकिन तरक्की की तरफ बढऩे का रास्ता भी यही है। जब किसी स्थिति में हमारे मन में यह भाव रहता है कि हम असफल हो गए तो समझिए कि आप असफल हुए, वरना आप जहां भी हैं वही आपकी सफलता है। असल में मन बंधन या आजादी को जन्म नहीं देता है बल्कि वह तो एक बर्तन है जिसमें आप जो भी डालेंगे वह उसी तरह से उस पर काम करना शुरू कर देगा।


उदाहरण के लिए एक चाकू का आप गलत ढंग से उपयोग करते हैं तो वह खतरनाक है और अगर समझदारी से उपयोग करते हैं तो वह उपयोगी है। अगर आप मन को भी इसी तरह गलत दिशा में लगाते हैं तो दुख ही पैदा होगा लेकिन अगर आप मन को सही दिशा में ले जाते हैं आपका जीवन बेहतर होगा।


सोचिए अगर आपका सामना गुस्से से होता है तो आप भी गुस्से में आ जाते हैं तो इसका मतलब है कि अभी आपको अपने मन को साधने की बहुत जरूरत है। अगर आप चीजों को करुणा से देखते हैं तो मानिए कि आपने चीजों में सुधार कर लिया है। जब तक आपका मन चीजों का ठीक से सामना करना नहीं सीखता है तब तक उलझनें बनी ही रहेंगी। तब तक आप अनुभवी नहीं कहलाएंगे। किसी भी चुनौती के सामने पेश आने का तरीका ही तो अनुभव है। किसी भी परिस्थिति का मुकाबला आप अपने विचार से करते हैं और इस पर पूर्व में आपके साथ घटी घटनाओं का बड़ा असर होता है। इसलिए जब आप पुरानी घटनाओं के आधार पर ही भविष्य में भी व्यवहार करते हैं तो आप कुछ भी नया नहीं सीखते हैं।

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