तीनों लोकों में थी इस रूपसी के रूप की चर्चा, सुंदरता बन गई अभिशाप

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Monday, May 15, 2017-1:06 PM

ब्रह्मा जी की पुत्री अहल्या को यह वरदान प्राप्त था कि वह सदा ही 16 वर्ष की आयु के सदृश ही रहेंगी। ब्रह्मा जी ने एक स्पर्धा करवाई, जिसे गौतम ऋषि ने जीता और अहल्या को पत्नी रूप में प्राप्त किया। अहल्या के रूप की चर्चा तीनों लोकों में थी। अपने रूप, गुण, सौन्दर्य और पतिव्रत धर्म के पालन के कारण ही वह भक्तों के मन में बसी हुई हैं।  देवराज इन्द्र ने जब अहल्या के बारे में सुना तो उन्होंने सूर्य से उसकी सुन्दरता के बारे में पूछा। सूर्यदेव ने इन्द्र देव की भावना भांप कर अपनी असमर्थता जताई। तब इंद्र ने चंद्रमा से पूछा तो उसने कहा कि अहल्या से अधिक रूपवती, गुणवान और पतिव्रता स्त्री सारी सृष्टि में कोई और नहीं है। 


ऐसा सुनकर इन्द्र ने छल रूप से अहल्या को पाने का प्रयास करते हुए चंद्रमा की सहायता ली। योजना बनाई कि जब ऋषि गौतम प्रात: ब्रह्ममुहूर्त में गंगा स्नान को जाते हैं वही समय अहल्या को पाने के लिए सही है। इंद्र ने चन्द्रमा को अपने काम में साथ देने के लिए उन्हें ऋषि के आश्रम के ऊपर ही टिके रहने के लिए कहा ताकि जब वह किसी को आश्रम की ओर आता देखे तो वह आश्रम के ऊपर से हट जाए क्योंकि चंद्रमा के हटने पर किसी को शक भी नहीं होगा तथा इन्द्र को ऋषि के आने की सूचना भी चंद्रमा के इस संकेत से मिल जाएगी। 


अहल्या को पाने की लालसा से आधी रात को ही इंद्र ने मुर्गा बन कर बांग लगाई और ऋषि गौतम प्रात: हो गई सोचकर गंगा स्नान के लिए आश्रम से निकल गए। तब इंद्र ने झट से ऋषि गौतम का वेश बनाया और आश्रम में जाने लगे तो अहल्या ने अपने तपोबल के प्रभाव से इंद्र को पहचान लिया और कहा कि ‘यदि मेरे पति हो तो आश्रम में आ जाओ’। इंद्र के छल की लालसा को देखकर अहल्या ने उसे श्राप दिया कि तुम्हें कोढ़ हो जाए। दूसरी तरफ जब ऋषि गौतम ने गंगा स्नान करने के लिए कमंडल में जल भरा तो गंगा मां ने कहा कि अभी तो आधी रात हुई है, तो ऋषि आश्रम की ओर वापस चल पड़े। 


आश्रम के बाहर उन्होंने अपने वेश में ही इन्द्र को अपने साथ टकरा कर जाते हुए देखा और छत पर चन्द्रमा को पहरेदारी करते देखकर सारी स्थिति को भांप लिया। ऋषि पत्नी अहल्या उनके जल्दी आश्रम में लौट आने की चिंता में जैसे ही बाहर आई तो ऋषि गौतम ने अहल्या को शिला होने और चन्द्रमा को इन्द्र का साथ देने के लिए उसमें दाग होने और ग्रहण लगने का तत्काल श्राप दे दिया। जिसके प्रभाव से अहल्या आश्रम के बाहर एक पत्थर की शिला बन गई। देवर्षि नारद ने तब ऋषि गौतम को अहल्या के बेकसूर होने के बारे में बताया तो उन्होंने कहा कि श्राप तो नहीं मिटाया जा सकता परन्तु उन्होंने अहल्या को एक वरदान भी दिया कि सूर्यवंशी भगवान श्री राम जब उस शिला के साथ अपने चरणों का स्पर्श करेंगे तो वह पूर्ववत हो जाएगी। धर्मग्रंथों में चंद्रमा के कलंक लगने और ग्रहण लगने के बारे में भी अनेक कथाएं मिलती हैं, परंतु ऋषि गौतम का श्राप भी उनमें से एक है।


मिथिला में राजा जनक के धनुष यज्ञ को दिखाने के लिए गुरु विश्वामित्र उन्हें साथ लेकर जा रहे थे तो ‘आश्रम एक दीख मग माहीं, खग, मृग, जीव जन्तु तंह नाहीं, पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी, सकल कथा मुनि कहा बिसेषी’। 


गुरु विश्वामित्र ने बताया ‘गौतम नारी श्राप बस उपल देह धरि धीर, चरण कमल रज चाहति, कृपा करो रघुबीर’।


श्री राम जी के पवित्र एवं शोक का नाश करने वाले चरणों का स्पर्श पाते ही वह तपोमूर्ति अहल्या प्रकट हो गई और भक्तों को सुख देने वाले प्रभु को सामने देखकर वह प्रभु चरणों से लिपट गई। उसके नेत्रों से प्रेम और आनंद के आंसुओं की धारा निरंतर बह रही थी। आज भी लोग अहल्या के गुणों का गान करते हुए उनके समान, धैर्य और पतिव्रत धर्म की पालन करने की प्रेरणा देते हैं।    

वीना जोशी
veenajoshi23@gmail.com


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