आदत बनता सोशल मीडिया, लगाम आवश्यक

Edited By Updated: 18 Mar, 2026 04:14 AM

social media becoming a habit a curb is essential

बचपन की मासूमियत निगलती सोशल मीडिया की लत विश्व भर में चर्चा का विषय बन चुकी है। बच्चों तथा किशोरों पर सोशल मीडिया के प्रयोग संबंधी पाबंदी लगाने की शुरुआत ऑस्ट्रेलिया से होती हुई फ्रांस, इंडोनेशिया, स्पेन, नार्वे, ग्रीस जैसे कई देशों तक जा पहुंची...

बचपन की मासूमियत निगलती सोशल मीडिया की लत विश्व भर में चर्चा का विषय बन चुकी है। बच्चों तथा किशोरों पर सोशल मीडिया के प्रयोग संबंधी पाबंदी लगाने की शुरुआत ऑस्ट्रेलिया से होती हुई फ्रांस, इंडोनेशिया, स्पेन, नार्वे, ग्रीस जैसे कई देशों तक जा पहुंची है। गत दिनों भारत के आंध्र प्रदेश तथा कर्नाटक भी इस मुद्दे पर आवाज उठाते नजर आए। तेलुगु देशम पार्टी (तेदेपा) के नेतृत्व वाली राजग सरकार ने 13 साल से कम बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंधित करने की बात कही, जबकि कर्नाटक सरकार की घोषणा अनुसार, निर्धारित आयु सीमा 16 वर्ष रहेगी। 

वैश्विक नैटवर्किंग, व्यापक व्यापार तथा विपणन अवसरों, सहज अंत:क्रिया और विभिन्न प्लेटफॉर्मों पर सूचना सांझाकरण में बहु-उपयोगी सिद्ध हो रहे सोशल मीडिया का दरअसल, एक स्याह पक्ष भी है, जिसमें गोपनीयता संबंधी चिंताएं, ध्यान भटकना, गलत सूचना और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव आदि समस्याएं उभरकर सामने आ रही हैं। विशेषकर बच्चों तथा किशोरों में सोशल मीडिया के प्रति अनवरत बढ़ता आकर्षण न केवल लत बनकर उनकी सेहत निगल रहा है, अपितु असामाजिक तत्वों द्वारा उनकी व्यक्तिगत सुरक्षा में सेंध लगाने का जरिया भी बन रहा है। मनोवैज्ञानिकों एवं बाल स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राय में, सोशल मीडिया का अनियंत्रित उपयोग बच्चों के मानसिक तथा भावनात्मक विकास को बहुत प्रभावित कर सकता है। मस्तिष्क विकास के दृष्टिगत किशोरावस्था का प्रारंभिक चरण अत्यधिक संवेदनशील होता है, जोकि सामाजिक दबावों, साथियों के विचारों आदि से काफी हद तक प्रभावित हो सकता है।

वास्तव में, सोशल मीडिया का लगातार उपयोग भावनाएं-आवेग नियंत्रित करने वाले क्षेत्रों में विशेष परिवर्तन ला सकता है, जिससे सामाजिक संकेतों के प्रति संवेदनशीलता बढऩे से हृदय अधिक भावुक या दुखी हो सकता है। ऑनलाइन धमकाया जाना अथवा साथियों का दबाव (पीअर प्रैशर) किशोरों को तनाव अथवा आत्मघाती विचारों की ओर मोड़ सकता है। आधुनिक बच्चों के व्यवहार में अधीरता, आक्रामकता, चिड़चिड़ापन आदि लक्षण बहुतायत में देखे जा सकते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक खेल-कूद से दूरी, परिवर्तित लाइफ स्टाइल एवं बढ़ता स्क्रीन टाइम इसमें प्रमुख कारण हैं। यद्यपि पूर्णत: प्रमाणित नहीं, तथापि कुछ शोधों के तहत, सोशल मीडिया का उपयोग अवसाद तथा चिंता जैसे लक्षण उत्पन्न कर सकता है। स्क्रीन से निकलने वाली रोशनी सर्कैडियन रिदम को बाधित कर सकती है। देर रात सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने से नींद का पैटर्न गड़बड़ा सकता है। बहुत अधिक समय बिताने से एकाग्रता में कमी जैसे लक्षण सामने आ सकते हैं। 2020 में हुए अध्ययन के अनुसार, एक माह के लिए अपना फेसबुक अकाऊंट निष्क्रिय करने वाले कुछ लोगों ने अवसाद तथा चिंता में कमी के साथ-साथ खुशी और जीवन संतुष्टि में बढ़ौतरी होने की सूचना दी। 

सोशल मीडिया का निकृष्टतम पहलू है, साइबर बुलिंग अथवा साइबर धोखाधड़ी, जिसमें यौन शोषण से लेकर वित्तीय ब्लैकमेल के लिए अंतरंग छवियों को वितरित करना आदि शामिल हैं। एक अध्ययन के तहत, 72 प्रतिशत किशोरों ने किसी न किसी समय साइबर बुलिंग का शिकार होने की बात स्वीकारी।  सरसरी तौर पर भले ही यह निर्णय अनियंत्रित डिजिटल गतिविधियों से उत्पन्न होने वाले जोखिम से परेशान अभिभावकों की चिंता कम करने वाला प्रतीत होता हो, किंतु कार्यान्वयन के आधार पर व्यावहारिकता जांचें तो इसे लागू करने में अड़चनें भी कम नहीं! सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाना कुछ मायनों में अवश्य अच्छा हो सकता है लेकिन इसे पूर्णत: प्रतिबंधित करना संभव नहीं, वह भी आज के तकनीकी दौर में, जब इसका प्रयोग पठन-पाठन, ज्ञानार्जन आदि से लेकर शैक्षिक संस्थानों द्वारा गृहकार्य, सूचनाएं वगैरह भेजने के निमित्त किया जाता हो। चूंकि घोषणा का प्रारूप अभी तक स्पष्ट नहीं, ऐसे में इस प्रतिबंध का प्रभावी क्रियान्वयन कैसे सुनिश्चित होगा, समझना मुश्किल है? सोशल मीडिया संचालित करने वाली तकनीकी कंपनियां इस बाबत कितना सहयोगी रवैया अपनाएंगी, यह भी स्वयं में एक यक्ष प्रश्न है? 

किशोरों को सोशल मीडिया के दुष्प्रभावों से बचाने के निहितार्थ भारत के दो राज्यों में उठी यह गूंज अवश्य सार्थक सिद्ध हो सकती है, यदि घोषणा को अमली जामा पहनाने में अपेक्षित तत्परता दिखाई जाए। बृहद परिवर्तन तभी संभव है, जब सरकारें, शिक्षा संस्थान, अभिभावक तथा तकनीकी प्लेटफार्म पारस्परिक सामंजस्य से एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए सारगर्भित हल निकालें। तब दो राज्यों की पहल एक सार्थक मुहिम बनकर केंद्र सरकार के सहयोग से ऐसे गंभीर विषय पर केंद्रीय कानून लाने की ओर उन्मुख होगी। बच्चेे देश का भविष्य हैं, उनका आज और कल सेहतमंद एवं सुरक्षित बनाना सांझा दायित्व है।-दीपिका अरोड़ा
 

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