केंद्र-राज्य संबंध मजबूत करने की जरूरत

Edited By ,Updated: 21 Apr, 2022 05:35 AM

need to strengthen centre state relations

स्वतंत्रता के बाद से केंद्र तथा राज्यों के बीच मनमुटाव रहा है और 1990 के दशक में केंद्र में गठबंधन की सरकारों का युग शुरू होने के बाद से इसमें और तेजी आई। क्षेत्रीय दलों के उभार तथा राज्यों द्वारा

स्वतंत्रता के बाद से केंद्र तथा राज्यों के बीच मनमुटाव रहा है और 1990 के दशक में केंद्र में गठबंधन की सरकारों का युग शुरू होने के बाद से इसमें और तेजी आई। क्षेत्रीय दलों के उभार तथा राज्यों द्वारा दबाव बनाने के परिणामस्वरूप मतभेद पैदा हुए हैं। 

यद्यपि देश ने पहले कभी भी मनमुटाव के वर्तमान स्तर जैसी स्थिति नहीं देखी जहां कुछ राज्य भारतीय जनता पार्टी नीत केंद्रीय गठबंधन सरकार द्वारा लिए गए कुछ निर्णयों का विरोध कर रहे हैं। इस बढ़ते हुए अविश्वास पर देश के शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व को आवश्यक तौर पर ध्यान देने की जरूरत है। इसका नवीनतम उदाहरण केंद्र द्वारा भारतीय पुलिस सेवा अधिकारियों की नियुक्ति के नियमों से संबंधित अपना निर्णय राज्यों पर थोपने का प्रयास है।

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पुलिस अधीक्षक तथा उपपुलिस महानिरीक्षक के रैंक के अधिकारियों पर रोक लगाने का प्रस्ताव किया है, जो उच्च रैंक्स में केंद्र के लिए किसी भी तरह के डैपुटेशन से इन रैंक में डैपुटेशन पर सेवा नहीं देते। इस वर्ष के शुरू में भाजपा शासित कुछ राज्यों सहित कई राज्यों ने आई.ए.एस., आई.पी.एस. तथा भारतीय वन सेवा अधिकारियों के सेवा नियमों में बदलाव की योजना के खिलाफ कड़ी आपत्ति जताई थी। नए कानूनों को संविधान के संघीय नियमों के उल्लंघन के तौर पर देखा गया। 

गत वर्ष ऐसा ही तमाशा देखने को मिला था जब ममता बनर्जी नीत राज्य सरकार ने केंद्र सरकार द्वारा पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्य सचिव को बुलाने के आदेश से इंकार करते हुए उन्हें नहीं जाने दिया। आखिरकार मुख्य सचिव ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया तथा एक सलाहकार के तौर पर सरकार में शामिल हो गए। केंद्र तथा राज्यों के बीच मनमुटाव अधिकारियों के डैपुटेशन के प्रश्न पर ही सीमित नहीं है। हालिया महीनों में 9 राज्यों ने केंद्रीय जांच ब्यूरो को कथित अपराधियों पर छापे मारने के लिए दी गई बेरोक-टोक इजाजत वापस ले ली थी। इसे इस संदेह के परिणामस्वरूप देखा गया कि केंद्र एजैंसी का दुरुपयोग राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने के लिए कर रहा है। 

ऐसे कई और उदाहरण हैं जहां राज्यों ने केंद्र के साथ अपनी सहमति नहीं जताई। इनमें जी.एस.टी. प्राप्त राजस्व के आबंटन, कोविड वैक्सीन तथा जीवन रक्षक उपकरणों की आपूर्ति, कृषि कानून लागू करना, केंद्रीय परियोजनाओं का आबंटन तथा प्रवर्तन निदेशालय, आयकर विभाग तथा नारकोटिक्स ब्यूरो जैसी केंद्रीय एजैंसियों की भूमिका से संबंधित हालिया मामले शामिल हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तथा महाराष्ट्र के कुछ मंत्रियों ने कोविड महामारी से संबंधित स्रोतों के आबंटन में केंद्र के भेदभाव का खुल कर आरोप लगाया है। 

राज्यों, विशेषकर केंद्र में सत्ताधारी पार्टी के अलावा अन्य पार्टियों द्वारा शासित, ने जोर देकर कहा है कि केंद्र राज्यों के स्वायत्त अस्तित्व को मानने से इंकार करता है तथा अपनी इच्छा थोपने का प्रयास करता है। एक अन्य हालिया उदाहरण तमिलनाडु सरकार द्वारा नीट (भारत में मैडीकल अंडर ग्रैजुएट सीटों में दाखिला लेने के लिए आयोजित किया जाने वाला नैशनल एलिजीबिलिटी कम एंट्रैंस टैस्ट) में संशोधन का है, जो एक संवेदनशील मुद्दा है। राज्य सरकार का मानना है कि संयुक्त परीक्षा आयोजित करने से गरीब विद्याॢथयों को नुक्सान होगा तथा इससे राज्य में सेवाओं की भी क्षति होगी। 

एक अन्य हालिया विवाद वर्तमान में अंग्रेजी से इस्तेमाल की बजाय राज्यों तथा केंद्र के बीच एक संपर्क भाषा के तौर पर हिन्दी के इस्तेमाल से संबंधित प्रस्ताव का है। स्वाभाविक है कि कुछ राज्य इस प्रस्ताव का विरोध करने के लिए ऐड़ी चोटी का जोर लगा देंगे। भारतीय जनता पार्टी के एक राष्ट्र-एक प्रणाली के सिद्धांत के कई क्षेत्रों में अपने लाभ हैं लेकिन संस्कृति तथा परम्पराओं के मद्देनजर देश में व्यापक विभिन्नता के साथ-साथ यह तथ्य को देखते हुए कि सभी जगह एक जैसा विकास तथा प्रगति नहीं हुई है, बेहतर यही होगा कि सभी तरह के दृष्टिकोणों को सब पर एक समान लागू करने से बचा जाए। आगे का रास्ता एकतरफा निर्णयों को थोपने की बजाय चर्चा के द्वारा एक सर्वसम्मति पर पहुंचने का है।-विपिन पब्बी
 

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