राहुल की राजनीति और सत्ता पक्ष की रणनीति

Edited By Updated: 21 Feb, 2026 03:17 AM

rahul s politics and the ruling party s strategy

संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू के एक बयान से भारतीय राजनीति में नया उबाल आ गया है। रिजिजू का कहना है कि राहुल गांधी देश के लिए सबसे खतरनाक इंसान हैं। अब आप चाहें तो इसे एक सामान्य किस्म का  सियासी बयान कह कर हाशिए पर डाल सकते हैं या चूंकि यह संसदीय...

संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू के एक बयान से भारतीय राजनीति में नया उबाल आ गया है। रिजिजू का कहना है कि राहुल गांधी देश के लिए सबसे खतरनाक इंसान हैं। अब आप चाहें तो इसे एक सामान्य किस्म का  सियासी बयान कह कर हाशिए पर डाल सकते हैं या चूंकि यह संसदीय कार्य मंत्री का बयान है, इसलिए इसके महत्व पर बहस कर सकते हैं। सबसे बड़ी बात है कि संसदीय कार्य मंत्री का काम सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संवाद, सामंजस्य बैठाने का होता है ताकि संसद की कार्रवाई सुचारू रूप से चल सके। ऐसे में यह बयान तो विपक्ष खासतौर से कांग्रेस को उकसाने वाला है। 

तो सवाल उठता है कि आखिर बयान क्यों दिया गया, क्या अपनी तरफ से दिया गया या दिलवाया गया? क्या इसके पीछे मोदी सरकार की कोई रणनीति काम कर रही है? क्या यह राहुल गांधी को फिर से घेरने की किसी योजना का हिस्सा है? दिलचस्प है कि भाजपा सांसद निशिकांत दुबे लगभग ऐसे ही आरोप लगाते हुए राहुल गांधी के खिलाफ ठोस प्रस्ताव संसद में रख चुके हैं। उधर कांग्रेस की पहल पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव रखा जा चुका है। तो क्या राहुल गांधी पर दबाव डाला जा रहा है कि वह अपने प्रस्ताव को वापिस ले लें और बदले में दुबे का प्रस्ताव वापिस ले लिया जाएगा?

रिजिजू कह रहे हैं कि राहुल गांधी के नक्सलियों, खालिस्तानियों और इस्लामिक कट्टरपंथी नेताओं से संबंध हैं। वह भारत विरोधी विदेशी ताकतों से जुड़े हुए हैं। वह सोरेस से पैसा लेते हैं। विदेश जाकर देश विरोधी ताकतों से मेल-मुलाकात करते हैं। अब पहली नजर में तो ये गंभीर आरोप हैं। उस नेता विपक्ष के खिलाफ गंभीर आरोप हैं, जो 22 सालों से सांसद है। अब कायदे से तो यह माना जाना चाहिए कि संसदीय कार्य मंत्री हवा में तलवारबाजी नहीं ही कर रहे होंगे। सबूत होंगे। सबूत हैं तो किसी थाने में एफ.आई.आर. दर्ज क्यों नहीं की गई? सबूत सही पाए जाने पर राहुल गांधी जेल की सीखचों के पीछे हो जाने चाहिए थे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हो रहा। इससे साफ है कि मामला सियासी है। दरअसल भाजपा खुद तो सत्ता में रहना चाहती है लेकिन साथ ही विपक्ष की स्पेस (जगह) भी अपने पास ही रखना चाहती है। लेकिन जब से राहुल गांधी विपक्ष के नेता बने हैं और कांग्रेस 99 सीटों तक पहुंची है, तब से उन्होंने विपक्ष के स्पेस को कब्जे में लेना शुरू कर दिया है। यह बात साफ है कि केंद्र में भाजपा की अगुवाई वाले एन.डी.ए. को सिर्फ कांग्रेस की अगुवाई वाला ‘इंडिया’ गठबंधन ही हटा सकता है। यहां सबसे बड़ा रोड़ा राहुल गांधी ही नजर आते हैं। 

राहुल गांधी ने पहले जातीय जनगणना, फिर संविधान बदलने का आरोप और आरक्षण का मुद्दा उठाकर भाजपा की मुश्किलें बढ़ाई हैं। अब वह कभी जनरल नरवणे की पांडुलिपि का जिक्र करते हैं तो कभी ट्रम्प के साथ हुई डील का सवाल उठाते हैं। कभी एपस्टीन फाइल्स का हवाला देते हैं तो कभी ऑपरेशन सिंदूर के बहाने मोदी सरकार को घेरने की कोशिश करते हैं। राहुल गांधी अमरीका से होने वाली डील पर 5 सवाल पूछ रहे हैं। उधर अमित शाह, पीयूष गोयल और शिवराज सिंह चौहान उन्हें झूठा बता रहे हैं, गिरिराज सिंह नेहरू-एडविना की तस्वीरें लहरा रहे हैं, निशिकांत दुबे राहुल गांधी को चुनाव लडऩे से रोकने का प्रस्ताव ला रहे हैं और किरण रिजिजू सबसे खतरनाक इंसान बता रहे हैं। हो सकता है कि भाजपा को लगता हो कि नैरेटिव इस तरह बदला जा सकता है, एपस्टीन फाइल्स से जनता का ध्यान भटकाया जा सकता है और विपक्ष के आरोपों पर लंबी लकीर खींची जा सकती है।

हकीकत तो यही है कि देश में आमतौर पर शायद ही कोई मानेगा कि विपक्ष का नेता देशद्रोही हो सकता है। राहुल गांधी कई बार शब्दों का उचित चयन नहीं कर पाते, वह ङ्क्षहदी में जब भी भाषण देते हैं तो इधर-उधर सही शब्द के मामले में लडख़ड़ा जाते हैं, उनके भाषण का कंटैंट मजबूत होता है लेकिन वह संवाद स्थापित नहीं कर पाते, जनता तो छोडि़ए, अपने कार्यकत्र्ताओं तक ठीक से पहुंच नहीं पाते। कांग्रेस पार्टी के नेता भी दबी जुबान से मानते हैं कि राहुल गांधी कभी-कभी किसी मुद्दे को जबरन घसीटते रहते हैं, जबकि हर मुद्दे की एक एक्सपायरी डेट होती है।

अक्सर कहा जाता है कि ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, स्टालिन, तेजस्वी यादव सत्ता पक्ष के साथ उस अदावत से पेश नहीं आते, जैसे कि राहुल गांधी आते हैं। बात सही है लेकिन राज्यों के नेता अपने राज्य तक सीमित रहते हैं क्योंकि वह मुख्यमंत्री तो बन सकते हैं लेकिन प्रधानमंत्री तो कांग्रेस से ही होगा। राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं और विपक्षी दलों के क्षत्रपों के बीच अदावत चरम पर होती है, जो चुनाव संपन्न होने के बाद कम होती जाती है। यह भी सच्चाई है कि केंद्र सरकार की मदद की जरूरत राज्य सरकारों को पड़ती रहती है लेकिन जब राष्ट्रीय राजनीति की बात आती है तो सारे समीकरण दूसरे हो जाते हैं।

अगर वास्तव में मोदी सरकार चाहती है कि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष अपना प्रस्ताव वापस ले ले तो विपक्ष की झोली में कुछ न कुछ तो डालना ही होगा। किसी को खतरनाक बताकर उसके साथ सियासी सौदेबाजी नहीं की जा सकती। हमारे लोकतंत्र की यही खूबसूरती है कि आपसी सहमति से बीच का रास्ता निकलता है। लेकिन इसके लिए मिलना होता है, साथ बैठना पड़ता है और बात करनी पड़ती है। विपक्ष को भी संकेत देना चाहिए कि वह पुरानी बातें भूल कर बात करने के लिए तैयार है, बशर्ते माहौल बदला-बदला हो। अगर हर चीज को चुनावी हार-जीत से जोड़ कर देखा जाएगा तो वही होगा जो संसद के दोनों सदनों में दिख रहा है। आज के सोशल मीडिया के दौर में जनता (मतदाता) 5 साल में एक बार फैसला नहीं सुनाती। जनता हर रोज हिसाब-किताब करती चलती है। आलोक धन्वा की एक कविता है ‘दुनिया रोज बनती है’।-विजय विद्रोही
 

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