एस.आई.आर. की सफाई में फंसते मतदाता!

Edited By Updated: 25 Sep, 2026 04:17 AM

voters get caught in the sir s explanation

चुनावी लोकतंत्र की रीढ़ मतदाता सूची है। जब वह शुद्ध हो, तब लोकतंत्र भी मजबूत होता है। लेकिन जब शुद्धिकरण का अर्थ ही लाखों-करोड़ों वास्तविक मतदाताओं को सूची से बाहर कर देना बन जाए, तब चुनाव आयोग जैसी संस्था की विश्वसनीयता भी संकट में पड़ जाती है।...

चुनावी लोकतंत्र की रीढ़ मतदाता सूची है। जब वह शुद्ध हो, तब लोकतंत्र भी मजबूत होता है। लेकिन जब शुद्धिकरण का अर्थ ही लाखों-करोड़ों वास्तविक मतदाताओं को सूची से बाहर कर देना बन जाए, तब चुनाव आयोग जैसी संस्था की विश्वसनीयता भी संकट में पड़ जाती है। चुनाव आयोग द्वारा शुरू किए गए विशेष गहन पुनरीक्षण (एस.आई.आर.) का यही विरोधाभास आज देश के कई राज्यों में साफ दिख रहा है।

देखा जाए तो आयोग का आधिकारिक लक्ष्य सही है, कोई पात्र मतदाता छूटे नहीं, कोई अपात्र शामिल न हो। सुप्रीम कोर्ट ने भी एस.आई.आर. की वैधता को बरकरार रखा। लेकिन सवाल प्रक्रिया के सिद्धांत का नहीं, उसके क्रियान्वयन का है। घर-घर प्रगणन, 2002 की पुरानी सूची से मैपिंग, ‘तार्किक विसंगति’ जैसे अस्पष्ट श्रेणीबद्ध आधार और नोटिसों की बाढ़ ने आम मतदाता को अपराधी जैसा महसूस कराया है। इस प्रक्रिया के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। बिहार में मतदाता सूची लगभग 7.89 करोड़ से घटकर अंतिम रूप में करीब 7.42 करोड़ रह गई। उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, गुजरात समेत 12 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों की संयुक्त सूची में भी करोड़ों नाम घटे। उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी संख्या में कटौती बताई गई, पश्चिम बंगाल में भी 10 प्रतिशत से अधिक गिरावट दर्ज हुई। वहीं महाराष्ट्र में 2 करोड़ से अधिक नाम बाहर दिखे, कर्नाटक में 1 करोड़ से ऊपर, दिल्ली में करीब 47.56 लाख। ऐसे में विपक्ष का दावा है कि पूरे देश में मसौदा स्तर पर लगभग 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए जा चुके हैं। ये आंकड़े अंतिम स्थायी कटौती नहीं हैं, लेकिन पैमाना इतना बड़ा है कि ‘शुद्धिकरण’ शब्द ही संदेह पैदा करता है।

दिल्ली का उदाहरण सबसे ताजा और सबसे चिंताजनक है। 2025 के विधानसभा चुनाव में राजधानी की सूची करीब 1.56 करोड़ थी। एस.आई.आर. शुरू होने से पहले ही यह घटकर लगभग 1.45 करोड़ रह गई। फिर प्रगणन में केवल 67 प्रतिशत फॉर्म जमा हुए और मतदाता सूची 97.53 लाख पर सिमट गई। यानी एक-तिहाई से अधिक नाम सूची से गायब। इसके बाद भी मतदाता सूची में शामिल करीब 33 लाख मतदाताओं को नोटिस जारी किए गए। इनमें लगभग 13.79 लाख इसलिए, कि उनका नाम 2002 की गहन पुनरीक्षण सूची से मैप नहीं हो सका और 19.33 लाख ‘ताॢकक विसंगति’ के नाम पर। वहीं दिल्ली के मुख्य चुनाव अधिकारी ने बार-बार कहा है कि नोटिस का मतलब कटौती नहीं है, सुनवाई के बिना कोई नाम नहीं कटेगा। फिर भी लाखों परिवारों में अफरा-तफरी है। 

पश्चिम बंगाल का अनुभव और भी सबक देता है। वहां लाखों नाम ‘संदिग्ध’ श्रेणी में डाले गए। अपील न्यायाधिकरणों में निपटाए गए मामलों में बहाली की दर बहुत ऊंची रही। अगर सुनवाई के बाद इतने बड़े हिस्से को पात्र माना जा रहा है, तो पहले चरण में उन्हें अपात्र मानने की प्रक्रिया में गड़बड़ी स्पष्ट है। बिहार और बंगाल से दिल्ली आए प्रवासी मतदाता एक और जाल में फंस गए हैं-एक राज्य की सूची से नाम कटा, दूसरे में मैपिंग नहीं हुई, तीसरे में ‘पहले से नामांकित’ का ठप्पा लग गया। नतीजा, नागरिक तीनों जगहों पर वोट देने का हक खो बैठा।

एक अंग्रेजी अखबार की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार इस प्रक्रिया पर लिखित आपत्ति दर्ज की। जिसमें नई पंजीकरण प्रक्रिया, नाम जोडऩे-काटने, फॉर्म-6 में बदलाव, बंगाल में बहाली के आदेशों के खिलाफ अपील जैसे मुद्दों पर ध्यान आकॢषत किया गया। अखबार का दावा है कि कुछ नोट्स में फैसलों को उनकी जानकारी के बिना लिया गया बताया गया। इस पर आयोग का जवाब है कि मतभेद सामान्य विचार-विमर्श का हिस्सा हैं और अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से ही हुए। संस्था के अंदर असहमति लोकतांत्रिक स्वास्थ्य का संकेत भी हो सकती है, बशर्ते वह पारदर्शी हो। लेकिन जब 3 में से 2 आयुक्त बार-बार प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हों और बाहर करोड़ों नागरिक नोटिस और कटौती से जूझ रहे हों, तब ‘सर्वसम्मति’ का दावा पर्याप्त नहीं दिखाई देता।

समस्या दस्तावेज और तकनीक की भी है। प्रवासी मजदूर, किराएदार, बुजुर्ग, पहली बार वोट डालने वाले युवा, इनके पास हमेशा वही कागज नहीं होते, जिनकी सूची आयोग मांगता है। 2002 की सूची से मैपिंग उन पीढिय़ों के लिए अन्याय है, जिनका उस समय नाम ही नहीं था। ‘ताॢकक विसंगति’ की परिभाषा भी अस्पष्ट है। यांत्रिक नोटिस सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुके हैं। सुनवाई की समय-सीमा कम है, अपील तंत्र धीमा है और कई राज्यों में स्थानीय चुनाव सिर पर हैं। तो ऐसे में मतदाता खुद को इस भूलभुलैयां में फंसा हुआ पाता है। यह बात सही है कि मृत, दोहरी और फर्जी प्रविष्टियां हटनी ही चाहिएं लेकिन शुद्धिकरण का भार सबसे कमजोर मतदाता पर नहीं डाला जा सकता। 

मतदाता सूची का शुद्धिकरण जरूरी है। लेकिन शुद्धिकरण का मतलब यह नहीं कि नागरिक को अपनी वैधता बार-बार साबित करनी पड़े, जबकि राज्य अपनी गलती छिपाए। जानकार मानते हैं कि चुनाव आयोग को 3 काम तुरंत करने चाहिएं। पहला, एस.आई.आर. से पहले और दौरान काटे गए हर नाम का कारण आदि सार्वजनिक डाटाबेस में डाले जाएं। दूसरा, ‘लॉजिकल डिस्क्रिपैंसी’ के मापदंड साफ हों और मामूली वर्तनी/उम्र की त्रुटि स्वत: सुधार योग्य हो, दंडनीय नहीं। तीसरा, इसका समय बढ़ाया जाए और एस.आई.आर. शिविर बस्तियों तक जाएं, न कि मतदाता दफ्तर तक दौड़े। दिल्ली की बात करें तो अंतिम सूची 4 नवम्बर को आने वाली है। उसके पहले अगर पारदर्शिता नहीं आई, तो दिल्ली की नई मतदाता सूची साफ नहीं, संकीर्ण होगी। चुनाव आयोग स्वतंत्र संस्था है। स्वतंत्रता का अर्थ निरंकुशता नहीं, जवाबदेही है। विशेष गहन पुनरीक्षण उसी परीक्षा में खड़ा है।-रजनीश कपूर 
 

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