सिख धर्म का अभिन्न अंग ‘कृपाण’ विवादों में क्यों?

Edited By Updated: 24 Jun, 2026 07:04 AM

why is the kirpan an integral part of sikhism in controversy

पांच ककार एक सिख की धार्मिक पहचान के अभिन्न अंग हैं, जिनमें से कृपाण ऐतिहासिक रूप से दशमेश पिता श्री गुरु गोङ्क्षबद सिंह जी द्वारा हमें जुल्म का सामना करने के लिए बख्शी गई थी। शस्त्र नाम माला में गुरु साहिब ने धर्म की रक्षा के लिए उठाए गए सभी...

पांच ककार एक सिख की धार्मिक पहचान के अभिन्न अंग हैं, जिनमें से कृपाण ऐतिहासिक रूप से दशमेश पिता श्री गुरु गोङ्क्षबद सिंह जी द्वारा हमें जुल्म का सामना करने के लिए बख्शी गई थी। शस्त्र नाम माला में गुरु साहिब ने धर्म की रक्षा के लिए उठाए गए सभी शस्त्रों को अपने पीर का दर्जा देकर शस्त्रों को एक बहुत ही सत्कार योग्य स्थान दिया है। आधुनिक काल में सिख भाईचारे ने पूरी दुनिया में प्रवास किया और अपनी जड़ें पश्चिमी देशों में भी जमाईं। इस समय तक कृपाण हमारी मर्यादा के कारण एक पूर्ण सिख के मानो शरीर का ही एक अंग बन चुकी थी, इसलिए सभी पश्चिमी देशों में सिखों को धार्मिक आजादी के चलते कृपाण धारण करने का अधिकार मिला था और इस अधिकार के लिए सिखों को लंबे संघर्ष भी करने पड़े थे।

हाल ही में यू.के. में हुए एक हत्याकांड, जिसमें एक अमृतधारी सिख विक्रम दिगबा द्वारा एक किरच नुमा हथियार से वार करके हेनरी नोवैक को मौत के घाट उतार दिया गया और जब पुलिस मौके पर पहुंची तो हेनरी नोवैक पर नस्लीय हमला करने के झूठे आरोप लगा दिए गए, जिसके चलते जख्मी पड़े 18 साल के हेनरी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया लेकिन जख्मों की ताब न झेलते हुए हेनरी ने दम तोड़ दिया। इस घटना के बाद इंगलैंड और पूरी दुनिया में जहां पहले ही दक्षिणपंथी राजनीति के कारण आप्रवासी भाईचारे के खिलाफ नफरत और हिंसा उफान पर थी, वहीं इस घटना को कुछ दक्षिणपंथी राजनेताओं द्वारा एक बहाना बनाकर सिखों की धार्मिक आजादियां छीनने की मांग की जा रही है। 

इंगलैंड की रीस्टोर पार्टी के एम.पी. रूपर्ट लो ने तो कृपाण पर बैन लगाने तक की मांग कर दी। रूपर्ट लो के इन भेदभावपूर्ण बयानों को ‘एक्स’ के मालिक एलन मस्क ने रीट्वीट करके एक विश्वसनीयता दी, वहीं यह मामला अमरीका और यू.के. में राजनयिक तनाव का कारण भी बन गया क्योंकि अमरीका के उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस ने इस मामले को उभारकर अपनी आप्रवासी विरोधी नीतियों को जायज ठहराने का प्रयास किया। यू.के. का सिख भाईचारा इस मामले के इतना तूल पकड़ जाने के बाद चिंताओं में डूबा हुआ है कि उनके खिलाफ नफरत की लहर न उठ खड़ी हो। लेबर पार्टी के सांसद तनमनजीत सिंह ढेसी ने बार-बार यह दोहराया है कि इस आपसी झगड़े की एक घटना को लेकर समूचे भाईचारे के खिलाफ नफरत न फैलाई जाए लेकिन नफरत की राजनीति करने वाली और समाज के बीच ध्रुवीकरण करने वाली ताकतें इस मामले को सियासी तौर पर इस्तेमाल करने के लिए तत्पर हैं। 

अगर बात कनाडा की करें तो कनाडा एक ऐसा देश है जहां धार्मिक आजादी को चार्टर राइट्स के जरिए सुरक्षित किया गया है। कनाडा में कृपाण का मामला तब बहस में आया था, जब गुरबाज सिंह मुल्तानी नाम के एक विद्यार्थी के कृपाण धारण करने के अधिकार पर क्यूबेक के एक स्कूल बोर्ड ने रोक लगा दी थी। गुरबाज सिंह मुल्तानी इस फैसले के खिलाफ कनाडा की सुप्रीम कोर्ट में गया था, जहां अदालत ने फैसला गुरबाज सिंह मुल्तानी के हक में कर दिया और यह बात कही कि कृपाण धारण करना उसकी धार्मिक आजादी है लेकिन कृपाण के ऊपर जायज नियम सरकार लागू कर सकती है, जैसे कि कृपाण की लंबाई और यह कहा गया कि मुल्तानी कृपाण कपड़ों के अंदर ही धारण करेगा। इस तरह कनाडा में सिखों के धार्मिक अधिकार सुरक्षित हैं।

भारत के संविधान की धारा 25 (अनुच्छेद 25) सिखों को कृपाण पहनने और धारण करने दोनों की आजादी प्रत्यक्ष रूप में देती है। यहां विडंबना यह है कि उसी धारा 25 के खिलाफ सिखों की राजनीतिक पाॢटयों ने झंडा उठा रखा है और सिखों को धारा 25 के संबंध में भ्रम में डाला है। इन राजनीतिक लोगों ने हमेशा यह गलत प्रचार किया कि धारा 25 सिखों को हिंदू कहती है और सिख धर्म के अलग होने को मान्यता नहीं देती, जोकि सरासर गलत बयानी है, क्योंकि धारा 25 में ङ्क्षहदू, सिख, जैन और बौद्ध धर्म को सिर्फ एक विशेष संदर्भ के लिए ही ङ्क्षहदू की परिभाषा में रखा गया है और वह विशेष संदर्भ है धार्मिक स्थानों पर जात-पात खत्म करना और धार्मिक स्थानों को हर जाति के व्यक्ति के लिए खोलना।

यहां एक बड़ा सवाल यह भी उठता है कि कभी गौ-गरीब की रक्षा के लिए कृपाण को एक पवित्र हथियार के रूप में मान्यता मिलती थी, उसके बारे में तेजी से बदल रही जनभावना का आखिर कारण क्या है? हम जिस तरह आपसी झगड़ों और गोलक के विवाद पर कृपाणें लहराकर हुड़दंग मचाते हैं, उसने स्थानीय भाईचारे में इस पवित्र ककार को डर का प्रतीक बना दिया है। वह भी समय था जब किसी बस या पूरी रेलगाड़ी में यदि एक भी सिख सवारी मौजूद होती थी तो हर कोई अपने आप को सुरक्षित महसूस करता था लेकिन आज हमने अपनी हरकतों के कारण इस विशिष्ट रूप को तिरस्कार का पात्र बना दिया है। हम सिर जोड़कर क्यों नहीं सोचते कि जब दुनिया भर के समाज-विरोधी कार्य, चाहे वह लूट-खसोट हो, नशे की तस्करी या चोरी की वारदातें, उनमें हमारे ही भाइयों की तस्वीरें दस्तार और गातरे समेत क्यों छपती हैं?

इस सारे विवाद में आज ‘सरबत के भले’ के दर्शन के मुताबिक देश-विदेश में बसी सिख संगत को एकत्रित होकर अपने धार्मिक चिन्हों की आजादी को बरकरार रखने के लिए शांतिपूर्ण ढंग के साथ अपना पक्ष रखना चाहिए और हर भाईचारे को सिखों के समाज निर्माण में योगदान और धार्मिक आस्था के बारे में जानकारी देनी चाहिए।-मनिंदर सिंह गिल (मैनेजिंग डायरैक्टर, रेडियो इंडिया, सरे, कनाडा)

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