Edited By jyoti choudhary,Updated: 23 Apr, 2026 06:00 PM

भारतीय कृषि क्षेत्र इस समय एक दोहरी चुनौती के मुहाने पर खड़ा है। एक तरफ प्रकृति 'अल नीनो' के रूप में कमजोर मानसून का संकेत दे रही है, तो दूसरी तरफ वैश्विक भू-राजनीति ने उर्वरकों की कीमतों में आग लगा दी है। हाल ही में इंडियन पोटाश लिमिटेड
बिजनेस डेस्कः भारतीय कृषि क्षेत्र इस समय एक दोहरी चुनौती के मुहाने पर खड़ा है। एक तरफ प्रकृति 'अल नीनो' के रूप में कमजोर मानसून का संकेत दे रही है, तो दूसरी तरफ वैश्विक भू-राजनीति ने उर्वरकों की कीमतों में आग लगा दी है। हाल ही में इंडियन पोटाश लिमिटेड (आई.पी.एल.) द्वारा जारी निविदा के परिणाम चौंकाने वाले हैं। मात्र 2 महीने के भीतर यूरिया की कीमतों का लगभग दोगुना होना केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर देश की खाद्य सुरक्षा और आम आदमी की थाली पर पड़ने वाले बोझ का संकेत है।
मामले से जुड़े जानकारों का कहना है कि कीमतों के दोगुने होने का मतलब है कि उर्वरक सबसिडी बिल अब 2 लाख करोड़ रुपए को पार कर सकता है। यह सरकार के बजटीय घाटे को प्रभावित करेगा और अंततः विकास कार्यों के लिए उपलब्ध धन में कमी ला सकता है।
क्या है कीमतों का गणित
एक रिपोर्ट के मुताबिक फरवरी 2026 में राष्ट्रीय कैमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स (आर.सी.एफ.) ने जब निविदा जारी की थी, तब पश्चिमी तट के लिए यूरिया की कीमत 508 डॉलर प्रति टन थी, लेकिन अप्रैल में आई.पी.एल. की निविदा में यह बढ़कर 935 डॉलर हो गई। यह 84 फीसदी की वृद्धि वैश्विक बाजार में आए 'सप्लाई शॉक' का सीधा परिणाम है। इतना ही नहीं डि-अमोनियम फॉस्फेट (डी.ए.पी.) और अन्य कच्चे माल जैसे सल्फर तथा अमोनिया की कीमतों में भी भारी उछाल देखा गया है। सल्फर जो पिछले साल 300 डॉलर पर था, आज 900 डॉलर के नीचे उपलब्ध नहीं है।
होर्मुज जलडमरूमध्य है पूरे संकट की जड़
इस संकट की जड़ में मध्य पूर्व का संघर्ष है। 28 फरवरी से होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से वैश्विक आपूर्ति शृंखला पूरी तरह चरमरा गई है। भारत अपने यूरिया का 40 प्रतिशत और यूरिया बनाने के लिए आवश्यक ईंधन द्रवीकृत प्राकृतिक गैस (एल.एन.जी.) का 60 फीसदी हिस्सा खाड़ी देशों से प्राप्त करता है।
कतर और सऊदी अरब जैसे देशों में उत्पादन केंद्रों पर हमलों तथा समुद्री मार्ग बाधित होने से आपूर्ति ठप्प हो गई है। इसका नतीजा यह हुआ कि भारत को अब ऊंचे दामों पर इंडोनेशिया, मलेशिया, मोरक्को और जॉर्डन जैसे वैकल्पिक स्रोतों की ओर रुख करना पड़ रहा है।
घरेलू उत्पादन पर चोट और 'खरीफ' की चिंता
भारत सालाना लगभग 400 लाख टन यूरिया की खपत करता है। इसमें से 75 फीसदी उत्पादन घरेलू स्तर पर होता है, लेकिन घरेलू कारखाने भी द्रवीकृत प्राकृतिक गैस पर निर्भर हैं। मार्च और अप्रैल में गैस की कमी के कारण घरेलू उत्पादन में 10 लाख टन प्रति माह की गिरावट दर्ज की गई है।
आगामी खरीफ सीजन (जून-जुलाई) के लिए कृषि मंत्रालय ने 194 लाख टन यूरिया की आवश्यकता बताई है, जबकि वर्तमान स्टॉक केवल 55 लाख टन है। यद्यपि सरकार ने 25 लाख टन आयात सुरक्षित कर लिया है, लेकिन आपूर्ति में देरी और ऊंची लागत एक बड़ा सिरदर्द बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि खरीफ की फसल तो किसी तरह निकल जाएगी, लेकिन असली संकट अक्तूबर-दिसंबर के रबी सीजन में दिखेगा।
विशेषज्ञों ने सुझाए हैं कुछ समाधान
उत्तर प्रदेश के निर्माताओं ने सुझाव दिया है कि यूरिया और डी.ए.पी. को जिंक, बोरॉन और सल्फर जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों के साथ कोट किया जाए। इससे उर्वरक की दक्षता बढ़ेगी और किसानों को अलग से महंगे पोषक तत्व नहीं खरीदने पड़ेंगे। बायोप्राइम एग्रीसॉल्यूशंस जैसी कंपनियां सूक्ष्म जीवों से आधारित ऐसे उत्पाद विकसित कर रही हैं जो मिट्टी में फंसे हुए पोषक तत्वों को पौधों तक पहुंचाने में मदद करते हैं। इससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम हो सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते आपूर्ति शृंखला और लागत प्रबंधन नहीं किया गया, तो खाद्य मुद्रास्फीति देश की अर्थव्यवस्था को पटरी से उतार सकती है। अंततः इस संकट का सबसे अधिक प्रभाव छोटे और सीमांत किसानों पर पड़ेगा, जिनकी आजीविका पूरी तरह से फसल की लागत और उत्पादन पर निर्भर है।