Goswami Tulsidas Jayanti: जब हनुमान जी ने तोता बनकर तुलसीदास को कराई प्रभु राम की पहचान, जानें अनसुने प्रसंग

Edited By Updated: 19 Aug, 2026 07:04 AM

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Goswami Tulsidas Jayanti 2026: जानिए, कैसे एक प्रेत की मदद से तुलसीदास जी को हनुमान जी मिले और चित्रकूट के घाट पर स्वयं भगवान राम ने उन्हें तिलक लगाया। पढ़ें रामचरितमानस की रचना का पूरा इतिहास।

Goswami Tulsidas Jayanti 2026: रामचरितमानस जैसे महान ग्रंथ के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को मनाई जाती है। तुलसीदास जी ने भगवान शिव के आशीर्वाद से मानस को लोकभाषा में लिपिबद्ध किया ताकि जन-जन के अंतर्मन का अंधकार मिट सके और उन्हें श्री राम की अनन्य भक्ति प्राप्त हो। उनका जीवन चित्रकूट, काशी और अयोध्या की गलियों में बीता, जहां उन्हें साक्षात ईश्वरीय कृपा प्राप्त हुई।

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काशी में प्रेत से भेंट और हनुमान जी का पता
तुलसीदास जी के जीवन का एक अत्यंत रोचक प्रसंग काशी से जुड़ा है। एक बार काशी में उनकी भेंट एक प्रेत से हुई। उस प्रेत ने ही तुलसीदास जी को हनुमान जी के दर्शन प्राप्त करने का गुप्त उपाय बताया। कठिन प्रयासों के बाद जब उन्हें हनुमान जी के दर्शन हुए, तो उन्होंने करबद्ध प्रार्थना की कि उन्हें प्रभु श्री राम के दर्शन करवाएं। तुलसीदास जी की निष्ठा देख हनुमान जी ने उन्हें आश्वासन दिया कि प्रभु के दर्शन चित्रकूट में होंगे।

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चित्रकूट के घाट पर अद्भुत परीक्षा
हनुमान जी के कहे अनुसार तुलसीदास जी चित्रकूट में रहने लगे। एक दिन उन्होंने दो सुंदर युवकों को घोड़े पर सवार देखा, जो उनसे मार्ग पूछ रहे थे। वे युवक स्वयं राम-लक्ष्मण थे, लेकिन तुलसीदास जी उन्हें पहचान नहीं पाए और सुध-बुध खो बैठे। उनके जाने के बाद हनुमान जी ने प्रकट होकर बताया कि वे साक्षात प्रभु थे। तुलसीदास जी को अपनी भूल पर बहुत पछतावा हुआ।

तुलसीदास जी को दुखी देख हनुमान जी ने सांत्वना दी कि अगले दिन पुनः दर्शन होंगे। अगली सुबह जब वे चित्रकूट के घाट पर लोगों को चंदन लगा रहे थे, तब प्रभु राम एक बालक के रूप में आए और बोले— "बाबा, हमें चंदन नहीं दोगे?"।

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जब हनुमान जी ने पढ़ा प्रसिद्ध दोहा
हनुमान जी को लगा कि तुलसीदास जी इस बार भी कहीं चूक न जाएं, इसलिए उन्होंने तोते का रूप धारण किया और प्रसिद्ध दोहा पढ़ा: "चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीर। तुलसीदास चंदन घिसे तिलक देत रघुबीर॥"

यह सुनते ही तुलसीदास जी ने अपने प्रभु को पहचान लिया और प्रेमवश बेसुध हो गए। तब भगवान राम ने स्वयं अपने हाथ से पहले खुद को और फिर तुलसीदास जी के माथे पर तिलक लगाकर उन्हें कृतार्थ किया।

रामचरितमानस की रचना: 2 साल, 7 महीने का कठिन परिश्रम
भगवान शिव और माता पार्वती ने भी तुलसीदास जी को दर्शन देकर अयोध्या जाने का आदेश दिया था। शिव जी के आशीर्वाद से उन्होंने अयोध्या में रामनवमी के दिन रामचरितमानस की रचना शुरू की। इस पावन ग्रंथ को पूर्ण करने में उन्हें 2 वर्ष, 7 महीने और 26 दिन का समय लगा। संवत 1633 के मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की विवाह पंचमी के दिन इसके सातों कांड पूर्ण हुए।

तुलसीदास जी द्वारा रचित मानस, विनय पत्रिका और हनुमान चालीसा आज घर-घर में गूंज रहे हैं, जो कलियुग के समस्त पापों का नाश करने वाले और कल्याणकारी हैं।

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