शिक्षित लोग क्यों चुनते हैं आतंक की राह

Edited By Updated: 22 Jan, 2026 07:18 AM

why do educated people choose the path of terrorism

आतंकवाद को अक्सर गरीबी, अशिक्षा और सामाजिक बहिष्कार का परिणाम माना जाता है। लेकिन भारत सहित दुनिया भर के अनुभव बताते हैं कि यह पूरी सच्चाई नहीं है। हाल के वर्षों में ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें उच्च शिक्षित और पेशेवर रूप से प्रशिक्षित लोग...

आतंकवाद को अक्सर गरीबी, अशिक्षा और सामाजिक बहिष्कार का परिणाम माना जाता है। लेकिन भारत सहित दुनिया भर के अनुभव बताते हैं कि यह पूरी सच्चाई नहीं है। हाल के वर्षों में ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें उच्च शिक्षित और पेशेवर रूप से प्रशिक्षित लोग आतंकवादी गतिविधियों में शामिल पाए गए। अल-फलाह विश्वविद्यालय से जुड़े चिकित्सकों का मामला इसी असहज वास्तविकता की ओर संकेत करता है।

प्रश्न उठता है कि शिक्षा, जो विवेक और समझ विकसित करने का माध्यम मानी जाती है, कभी-कभी चरमपंथ को रोकने में क्यों विफल हो जाती है? शिक्षा अपेक्षाएं बढ़ाती है। जब ये अपेक्षाएं सीमित अवसरों, संस्थागत अव्यवस्था या व्यक्तिगत असफलताओं से टकराती हैं, तो निराशा तीव्र हो जाती है। पुलिसिंग के अनुभव से यह स्पष्ट है कि सापेक्ष वंचना, यानी जो मिलना चाहिए था और जो मिला, उसके बीच का अंतर, अक्सर पूर्ण गरीबी से अधिक प्रभावी होता है। शिक्षित व्यक्ति असफलता को भाग्य नहीं, अन्याय के रूप में देखने लगता है। विश्वविद्यालय और पेशेवर संस्थान कौशल तो सिखाते हैं, लेकिन सोहबत और उद्देश्य प्रदान करने में अक्सर पीछे रह जाते हैं। घर से दूर, परिचित सामाजिक-सांस्कृतिक ढांचे से बाहर काम कर रहे युवा पेशेवर अकेलेपन का अनुभव कर सकते हैं। ऐसे समय में संगठित वैचारिक समूह-धार्मिक हों या राजनीतिक-स्पष्टता, पहचान और उद्देश्य देते हैं। वे व्यक्तिगत असमंजस को सामूहिक मिशन में बदल देते हैं।

एक कम चर्चित पहलू यह भी है कि शिक्षा तर्कशक्ति को तेज करती है लेकिन नैतिक संयम अपने-आप नहीं देती। उच्च शिक्षा में सिखाए गए औजार- तर्क, अमूर्तन और प्रणालीगत सोच, हिंसा को चुनौती देने के लिए भी उपयोगी हैं और उसे सही ठहराने के लिए भी। चरमपंथी विचारधाराएं सुव्यवस्थित कथानकों पर आधारित होती हैं, जिनमें हिंसा को आवश्यक, रक्षात्मक या नैतिक रूप से श्रेष्ठ बताया जाता है। शिक्षित व्यक्ति ऐसे तर्कों को अधिक कुशलता से आत्मसात कर सकता है। यह अज्ञान नहीं, बल्कि बुद्धि का दुरुपयोग है। संगठनात्मक दृष्टि से शिक्षित पेशेवर आतंकवादी नैटवर्क के लिए उपयोगी होते हैं। ऐसे नैटवर्क भी किसी जटिल संगठन की तरह काम करते हैं-उन्हें वित्त, लॉजिस्टिक्स, तकनीकी दक्षता और विश्वसनीयता चाहिए। डॉक्टर, इंजीनियर और प्रशासक ये सब प्रदान करते हैं। उनकी मौजूदगी नैटवर्क को क्षमता देती है और गंभीरता का संकेत भी। यही कारण है कि विभिन्न क्षेत्रों में चरमपंथी संगठन पेशेवरों की सक्रिय भर्ती करते रहे हैं।

संस्थागत कमजोरियां इस खतरे को बढ़ाती हैं। विश्वविद्यालय और पेशेवर निकाय सुरक्षा एजैंसियां नहीं हैं और उन्हें होना भी नहीं चाहिए लेकिन कमजोर प्रशासन, अपर्याप्त पृष्ठभूमि जांच और सीमित मार्गदर्शन ऐसे ब्लाइंडस्पॉट सृजित करते हैं, जिनका दुरुपयोग संभव है। जब संस्थान केवल डिग्री और परिणाम पर केंद्रित रहते हैं और नैतिकता, नागरिक जिम्मेदारी तथा छात्र-कल्याण को गौण मानते हैं, तो प्रारंभिक चेतावनी संकेत अनदेखे रह जाते हैं। राजनीतिक संदर्भ इस प्रक्रिया को पूरा करता है। जब लोगों को लगता है कि शिकायतों के समाधान, सहभागिता या सुधार के वैध रास्ते प्रभावी नहीं हैं, तो कुछ लोग, गलत निष्कर्ष पर पहुंचते हुए, ङ्क्षहसा को ही विकल्प मान लेते हैं। शिक्षा इस असंतोष को और तीखा कर सकती है क्योंकि वह यह भी दिखाती है कि व्यवस्था कैसी होनी चाहिए और यह भी कि वह कितनी बार वैसी नहीं होती।

वास्तव में, दीर्घकाल में शिक्षा ङ्क्षहसा के विरुद्ध सबसे मजबूत सुरक्षा कवच है, लेकिन शिक्षा अपने-आप में अधूरी है। ज्ञान के साथ नैतिक प्रशिक्षण, पेशेवर मार्गदर्शन और आगे बढऩे के विश्वसनीय अवसर भी आवश्यक हैं। पुलिसिंग से सीख : पुलिस के दृष्टिकोण से सबसे महत्वपूर्ण सबक यह है कि कट्टरपंथ अक्सर खुले टकराव से नहीं, बल्कि संस्थागत खाली जगहों से पनपता है। प्रारंभिक संकेत-अलगाव, अचानक वैचारिक कठोरता, सामाजिक विच्छेदन अपराध नहीं होते, लेकिन चेतावनी अवश्य होते हैं। सुरक्षा एजैंसियों, शैक्षणिक संस्थानों और पेशेवर निकायों के बीच सीमित, नियमबद्ध और गैर-दमनकारी संवाद की आवश्यकता है। समय रहते मार्गदर्शन और हस्तक्षेप होना चाहिए।

जो विश्वविद्यालय डॉक्टर, इंजीनियर और प्रशासक तैयार करते हैं, उन्हें स्वयं को केवल डिग्री देने वाली फैक्ट्रियां नहीं, बल्कि नागरिक संस्थान मानना होगा। अन्यथा जोखिम यह नहीं है कि बड़ी संख्या में लोग कट्टरपंथी बन जाएंगे, बल्कि यह है कि कुछ अत्यधिक कुशल लेकिन सामाजिक रूप से अलग-थलग व्यक्ति, ङ्क्षहसक विचारधाराओं को बुद्धि और दक्षता प्रदान कर देंगे। यह चुनौती केवल सुरक्षा एजैंसियों की नहीं, बल्कि संस्थानों, नीति-निर्माताओं और समाज सभी की है और इसे नजरअंदाज करना महंगा पड़ सकता है।-ओ.पी. सिंह
(पूर्व पुलिस महानिदेशक, हरियाणा)    

        

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