‘साधुवाद के पात्र हैं’ मृत प्रियजनों के अंग दान करने वाले!

Edited By Updated: 11 Jul, 2026 03:02 AM

those who donate organs of their deceased loved ones deserve praise

भारत में प्रतिवर्ष 5 लाख लोगों की मौत दिल, जिगर या फिर किडनी फेल हो जाने के कारण अंगदानियों की कमी के चलते होती है। मृतकों के परिजनों द्वारा दान किए अपने दिवंगत परिजनों के अंग किसी दूसरे मृत्यु किनारे पड़े रोगी का जीवन बचा सकते हैं। मृत व्यक्ति का...

भारत में प्रतिवर्ष 5 लाख लोगों की मौत दिल, जिगर या फिर किडनी फेल हो जाने के कारण अंगदानियों की कमी के चलते होती है। मृतकों के परिजनों द्वारा दान किए अपने दिवंगत परिजनों के अंग किसी दूसरे मृत्यु किनारे पड़े रोगी का जीवन बचा सकते हैं। मृत व्यक्ति का लिवर तीन लोगों के काम आ सकता है। दान की गई त्वचा पांच वर्ष तक सुरक्षित रहती है तथा तेजाब हमले या आतिशबाजी के शिकार या जले लोगों के काम आ सकती है। भारत में अंगदान का प्रचलन बहुत कम है परन्तु ऐसे जागरूक परिवार यहां अवश्य मौजूद हैं जो अपनी पीड़ा में भी विवेक और संयम से काम लेते हुए अपने दिवंगत प्रियजनों के अंगों का दान कर दूसरों को नवजीवन प्रदान करते हैं, जिनकी इसी वर्ष की पिछले 4 महीनों की चंद घटनाएं निम्न में दर्ज हैं :

* 9 मार्च को ‘कुतबुल्लापुर’ (तेलंगाना) में ‘रंगरैडी’ जिले में एक मृतक ‘बांदी सिलोन राजू’ की किडनियां, लिवर, दिल और आंखों की पुतलियां (कॉॢनया) 6 जरूरतमंदों को  तथा एक अन्य मृतक ‘बुद्दे पुशेटी’ की किडनियां, लिवर तथा फेफड़े जरूरतमंदों को दिए गए।
* 27 मई को सड़क दुर्घटना में घायल ‘हयातनगर’ (तेलंगाना) की रहने वाली ‘बुशीपाक लक्ष्मी’ की किडनी, लिवर तथा आंखों की पुतलियां (कॉॢनया) 4 जरूरतमंद रोगियों को लगाई गईं। 
इसी प्रकार ‘करीम नगर’ की एक मृत महिला ‘अक्कापेली सुप्रिया’ के पति ‘अक्कापेली प्रवीण कुमार’ ने अपनी दिवंगत पत्नी को दूसरों के शरीर में जिंदा रखने के लिए उनकी किडनी और लिवर 2 जरूरतमंदों को दान कर दिए।
* 27 मई को ही ‘जयपुर’ (राजस्थान) में एक सड़क दुर्घटना में मृत ‘जिज्ञांशु’ नामक युवक के परिवार ने उनके अंग दान करने की सहमति दे दी। ‘जिज्ञांशु’ के लिवर को प्रत्यारोपण के लिए ग्रीन कॉरिडोर बनाकर जोधपुर भेजा गया जबकि उनकी किडनियों को इसी अस्पताल में एक जरूरतमंद को लगाकर उसे जीवनदान दिया गया। 

* 17 जून को ‘नागपुर’ (महाराष्ट्र) में खेलते समय दुर्घटना का शिकार हुई 6 वर्षीय बच्ची ‘आकांक्षा’ के माता-पिता ने उसकी किडनियां एम्स ‘नागपुर’ में उपचाराधीन 15 वर्षीय जरूरतमंद बच्ची को लगाने के लिए दान कर दीं। ‘आकांक्षा’ के शरीर से किडनियां निकालने से पूर्व डाक्टरों ने ‘आकांक्षा’ के लिए प्रार्थना करके उसे श्रद्धांजलि भेंट की।
* 18 जून को एक सड़क दुर्घटना में घायल लैक्चरार योगेश कुमार को पी.जी.आई. चंडीगढ़ में मृत घोषित कर देने पर उनके परिवार ने उनके लिवर, दोनों किडनियां और पैनक्रियाज दान कर दिए जो गंभीर रूप से बीमार 4 जरूरतमंदों के जीने का सहारा बने। 
* और अब 7 जुलाई को ‘तिरुवनंतपुरम’ (केरल) में सड़क दुर्घटना के बाद मृत घोषित किए गए 7 वर्षीय बालक ‘लोकिनेनी यशवंत’ के परिजनों ने उसके अंगदान का फैसला किया जिससे 6 रोगियों को नवजीवन मिला। उसके 2 गुर्दे, लिवर, 2 कॉर्निया और दिल के वॉल्व दान किए गए। उसका एक गुर्दा कन्नूर के किशोर में जबकि दूसरा गुर्दा सरकारी मैडीकल कॉलेज अस्पताल में इलाज करवा रही 4 वर्ष 10 महीने की बच्ची को दिया गया। उसके लिवर से 17 साल की एक बीमार लड़की को नया जीवन मिला है।

मृत शरीर को जलाने से वे अंग भी नष्ट हो जाते हैं, जिनमें प्राण होने के कारण उनसे किसी जरूरतमंद को नवजीवन दिया जा सकता है। अत: भारतीयों को अपने किसी प्रियजन की मृत्यु होने पर व्यक्ति के अंगों का दान कर देना चाहिए क्योंकि अंगदान से बड़ा कोई दान नहीं है जिससे कई जिंदगियां बचती हैं। अपने दिल पर पत्थर रख कर अपने प्रियजनों के अंगदान का निर्णय लेने वाले परिवार साधुवाद के पात्र हैं, अत: सरकार द्वारा ऐसे लोगों को पुरस्कृत तथा सम्मानित करना चाहिए ताकि उन्हें देख कर दूसरे लोगों को भी अपने मृत परिजनों के अंग दान करने की प्रेरणा मिले। इसके साथ ही सरकारी स्तर पर भी लोगों को अंगदान करने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से अभियान चलाना चाहिए ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग अंगदान के लिए प्रेरित हो सकें।-विजय कुमार 

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