Edited By ,Updated: 18 Aug, 2026 05:26 AM

भारत की करंसी सिर्फ कागज और स्याही नहीं, संप्रभुता की प्रतीक है, रोजमर्रा के भरोसे का साधन है और राज्य की क्षमता का आईना है। भारतीय रिजर्व बैंक (आर.बी.आई.) का प्रस्ताव कि छोटे मूल्यवर्ग (10 रुपए और 20 रुपए) में पॉलिमर या ‘प्लास्टिक’ नोट जारी किए...
भारत की करंसी सिर्फ कागज और स्याही नहीं, संप्रभुता की प्रतीक है, रोजमर्रा के भरोसे का साधन है और राज्य की क्षमता का आईना है। भारतीय रिजर्व बैंक (आर.बी.आई.) का प्रस्ताव कि छोटे मूल्यवर्ग (10 रुपए और 20 रुपए) में पॉलिमर या ‘प्लास्टिक’ नोट जारी किए जाएं, देश की मौद्रिक यात्रा में एक अहम पड़ाव है। यह कदम टिकाऊपन और लागत बचत का वादा करता है लेकिन साथ ही पर्यावरणीय स्थिरता, समावेशिता और आधुनिकीकरण की राजनीति पर सवाल भी उठाता है।
दुनिया में पॉलिमर नोट कोई नई चीज नहीं हैं। ऑस्ट्रेलिया ने इन्हें 1988 में शुरू किया। उसके बाद कनाडा, ब्रिटेन और नाइजीरिया जैसे देशों ने इन्हें अपनाया। इनका आकर्षण टिकाऊपन और सुरक्षा में है। एक पॉलिमर नोट कागजी नोट से 3 से 4 गुना ज्यादा चलता है, नमी और गंदगी से बचता है और उन्नत सुरक्षा फीचर लिए होता है। भारत में छोटे मूल्यवर्ग के नोट जल्दी खराब हो जाते हैं। आर.बी.आई. को इन्हें बार-बार छापना पड़ता है। 10 रुपए का एक कागजी नोट मुश्किल से एक साल टिकता है। पॉलिमर नोट इस खर्च को घटा और नकली नोटों पर रोक लगाने में मददगार हो सकते हैं।
टिकाऊपन का सबसे बड़ा असर अनौपचारिक अर्थव्यवस्था पर होगा। ठेले वाले, छोटे दुकानदार और ग्रामीण परिवार रोज छोटे नोटों का इस्तेमाल करते हैं। पॉलिमर नोट लेन-देन को आसान बनाएंगे। जिनके लिए डिजिटल भुगतान सुलभ नहीं है, उनके लिए लंबे समय तक चलने वाला नोट सुविधा है। टिकाऊपन का वादा पर्यावरणीय बोझ भी लाता है। पॉलिमर नोट बायोडिग्रेडेबल नहीं हैं। भारत में रीसाइक्लिंग की व्यवस्था कमजोर है। अगर इनके निपटान की योजना नहीं बनी, तो पर्यावरणीय नुकसान वित्तीय बचत से बड़ा साबित हो सकता है। कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने पॉलिमर कचरे को संभालने के लिए रीसाइक्लिंग सिस्टम बनाए हैं।
करंसी सुधार कभी तटस्थ नहीं होते। 2016 की नोटबंदी की यादें अभी ताजा हैं। उस घटना ने दिखाया कि पैसा राज्य की वैधता और जनता के भरोसे से कितना गहराई से जुड़ा है। पॉलिमर नोट कम विवादास्पद हैं लेकिन प्रतीकात्मक महत्व रखते हैं। ये आधुनिकीकरण और वित्तीय अनुशासन का संदेश देते हैं। लेकिन पारदॢशता पर सवाल भी उठते हैं। 2013 में जब कोच्चि और भुवनेश्वर में ट्रायल हुए थे, संसद में लागत, स्वीकार्यता और पर्यावरण पर ङ्क्षचताएं उठी थीं, वे आज भी प्रासंगिक हैं।
राजनीतिक रूप से पॉलिमर नोटों को ‘साफ-सुथरे’ और ‘सुरक्षित’ मौद्रिक ढांचे का हिस्सा बताया जा सकता है। हाशिए पर खड़े समूहों के लिए टिकाऊ नोट पुराने, फटे-पुराने नोटों की बेइज्जती से मुक्ति देंगे। यह राज्य पर भरोसा मजबूत करेगा। लेकिन ‘प्लास्टिक’ शब्द का अर्थ आम बोलचाल में कृत्रिमता और अस्थायित्व भी होता है। लोग इन्हें कम ‘असली’ मान सकते हैं।
पॉलिमर नोट संक्रमणकालीन साधन हैं। ये पारंपरिक नकद और डिजिटल करंसी के बीच पुल का काम करेंगे। इनकी सफलता सिर्फ तकनीकी दक्षता पर नहीं, बल्कि भरोसा और जवाबदेही बनाए रखने पर निर्भर करेगी। पॉलिमर नोट महज तकनीकी सुधार नहीं हैं। ये राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन हैं। आॢथक रूप से ये बचत और सुरक्षा का वादा करते हैं। राजनीतिक रूप से ये आधुनिकीकरण का प्रतीक हैं लेकिन समावेशिता पर सवाल उठाते हैं। सामाजिक रूप से ये नकद के इस्तेमाल की प्रथाओं को बदलते हैं। भारत की चुनौती इन आयामों को संतुलित करने की है।-पूर्णेंदु रंजन