जीवन भर करें नीतिवान व्यक्ति का अनुसरण, फिर देखें कैसे होते हैं आपके वारे-न्यारे

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Wednesday, September 13, 2017-9:42 AM

महाराष्ट्र के प्रकांड विद्वान रामशास्त्री को पेशवा के दरबार में प्रमुख स्थान प्राप्त था। उन्हें दानाध्यक्ष का पद भी दिया गया था। प्रत्येक व्यक्ति या विद्वान को वह अपने हाथों से दान दिया करते थे। दान के दौरान वह पात्रता का खास ध्यान रखते थे। ऐसा कोई मौका नहीं आने देते थे जिससे उनके व्यवहार से पक्षपात का भान हो या कोई गुणी व्यक्ति उपेक्षित महसूस करे। एक बार शास्त्री जी विद्वानों को दक्षिणा दे रहे थे। संयोगवश उन विद्वानों में उनके दूर के एक भाई भी शामिल थे।


नाना फडऩवीस रामशास्त्री जी के भाई को देखकर उनसे धीरे से बोले, ‘‘वह तो आपके संबंधी हैं। मेरे विचार में आपको उन्हें अन्य लोगों से अधिक दक्षिणा देनी चाहिए।’’ 


नाना की बात पर रामशास्त्री जी बोले, ‘‘मेरे भैया दक्षिणा प्राप्त विद्वानों की तरह ही हैं। जब उन सभी को समान दक्षिणा दी गई है तो मेरे भाई को अधिक दक्षिणा क्यों दी जाए? यह अन्य विद्वानों के साथ पक्षपात करने वाली बात होगी।’’


नाना फडऩवीस बोले, ‘‘भई वाह रामशास्त्री, अत्यंत उच्च विचार हैं तुम्हारे। तुम्हारा निष्पक्ष व्यवहार हमारे हृदय को छू गया। हमें गर्व हो रहा है कि एक अत्यंत योग्य व्यक्ति दरबार में महत्वपूर्ण पद पर सुशोभित है।’’ 


इस तारीफ पर रामशास्त्री जी मुस्कुरा दिए। दक्षिणा का कार्य सम्पन्न होने के बाद उन्होंने सभी विद्वानों को सम्मानपूर्वक विदा किया लेकिन भाई को अपने साथ घर ले गए और वहां उनका यथोचित सत्कार किया। उनके व्यवहार से गद्गद् भाई ने कहा, ‘‘आप निष्पक्ष ही नहीं, विवेकवान भी हैं। हर व्यक्ति को उपयुक्त सम्मान देना कोई आपसे सीखे। आपने दरबार में विद्वानों की मर्यादा रखी तो मेरे रिश्ते का मान रखने में भी पीछे नहीं रहे। मुझे इस बात का गर्व है कि मैं आप जैसे नीतिवान व्यक्ति का भाई हूं। मैं भी प्रयास करूंगा कि जीवन भर आपके आदर्शों का अनुसरण करता रहूं।’’

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