अंतिम व्यक्ति की चिंता का दर्शन

Edited By Updated: 25 Sep, 2026 05:38 AM

the philosophy of concern for the last person

दुनिया बदल गई, अर्थव्यवस्था बदली, बाजार बदला, तकनीक ने जीवन की गति बदल दी लेकिन एक प्रश्न आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि इस पूरी प्रगति के केंद्र में मनुष्य कहां है? और विकास की रोशनी उस व्यक्ति तक कितनी पहुंची है? वह जो  समाज की अंतिम पंक्ति में...

दुनिया बदल गई, अर्थव्यवस्था बदली, बाजार बदला, तकनीक ने जीवन की गति बदल दी लेकिन एक प्रश्न आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि इस पूरी प्रगति के केंद्र में मनुष्य कहां है? और विकास की रोशनी उस व्यक्ति तक कितनी पहुंची है? वह जो  समाज की अंतिम पंक्ति में खड़ा है? 

पं. दीनदयाल उपाध्याय ने दशकों पहले इसी प्रश्न को भारतीय दृष्टि से देखा था। उनके लिए राजनीति केवल सत्ता पाने की कला नहीं थी। अर्थव्यवस्था केवल उत्पादन और संपदा बढ़ाने का गणित नहीं थी। विकास केवल आंकड़ों की चमक नहीं था। इन सबके केंद्र में मनुष्य था। उसका शरीर, उसका मन, उसकी बुद्धि और उसकी आत्मा। उसका परिवार, समाज, संस्कृति और प्रकृति से संबंध। इसी समग्र दृष्टि को उन्होंने ‘एकात्म मानववाद’ का स्वर दिया। इसलिए दीनदयाल जी की जयंती केवल स्मरण का दिन नहीं है। बल्कि यह उस प्रश्न को फिर से पूछने का दिन है कि क्या हमारी व्यवस्था मनुष्य के लिए है? क्या हमारी प्रगति अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रही है?

मनुष्य केवल शरीर नहीं है। उसके पास मन है। बुद्धि है। आत्मा है। उसे रोटी चाहिए लेकिन केवल रोटी पर्याप्त नहीं। रोजगार चाहिए लेकिन सम्मान भी। भौतिक सुख चाहिए लेकिन परिवार, समाज, संस्कृति और आत्मिक संतोष भी। मनुष्य को उसकी इसी संपूर्णता में देखना एकात्म मानववाद का आधार है। एकात्म मानववाद गरीब और वंचित की चिंता करता है लेकिन इसके लिए व्यक्ति को केवल वर्ग की पहचान तक सीमित नहीं करता। वह आर्थिक विषमता के प्रश्न को स्वीकार करता है लेकिन समाज को स्थायी वर्ग-संघर्ष में बांटने की बजाय सहयोग, सहभागिता और सामाजिक समरसता का रास्ता खोजता है। 20वीं सदी के उत्तरार्ध में सोवियत संघ का विघटन हुआ। पूर्वी यूरोप की अनेक केंद्रीकृत कम्युनिस्ट व्यवस्थाएं बदल गईं। इससे राज्य-नियंत्रित अर्थव्यवस्था, राजनीतिक केंद्रीकरण और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के प्रश्नों पर दुनिया में नई बहस खड़ी हुई। लेकिन पूंजीवाद भी सभी प्रश्नों का अंतिम उत्तर नहीं बन सका। बाजार ने समृद्धि पैदा की लेकिन असमानता, उपभोक्तावाद और संसाधनों के असंतुलित उपयोग के प्रश्न बने रहे।

यहीं दीनदयाल जी का प्रश्न फिर सामने आता है, क्या मनुष्य को बाजार और राज्य के बीच किसी एक को चुनना ही होगा? एकात्म मानववाद तीसरी दृष्टि प्रस्तुत करता है। राज्य आवश्यक है लेकिन सर्वशक्तिमान नहीं। बाजार उपयोगी है लेकिन मनुष्य से बड़ा नहीं। संपत्ति आवश्यक है, लेकिन समाज से निरपेक्ष नहीं। विकास चाहिए लेकिन ऐसा विकास, जो मनुष्य, समाज, संस्कृति और प्रकृति के बीच संतुलन न तोड़े। यही इस दर्शन की आज की प्रासंगिकता है। अंत्योदय-विचार से व्यवहार तक : एकात्म मानववाद का सबसे सहज सामाजिक रूप अंत्योदय में दिखाई देता है। विकास की कसौटी वह व्यक्ति हो, जो सबसे पीछे है। इसी वैचारिक परंपरा को भारतीय जनता पार्टी ने अपने मूल दर्शन से जोड़ा।

दीनदयाल जी का चिंतन भाजपा के लिए केवल इतिहास की विरासत नहीं, बल्कि उसकी घोषित वैचारिक आधारभूमि भी रहा है। आज जब भाजपा गरीब-कल्याण, वित्तीय समावेशन, घर, बिजली, स्वच्छता, स्वास्थ्य, पेयजल और अंतिम छोर तक सरकारी योजनाओं की पहुंच को अपनी शासन-नीति के प्रमुख विषयों के रूप में प्रस्तुत करती है, तो पार्टी इसे अंत्योदय और एकात्म मानववाद की इसी वैचारिक परंपरा से जोड़ती है। यहां विचार का मूल सूत्र महत्वपूर्ण है। योजना दिल्ली में बने। उसकी सफलता की कसौटी दिल्ली नहीं, देश के किसी दूरस्थ गांव में खड़ा अंतिम व्यक्ति हो। उसके घर तक बिजली पहुंची या नहीं? पानी पहुंचा या नहीं? इलाज की सुविधा मिली या नहीं? बैंकिंग व्यवस्था से वह जुड़ा या नहीं? उसके सिर पर छत है या नहीं? उसके जीवन में सम्मान और अवसर बढ़े या नहीं? यही अंत्योदय को केवल कल्याणकारी योजना से अलग एक व्यापक सामाजिक दृष्टि बनाता है।

व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज : एकात्म मानववाद की एक और विशेषता है। वह व्यक्ति को अकेला नहीं देखता। व्यक्ति परिवार का हिस्सा है। परिवार समाज का। समाज राष्ट्र का। राष्ट्र प्रकृति और व्यापक मानवता से जुड़ा है। इनमें संघर्ष नहीं, सामंजस्य होना चाहिए। इसीलिए इस दर्शन में अधिकार के साथ कत्र्तव्य है। अर्थ के साथ नैतिकता है। विकास के साथ पर्यावरण है। आधुनिकता के साथ सांस्कृतिक चेतना है। दीनदयाल जी पश्चिम से संवाद के विरोधी नहीं थे। उनका आग्रह अंधानुकरण के विरुद्ध था। आज भारतीय जनता पार्टी का जो विशाल संगठनात्मक वट वृक्ष दिखाई देता है, उसकी जड़ों में डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय जैसे तपस्वी नेताओं का श्रम, विचार और समर्पण भी है। उन्होंने उस समय विचार की नींव रखी, जब राजनीतिक शक्ति सीमित थी। साधन कम थे। लेकिन लक्ष्य स्पष्ट था, भारत की राजनीति को भारत की अपनी दृष्टि से देखने का प्रयास। आज भाजपा के लिए दीनदयाल जी का स्मरण इसलिए केवल अपने एक पुरोधा को नमन करना नहीं है, यह उस वैचारिक कसौटी को भी याद करना है जिस पर सत्ता, संगठन और शासन, तीनों को स्वयं को निरंतर परखना होता है।

25 सितम्बर को पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर उन्हें नमन करते हुए उनके विचार का सार शायद एक वाक्य में समझा जा सकता है-प्रगति की ऊंचाई का मूल्यांकन शिखर पर खड़े व्यक्ति को देखकर नहीं, बल्कि उस अंतिम व्यक्ति को देखकर होना चाहिए, जो अब तक सबसे पीछे था। यही अंत्योदय है। यही एकात्म मानववाद की आत्मा है और यही दीनदयाल जी के चिंतन का वह प्रश्न है, जो बदलती दुनिया में आज भी हमारे सामने जीवित है।- के.के. उपाध्याय

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