तमिलनाडु का बदलता परिदृश्य

Edited By Updated: 19 May, 2026 04:08 AM

the changing landscape of tamil nadu

हाल ही में मशहूर अभिनेता विजय थलपति ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तो वहां वंदे मातरम गाया गया। उनकी एक विधायक और अभी तक विजय की कैबिनेट की इकलौती महिला मंत्री, एस. कीर्तना ने कहा कि मैं हिंदी में बात कर रही हूं। मैं अपनी पार्टी का...

हाल ही में मशहूर अभिनेता विजय थलपति ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, तो वहां वंदे मातरम गाया गया। उनकी एक विधायक और अभी तक विजय की कैबिनेट की इकलौती महिला मंत्री, एस. कीर्तना ने कहा कि मैं हिंदी में बात कर रही हूं। मैं अपनी पार्टी का प्रतिनिधित्व हर जगह, पूरे भारत में, यहां तक कि दूसरे देशों में फैलाना चाहती हूं, इसीलिए ङ्क्षहदी में बात कर रही हूं। तमिलनाडु में अब तक द्रमुक सत्ता में थी। उसका हिंदी विरोध मशहूर है। हिंदी का विरोध करते-करते वे हिंदी भाषियों को जब चाहे तब कूट देते थे। एक बार उन्होंने ङ्क्षहदी बोलने वालों को गोलगप्पे बेचने वाला कहा था। जैसे कि गोलगप्पे बेचकर रोटी-रोजी कमाना कितनी गलत बात है और वे आदमी ही नहीं होते।

बहुत पहले चेन्नई गई थी। तब इसे मद्रास नाम से जाना जाता था। वहां लोग ङ्क्षहदी में बात करते ही नफरती नजरों से देखते थे। जैसे हिंदी बोलना कितना बड़ा अपराध हो। यही नहीं, ऑटो, टैक्सी वाले हिंदी में बोलने पर उतारने की धमकी देते थे।  होटलों तक में आप हिंदी बोलकर खाना नहीं मंगा सकते थे। मुश्किल यह थी कि तमिल आती नहीं और अंग्रेजी बहुत से लोग समझते नहीं थे। इसलिए तय किया कि अब वहां कभी नहीं जाना है। जहां एक भाषा बोलने पर आप से किसी शत्रु देश से आए की तरह व्यवहार किया जाए, तो क्या फायदा। 

राजनीतिक दल अपने-अपने स्वार्थ के लिए आम लोगों में कितने वैमनस्य के बीज बोते हैं, यह इस बात का उदाहरण है। लेकिन राजनीतिक दलों से इतर आम लोगों के जीवन में कुछ और ही दिखाई देता है। बहुत-सी दक्षिण भारतीय अभिनेत्रियां, जब हिंदी फिल्मों में आईं, तभी उन्हें अखिल भारतीय ख्याति भी मिली। इसे समय-समय पर दिए गए अपने इंटरव्यूज में उन्होंने स्वीकारा भी। कमल हासन ने ‘एक दूजे के लिए’ फिल्म में काम किया था, जो सुपरहिट रही थी। वह हिंदी क्षेत्र में घर-घर का नाम बन गए थे। लेकिन इन दिनों वह अपने तीखे हिंदी विरोध के लिए जाने जाते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री और अपने समय की मशहूर अभिनेत्री जयललिता ने तो एक हिंदी गाना भी गाया था। उनकी आवाज भी बहुत मधुर थी। बहुत से दक्षिण भारतीय लेखक निजी बातचीत में इस लेखिका से कह चुके हैं कि वे चाहते हैं कि उनकी रचनाओं का अनुवाद हिंदी में हो। 

एस. कीर्तना के बयान से जाहिर है कि वह विजय थलपति के विचारों को ही व्यक्त कर रही हैं। यानी कि उन्हें पता है कि अगर भारत भर में उनकी पार्टी को जगह बनानी है, तो उन्हें  स्वीकार्यता चाहिए। वे हिंदी क्षेत्र को नकार कर सफल नहीं हो सकते। साथ ही, वे द्रमुक के हिंदी विरोध से अपने को अलग दिखाना भी चाहते हैं। वंदे मातरम को जगह देकर यह भी बताया गया कि वे भाजपा की भूमि पर भी सेंध लगाना चाहते हैं। देखते हैं कि आगे क्या होता है। एक बार बंगाल की प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी ने कहा था कि जब उनकी रचनाओं का हिंदी में अनुवाद हुआ, तभी उन्हें बड़ा पाठक वर्ग मिला। एक निजी अनुभव भी सांझा कर रही हूं। मेरी घरेलू सहायिका तमिल है। उसकी बेटी ने दिल्ली से 12वीं पास की। फिर उसका विवाह तमिलनाडु के एक गांव में हो गया। वहां जाते ही उसे एक स्कूल में 10 हजार रुपए की नौकरी मिल गई। उसे हिंदी पढ़ाने का काम मिला। इस तरफ मात्र 12वीं पास को शायद ही 10 हजार रुपए की नौकरी किसी स्कूल में मिलती, लेकिन वहां यह हुआ।

यानी कि वहां आम लोग अपने बच्चों को हिंदी पढ़ाना चाहते हैं। कारण कि वे इस तरफ आकर कोई रोजगार पा सकें। उन्हें भाषाई दिक्कत का सामना न करना पड़े। बल्कि कुछ साल पहले द्रमुक ने भी अपना एक चुनावी पम्फ्लैट हिंदी में छपवाया था। उनके एक नेता को एक बार टी.वी. पर हिंदी बोलते भी देखा गया था। हिंदी क्षेत्र में शायद ही आपने ऐसा सुना होगा कि किसी को भाषा के नाम पर सताया गया हो, खदेड़ा गया हो या काम न दिया गया हो। आज भी बहुत से कर्मचारी दक्षिण भारतीय हैं लेकिन शायद ही उन्हें कोई सताता है। न उनके खान-पान के बारे में कोई नकारात्मक बात होती है बल्कि दक्षिण का इडली, डोसा, सांभर, रसम, बीसे बेले भात आदि उत्तर भारतीयों में बहुत लोकप्रिय हैं।

एक बात और न जाने क्यों दक्षिण भारत में लोग समझते हैं कि एक अभिनेता फिल्मों में जो क्रांति करता है, वह जीवन और राजनीति में भी कर सकता है। इसीलिए वे उन्हें चुनाव जिता देते हैं। उनके जबरदस्त फैन होते हैं। बार-बार उन्हें गद्दी सौंपते हैं। किसी की लम्बी उम्र  के लिए अंगारों पर चलते हैं। उनके लिए मंदिर बनाते हैं। यदि किसी की मृत्यु हो जाए, तो जान तक दे देते हैं। जबकि हिंदी क्षेत्र में ऐसा दिखाई नहीं देता। बड़े से बड़े अभिनेता,  चाहे वह अमिताभ बच्चन हों, राजेश खन्ना, विनोद खन्ना, धर्मेंद्र या हेमा मालिनी, उन्हें सिर पर नहीं बिठाते। उनके लिए जान न्यौछावर नहीं करते। इस इलाके में शायद ही कोई अभिनेता कभी मुख्यमंत्री बना हो। इसीलिए इनमें से अधिकांश अभिनेता राजनीति में  सफल नहीं रहे हैं।-क्षमा शर्मा
 

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