भारतीय समाज और नवचेतना के उभरते स्वर

Edited By Updated: 18 May, 2022 05:20 AM

emerging voices of indian society and new consciousness

भारतीय मूल के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित लेखक वी.एस. नायपॉल की 1976 में प्रकाशित प्रसिद्ध पुस्तक ‘इंडिया अ वूंडेड सिविलाइजेशन’ ने भारतीय सभ्यता के अंतद्र्वंद्वों को बड़ी गहराई से परखने का प्रयास किया था। उसकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं, ‘‘भारत में...

भारतीय मूल के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित लेखक वी.एस. नायपॉल की 1976 में प्रकाशित प्रसिद्ध पुस्तक ‘इंडिया अ वूंडेड सिविलाइजेशन’ ने भारतीय सभ्यता के अंतद्र्वंद्वों को बड़ी गहराई से परखने का प्रयास किया था। उसकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं, ‘‘भारत में जो हो रहा है वह एक नई ऐतिहासिक जागृति है। मुझे ऐसा लगता है कि भारतीय अपने इतिहास के प्रति जीवंत हो रहे हैं। आक्रमणकारी जीत रहे थे, लोगों को अपने अधीन कर रहे थे। और वे ऐसे देश में थे जहां लोगों ने इसे कभी नहीं समझा। लेकिन अब लोग समझने लगे हैं कि भारत के साथ बहुत बड़ी बर्बरता हुई है।’’ 

कई विश्लेषक, जो इसे हिंदू राष्ट्रवाद का उभार कहना बेहतर समझते हैं, वे इस स्पष्ट संकेत को नहीं समझना चाह रहे कि शायद भारतीय समाज का एक बड़ा अंग अब अपने मूल इतिहास और उपेक्षित सांस्कृतिक अस्मिता के प्रति सजग और जीवंत हो रहा है। वे अब हर्बर्ट रिजले सहित हर नस्लवादी आर्य-द्रविड़ और जातिवादी विभाजन के सिद्धांतों को अपने तर्क की कसौटी पर परखना चाहते हैं। तभी प्रखर वक्ता जे. साई दीपक अपने को एक ‘साऊथ इंडियन’ की बजाय ‘ऐन इंडियन फ्रॉम साऊथ’ कहलाना पसंद करते हैं। भारतीय समाज अब संकुचित दायरे और दशकों से गढ़े गए सैकुलर-कम्युनल पाखंड से बाहर जाकर समग्रता से अपनी भारतीय पहचान फिर से तलाशना चाहता है। 

इस बात को गर्वपूर्वक मान लेने में क्या शर्म है कि इस देश का इतिहास मात्र 500 या 1000 वर्षों का नहीं है, जब से विदेशी आक्रांताओं ने यहां आकर लूटपाट मचाना और बाद में यहीं के लोगों का उत्पीडऩ और शोषण शुरू किया। लेकिन वह क्या शक्ति थी जिसने भारत की सनातनी परम्परा को कभी मिटने नहीं दिया। जाने-माने समाजवादी विचारक, लेखक और कम्पैरिटिव रिलीजन के अध्येता अरुण भोले ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘धर्मों की कतार में इस्लाम’ में यह विचारणीय प्रश्न उठाया है। उनके अनुसार अपने लम्बे और अक्सर असहिष्णुतापूर्ण शासनकाल के बावजूद विदेशी आक्रांता इस विशाल सनातनी  परम्परा के वृक्ष के कुछ डाल-पात ही काट पाए। इसके विपरीत दुनिया के जिस किसी दूसरे देश पर उनका आधिपत्य हुआ उन्होंने उसका सम्पूर्ण धर्मांतरण कर दिया, चाहे वह ईरान हो, इंडोनेशिया या मलेशिया। 

कुछ ऐसे ही विचार युवा लेखक ओमेन्द्र रत्नु के भी हैं, जो पेशे से एक डॉक्टर हैं। वह कहते हैं कि इस देश के बहुसंख्यक हिंदू कभी किसी बाहरी ताकत के गुलाम थे, यह विचार आरोपित करना देश के इतिहास के साथ किया गया एक कुटिल मजाक है। जिस देश में महाराणा प्रताप जैसे प्रतापी योद्धा ने राजा मानसिंह के द्वारा अकबर को यह स्पष्ट संदेश दे दिया हो कि ‘बेटी नहीं दूंगा, चौथ नहीं दूंगा और चाकरी नहीं करूंगा, उस विशाल समाज को क्या गुलाम बनाया जा सकता था?’ यह ऐतिहासिक अवधारणा सिर्फ इस देश के बहुसंख्यक समाज को हतोत्साहित करने के लिए रची गई। लेकिन आज जब वह अपने ऊपर जबरन आरोपित विचारों की फिर से समीक्षा करना चाहता है तो उसे दक्षिणपंथी हिंदुत्व बता कटघरे में डालने का प्रयास किया जाता है। इसके बावजूद वह आज हर स्तर पर, हर उस दुष्प्रचार का प्रतिवाद करना चाहता है, जो उसे असमर्थ, दीन और प्रतिभाहीन साबित करने के लिए रचा गया है। वह टुकड़े-टुकड़े राष्ट्रीयता और अखंड भारत के फर्क को समझना चाहता है। 

आश्चर्य है कि इस देश के वामपंथी विचारकों ने अपने ही देश के अन्य विचार रखने वाले चिंतकों और विचारकों से कुछ सीखने का प्रयास क्यों नहीं किया। उनमें से अगर कुछेक ने भी राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर द्वारा भारतीय संस्कृति और सभ्यता के इतिहास पर लिखित उनकी पुस्तक ‘संस्कृति के चार अध्याय’ पढ़ी होती तो नस्ल, आर्य-द्रविड़, संस्कृत-तमिल, वर्ण व्यवस्था, जाति व्यवस्था, वैदिक दर्शन और हिंदू धर्म सहित भारतीय समाज के हर पहलू को समझने का एक नया दृष्टिकोण मिलता। अपनी पुस्तक में वह मैकाले और डॉक्टर डफ के एजैंडे से भी हमें परिचित कराते हैं। मैकाले ने कहा था कि ‘थोड़ी-सी पाश्चात्य शिक्षा से ही बंगाल में मूॢत पूजने वाला कोई नहीं रह जाएगा।’ 

दिनकर लिखते हैं कि 1835 में डॉक्टर डफ ने कहा था कि ‘जिस-जिस दिशा में पाश्चात्य संस्कृति प्रगति करेगी, उस-उस दिशा में ङ्क्षहदुत्व के अंग टूटते जाएंगे।’ अब आप ही निर्णय करें कि जिस सनातन परम्परा में कहा गया हो ‘सा विद्या या विमुक्तयेश्’ अर्थात् विद्या वह है जो ‘पूर्वाग्रहों’ से मुक्त करे। उसके सामने शिक्षा और ज्ञान की यह पाश्चात्य अवधारणा कैसी दिखती है। ऐसे हजारों उदाहरण और कारण मिलेंगे। जरूरत है भारतीय समाज में प्रवाहित हो रही इस नवचेतना को उसके पूरे संदर्भ में समझने की। एक प्रगतिशील समाज से यही अपेक्षा हो सकती है।-मिहिर भोले
 

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