रवीन्द्रनाथ टैगोर भारत की आत्मा थे, जिन्होंने गांधी को महात्मा बनाया

Edited By Updated: 14 May, 2026 06:05 AM

rabindranath tagore was the soul of india who made gandhi the mahatma

रबीन्द्र  नाथ टैगोर का जन्म 7 मई, 1861 और निधन 7 अगस्त, 1941 को हुआ। बापू गांधी 2 अक्तूबर, 1869 को जन्मे और 30 जनवरी, 1948 को मृत्यु को प्राप्त हुए। दोनों एक ही युग के प्रतिनिधि थे लेकिन भिन्न क्षेत्रों में, एक को गीतांजलि के कवि, राष्ट्रगान के...

रबीन्द्र नाथ टैगोर का जन्म 7 मई, 1861 और निधन 7 अगस्त, 1941 को हुआ। बापू गांधी 2 अक्तूबर, 1869 को जन्मे और 30 जनवरी, 1948 को मृत्यु को प्राप्त हुए। दोनों एक ही युग के प्रतिनिधि थे लेकिन भिन्न क्षेत्रों में, एक को गीतांजलि के कवि, राष्ट्रगान के रचयिता, नोबेल पुरस्कार विजेता और विश्व-कवि के रूप में याद किया जाता है और दूसरे को भारत का भाग्य विधाता, जिसने आजादी की लड़ाई में अग्रणी भूमिका निभाई। टैगोर ने शुरुआती वर्षों में ब्रिटिश शासन को पूरी तरह शत्रु की तरह नहीं देखा था। वह मानते थे कि पश्चिम से शिक्षा,आधुनिकता और वैज्ञानिक चेतना भारत के लिए उपयोगी हो सकती है। इसी तरह गांधी भी शुरू में अंग्रेजी शासन के विरोधी नहीं थे।

दोनों एक-दूसरे का सम्मान करते थे लेकिन उनके वैचारिक मतभेद भी थे। टैगोर ने गांधी को ‘महात्मा’ कहा लेकिन वह गांधीवाद के हर पहलू से सहमत नहीं थे। वह चरखा आंदोलन को भारत की जटिल आॢथक समस्या का पर्याप्त समाधान नहीं मानते थे। गांधी इसे राष्ट्र चेतना मानते थे, जो ग्रामीण क्षेत्रों से निकली और उनकी आॢथक स्थिति की रीढ़ और भूख मिटाने और तन ढांपने तथा और गरीबी से बाहर निकलने का साधन बन गई। जहां गांधी स्वदेशी और जन आंदोलन की बात करते थे, टैगोर व्यक्ति की स्वतंत्र चेतना और वैश्विक मानवतावाद पर जोर देते थे। टैगोर ने गांधी को एक ओर महात्मा कहा तो उनके विरोधी बन चुके सुभाषचंद्र बोस को ‘देशनायक’ कहा।

वह हिंसक संघर्ष के समर्थक नहीं थे लेकिन बोस के व्यक्तित्व और राष्ट्रनिष्ठा का सम्मान करते थे। टैगोर विचारधारा से अधिक चरित्र और उद्देश्य के समर्थक थे और जब उन पर यह आरोप लगा कि वह जमींदार परिवार से थे और ग्रामीण भारत की वास्तविक निर्धनता से दूरी रखते थे, तो उन्होंने शांति निकेतन और ग्रामीण पुनॢनर्माण कार्यक्रम शुरू किए और उनके आलोचकों को मानना पड़ा कि उनका दृष्टिकोण सुधारवादी था। भारत का राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ और बंगलादेश का राष्ट्रगान ‘आमार सोनार बांग्ला’ दोनों टैगोर की रचनाएं हैं। टैगोर संकीर्ण राष्ट्रवाद के आलोचक थे और राष्ट्र को मानवता से ऊपर रखने के पक्षधर थे। इसीलिए उनकी रचनाएं राष्ट्र की पहचान बनीं। 

टैगोर देवत्व नहीं, संवाद हैं : रबीन्द्र नाथ टैगोर को केवल पूजनीय प्रतीक बना देना उनके साथ अन्याय है। वह विरोधाभासों से भरे, संवेदनशील, कभी-कभी भ्रमित, पर निरंतर विकसित होते ङ्क्षचतक थे। उनकी सबसे बड़ी शक्ति यही थी कि वह किसी एक विचारधारा, राष्ट्रवाद, धर्म या सत्ता के कैदी नहीं बने। उन्होंने लिखा था : 

टैगोर और फिल्म : टैगोर स्वयं फिल्मकार नहीं थे, पर उनकी रचनाएं सिनेमा के लिए खजाना बनीं। टैगोर के उपन्यास, कहानियां, नाटक और गीत इतने दृश्यात्मक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक थे कि अनेक फिल्मकारों ने उन्हें पर्दे पर उतारा। सबसे प्रसिद्ध रूपांतरण काबुलीवाला थी। यह कहानी सीमाओं से परे मानव संबंध की ऐसी मिसाल है, जो आज के विस्थापन और प्रवासन के दौर में भी प्रासंगिक है। चारुलता (निर्देशक सत्यजीत रे) टैगोर की कथा नष्टनीड़ पर आधारित है और यह फिल्म भारतीय सिनेमा की महानतम फिल्मों में गिनी जाती है। स्त्री मन की जटिलता, भावनात्मक अकेलापन, बौद्धिक आकर्षण और विवाह संस्था की सूक्ष्म पड़ताल करती यह फिल्म अद्वितीय है। यदि भारतीय सिनेमा में टैगोर की आत्मा को सबसे गहराई से किसी ने समझा, तो वह सत्यजीत रे थे। उनके सिनेमा में आंतरिक संघर्ष, सामाजिक परिवर्तन, मानवीय जटिलता, सौंदर्य और विचार का संतुलन ऐसा है कि इसमें स्पष्ट रूप से टैगोरियन परंपरा दिखाई देती है। 

टैगोर का जीवन अनेक स्त्रियों की उपस्थिति, प्रेरणा और विछोह की गहराई से प्रभावित था। उनकी भाभी कादंबरी देवी को टैगोर के भावनात्मक और रचनात्मक जीवन की अत्यंत महत्वपूर्ण पात्र माना जाता है। वह उनकी प्रारंभिक साहित्यिक संवेदना, सौंदर्यबोध और आत्मीयता की केंद्र थीं। कादंबरी देवी की आत्महत्या और टैगोर के साथ उनके संबंधों को लेकर वर्षों से साहित्यिक बहस होती रही है। प्रत्यक्ष प्रमाण सीमित हैं, पर यह निॢववाद है कि इस घटना ने टैगोर को भीतर तक प्रभावित किया।  रबीन्द्र नाथ टैगोर को समझना हो तो केवल उनकी कविताएं पढऩा पर्याप्त नहीं, उनके परिवार को समझना भी उतना ही आवश्यक है। टैगोर किसी साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि से नहीं आए थे। वह बंगाल के उस अद्वितीय ‘टैगोर परिवार’ (ठाकुरबाड़ी) से थे, जिसने 19वीं सदी के भारतीय पुनर्जागरण, सामाजिक सुधार, संगीत, साहित्य, शिक्षा और आधुनिक चेतना को गहराई से प्रभावित किया। टैगोर परिवार बंगाल पुनर्जागरण का केंद्र था। उनके दादा द्वारकानाथ टैगोर अपने समय के अत्यंत संपन्न, आधुनिक और वैश्विक दृष्टि वाले उद्योगपति-जमींदार थे। पिता देवेंद्रनाथ टैगोर आध्यात्मिकता, दर्शन और सुधारवाद के प्रतीक थे और वह ब्रह्म समाज के प्रमुख स्तंभों में थे। टैगोर राष्ट्रभक्त थे, पर अंधराष्ट्रवादी नहीं। उन्होंने ब्रिटिश ‘नाइटहुड’ लौटाया, लेकिन साथ ही चेताया कि राष्ट्रवाद यदि मानवता से ऊपर हो जाए, तो वह खतरनाक है। सिर्फ राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, मानसिक मुक्ति भी होनी चाहिए।-पूरन चंद सरीन 
 

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