शहीद-ए-आजम भगत सिंह के 110वें जन्मदिन पर विशेष: जानें, जन्म से शहादत तक

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Wednesday, September 28, 2016-12:58 PM

शहीद-ए-आजम भगत सिंह का जन्म 28 सितम्बर, 1907 को लायलपुर जिला (फैसलाबाद, पाक) के बंगा गांव में हुआ। इनके पूर्वजों का जन्म पंजाब के नवांशहर के समीप खटकड़कलां गांव में हुआ था। अत: खटकड़कलां इनका पैतृक गांव है। 


भगत सिंह के दादा सरदार अर्जुन सिंह पहले सिख थे जो आर्य समाजी बने। इनके तीनों सुपुत्र-किशन सिंह, अजीत सिंह व स्वर्ण सिंह प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी थे। परिवार पर आर्य समाज के प्रभाव बारे भगत सिंह के छोटे भाई स. रणबीर सिंह कहते हैं :


‘‘आर्य समाज में मेरे दादा स. अर्जुन सिंह शामिल थे। फिर मेरे पिता स.किशन सिंह, चाचा स. अजीत सिंह को महात्मा हंसराज जी व लाला लाजपत राय के साथ आर्य समाज का कार्य करने का अवसर प्राप्त रहा है। हमारे विचार और मानसिक उन्नति भी बड़ी हद तक आर्य समाज की देन है। अन्य बहुत से उपकारों के लिए भी हम आर्य समाज के ऋणी हैं।’’


भगत सिंह के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन आने का एक बहुत बड़ा कारण था उनका लाहौर स्थित ‘नर्सरी ऑफ पैट्रिआट्स’ के रूप में विख्यात नैशनल कालेज में सन् 1921 में प्रवेश। 


भगत सिंह के बौद्धिक विकास में दो कारणों का बहुत महत्व है। एक द्वारका दास लाइब्रेरी (लाहौर) तथा दूसरा कानपुर का तत्कालीन बौद्धिक वातावरण। कानपुर में उनकी भेंट अनेक  विद्वानों से हुई। यहीं गणेशशंकर ‘विद्यार्थी’ ने उन्हें लिखने की प्रेरणा दी तथा भगत सिंह ने ‘बलवंत सिंह’ के उपनाम से लिखना शुरू कर दिया। किशोर भगत सिंह के दिलो-दिमाग पर जलियांवाला बाग हत्याकांड का असर सर्वोपरि विदित होता है। वयोवृद्ध लेखक प्रो. मलविंदर सिंह वढ़ैच के अनुसार :


‘‘किशोरावस्था की दहलीज पर दस्तक दे रहा वह (12 वर्षीय) सिख लड़का उस मैदान पर ठिठक कर खड़ा हो गया, जहां खून से लथपथ धरती की गंध एक ही दिन पहले हुए बर्बर हत्याकांड की गवाही दे रही थी। अपनी जेब से उसने एक शीशी निकाली जो वह लहू-सनी माटी डाल कर अपने साथ ले जाने के लिए लाया था। लड़का शाम को देर से घर पहुंचा। किशोर भगत सिंह की उस दिन जैसे जिंदगी की दिशा ही बदल गई। उसी दिन से उसके खून में इंकलाब हिलोरें मारने लगा। उसी दिन से वह अपने प्यारे देश के लिए जान न्यौछावर करने के लिए वचनबद्ध सिपाही बन गया और उसने अपना वचन निभा दिया।’’


भगत सिंह ने मन ही मन स्वयं को राष्ट्र पर कुर्बान करने की प्रतिज्ञा कर ली थी, पर  उनके परिजन उनकी शादी करना चाहते थे। भगत सिंह के मित्र विजय कुमार सिन्हा ने एक बार उससे पूछा था कि,‘‘तुम शादी क्यों नहीं करना चाहते?’’


तो उन्होंने दो टूक कहा, ‘‘मैं विधवाओं की संख्या नहीं बढ़ाना चाहता।’’


1923 में नैशनल कालेज में उनके छात्र काल की एक घटना बताते हुए उनके गुरु जयचंद्र विद्यालंकार कहते हैं, ‘‘भगत सिंह की शादी उसके पिता स. किशन सिंह करना चाहते थे। लड़की शायद महाराजा रणजीत सिंह के खानदान में किसी धनी खानदान की थी। वह बहुत सुंदर थी और बहुत-सा दहेज भी मिलने वाला था। भगत सिंह मेरे पास आया और बोला, ‘मुझे कहीं भेज दीजिए।’ 


मैंने कानपुर में विद्यार्थी जी के पास उसे भेजा।’’


भगत सिंह की शादी तो हुई पर कैसे हुई इसका वर्णन करते हुए भगत सिंह की शहादत के बाद उनके घनिष्ठ मित्र भगवती चरण वोहरा की धर्मपत्नी दुर्गा भाभी ने, जो स्वयं एक क्रांतिकारी वीरांगना थीं, कहा था, ‘‘फांसी का तख्ता उसका मंडप बना, फांसी का फंदा उसकी वरमाला और मौत उसकी दुल्हन।’’


इस मौत रूपी दुल्हन से भगत सिंह की शादी कराने का आरोप अपने ऊपर लेते हुए चंद्रशेखर आजाद ने एक बार अपने क्रांतिकारी मित्र भगवानदास माहौर (कैलाश) से कहा था, ‘‘मैंने उसे दिल्ली के केंद्रीय असैंबली हाल में बम धमाके के बाद आत्मसमर्पण करने से मना किया था, पर वह माना नहीं। मुझे मालूम था कि आत्मसमर्पण का मतलब होगा, मौत के मुंह में जाना।’’


इसी संदर्भ में आजाद ने अपनी शहादत से कुछ दिन पूर्व बड़े भारी मन से कैलाश को अतीत की एक घटना या दिलाते हुए आगे कहा, ‘‘मजाक में कही बात आखिर सत्य ही हो गई।’’ 


कैलाश ने पूछा, ‘‘ कौन सी बात?’’ 


आजाद ने कहा, ‘‘सांडर्स (स्कॉट) की टोह में हम लोग थे, तब की बात है। रणजीत (भगत सिंह) और मैं आराम से (लाहौर के एक) गपशप करते जा रहे थे। अचानक सामने से एक बस गुजरी जिसमें कालेज की छात्राएं थीं। वे रणजीत का सुंदर चेहरा देख रही थीं। मैंने उसका हाथ दबाया और हंस कर कहा, ‘‘अरे, हमारे इस रणजीत के साथ कोई देवी जी शादी करना चाहेगी?’’


‘‘रणजीत खूब हंसा था। शरारत से मेरी तरफ देखकर उसने कहा, ‘‘महाशय जी, मेरी शादी तो आप ही कराएंगे।’’


कैलाश, ‘‘अरे उसकी बात सच हो गई है। आखिर मैंने ही तो उसकी (मौत रूपी दुल्हन से) शादी निश्चित की।’’


एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में भगत सिंह का योगदान भी अपने आप में अद्भुत है। उदाहरणार्थ 8 अप्रैल, 1929 को गिरफ्तार होने से पूर्व उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम की लगभग प्रत्येक गतिविधि में बढ़-चढ़ कर भाग लिया। सन् 1920 में जब गांधी जी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया उस समय भगत सिंह मात्र 13 वर्ष के थे और 1929 में जब गिरफ्तार हुए तो 22 वर्ष के युवा। इन 9 वर्षों में भगत सिंह की एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में गतिविधियां किसी भी देशभक्त से कम नहीं।


दुर्गा भाभी ने असहयोग आंदोलन (1920-22) में भगत सिंह और उनके साथियों की भूमिका की प्रशंसा करते हुए ठीक ही लिखा है :


‘‘सन् 1921 का आंदोलन, हम लोगों के जीवन का एक बड़ा मोड़ बना। उस समय देश के विद्यार्थियों ने बड़ी संख्या में आंदोलन को आजादी की लड़ाई का सुअवसर समझा और वे उसमें जी-जान से कूद पड़े। आंदोलन तो चौरी-चौरा कांड (फरवरी 1922) के पश्चात स्थगित हो गया और उसी के साथ लाहौर के विद्यार्थियों की वह भीड़ जो केवल उसी आंदोलन के लिए आई थी, अपने-अपने स्थान को लौट गई परन्तु भगत सिंह और उनके साथी जो एक बार भारत को स्वाधीन कराने के लिए अपने कदम बढ़ा चुके थे उनमें से कोई भी घर नहीं लौटा। संख्या में तो वे  25-30 से अधिक न होंगे, जो सचमुच ‘आजादी की खातिर मौत’ की शपथ पर अटल रहे।’’


पंजाब में गुरुद्वारों को सरकार-समर्थक महंतों से मुक्त कराने हेतु अकाली आंदोलन चल रहा था। सरकार इस आंदोलन का दमन कर रही थी। सरदार किशन सिंह ने सरकारी दमन के दौर में भगत सिंह के जैतो गुरुद्वारा आंदोलन के 500 सत्याग्रहियों के जत्थे को लंगर छकाने की जिम्मेदारी सौंपी, जिसे उन्होंने सफलतापूर्वक निभाया। भगत सिंह जो उस समय मात्र 17 वर्ष के किशोर थे ने उस मौके पर भाषण भी दिया जिसे पुलिस ने देशद्रोह की भावना भड़काने वाला माना और भगत सिंह के खिलाफ पहला गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ था।


क्रांतिकारियों, विशेषकर भगत सिंह का एक प्रमुख साहसी एक्शन था-17 दिसम्बर, 1928 को लाला लाजपत राय की शहादत का बदला लेने के लिए ब्रिटिश पुलिस अफसर जे.पी. सांडर्स का लाहौर में पुलिस हैडक्वार्टर के सामने शाम के 4.10 बजे चंद्रशेखर आजाद व राजगुरु के साथ मिलकर उसे मौत के घाट उतारना। इस एक्शन को भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में भगत सिंह तथा उनके साथियों द्वारा राष्ट्रीय अपमान का लिया गया बदला माना जाता है।


भगत सिंह सदैव इस बात पर जोर देते थे कि ऐसा कोई कार्य किया जाए जिससे उनके क्रांतिकारी दल एच.एस.आर.ए. का मजदूर और किसान आंदोलन के साथ घनिष्ठ संबंध प्रमाणित हो सके। यह मौका मिला 8 अगस्त, 1929 को जब उन्होंने बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर दिल्ली स्थित असैंबली हाल में जनता विरोधी बिलों ‘ट्रेड डिस्प्यूट बिल’ एवं ‘पब्लिक सेफ्टी बिल’ के विरोध में 2 बम धमाके किए व सरकार विरोधी पर्चे बांटे। जब यह एक्शन किया गया भाई पटेल उस वक्त असैंबली के अध्यक्ष थे। उस समय दर्शक दीर्घा में देश की काफी जानी-मानी हस्तियां विराजमान थीं। देखते ही देखते सभा भवन लगभग खाली हो गया था। इतने बड़े उस हाल में केवल 4 ही महारथी अपनी-अपनी सीट पर शांति के साथ बैठे हुए थे और वे थे- पं. मोती लाल नेहरू, पं. मदन मोहन मालवीय, भाई पटेल और मोहम्मद अली जिन्ना। भगत सिंह का सबसे पहला खुला परिचय देश-विदेश की जनता को असैंबली के इस ऐतिहासिक बम कांड के पश्चात ही मिला था।


असैंबली बम कांड के उपरांत आत्मसमर्पण कर, भगत सिंह ने बी.के. दत्त के साथ 8 अप्रैल, 1929 को गिरफ्तारी दे दी। भगत सिंह की गिरफ्तारी के बाद उन पर दिल्ली व लाहौर की अदालतों में मुकद्दमा चलाया गया। फलत: 12 जून, 1929 को उन्हें काले पानी का आजीवन कारावास व 7 अक्तूबर, 1930 को मृत्यु दंड की सजा सुनाई गई। अंतत: 23 मार्च, 1931 को जब उनकी उम्र मात्र 23 साल, 5 मास व 25 दिन थी उन्हें लाहौर सैंट्रल जेल में राजगुरु व सुखदेव के साथ सायं 7.33 पर शहीद कर दिया गया। उनके मृतक शरीर के टुकड़े कर फिरोजपुर के समीप हुसैनीवाला नामक स्थान पर रात के अंधेरे में ब्रिटिश सरकार के गुरगों ने तेल डालकर जला दिया। उनकी शहादत की खबर समाचार पत्रों में 25 मार्च, 1931 को लाहौर के ‘ट्रिब्यून’ से लेकर लंदन और न्यूयार्क के डेली वर्कर, पैरिस के ‘ला ह्यूमानेत’, मास्को के ‘प्रावदा’ सहित भारत की हर भाषा के अखबार में प्रथम पृष्ठ पर प्रमुखता से छपी। इसके अतिरिक्त लगभग पूरे भारतवर्ष में इस दिन जबरदस्त हड़ताल रही और विशेषकर पंजाब के घरों में तो चूल्हे भी नहीं जले।


भगत सिंह मात्र साढ़े 23 वर्ष की अल्पायु में ‘शोषण एवं साम्राज्यवाद’ के खिलाफ एक वीर योद्धा व महान विचारक के रूप में लड़ते हुए लोकप्रियता की चरम सीमा पर पहुंचे। वह अपने अमूल्य जीवन को दांव पर लगाकर, अपने प्रिय देश के दुश्मन को ‘बेहाल’ और पीड़ित जनता को निहाल करने का भरसक प्रयास करता है। इतना सब कुछ करने के बावजूद एवं भरी जवानी में देश पर न्यौछावर होने वाला यह मतवाला देशभक्त, अपने देशवासियों से अलविदा होते हुए देखिए क्या कहता है, ‘मैं देश की जितनी सेवा करना चाहता था उसका हजारवां हिस्सा भी नहीं कर सका।’


यहां पाठक के जेहन में एक प्रश्र उठना स्वाभाविक है कि क्या भगत सिंह हमारे लिए कोई संदेश भी छोड़ कर गए? इस प्रश्र का उत्तर है:


फांसी के कुछ दिन पूर्व लाहौर की सैंट्रल जेल में भगत सिंह द्वारा अपने क्रांतिकारी मित्र शिव वर्मा को कहे गए आखिरी शब्द जो आज भी हम सब पर शत-प्रतिशत लागू होते हैं, ‘मैं तो कुछ ही दिनों में सारे झंझटों से छुटकारा पा जाऊंगा लेकिन तुम लोगों को लम्बा सफर तय करना पड़ेगा। मुझे विश्वास है कि इस लम्बे सफर में तुम थकोगे नहीं, पस्त नहीं होगे और हार मानकर रास्ते में बैठ नहीं जाओगे।’ 


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