हकीकत या फसाना: मानवीय प्रकाश है आभामंडल

Edited By Jyoti,Updated: 11 Aug, 2021 02:04 PM

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सूर्य व चंद्रमा के चारों ओर एक  प्रकाशीय वृत प्रतीत होता है। वह प्रकाश चक्र सूर्य व चंद्रमा का आभामंडल कहलाता है। जिसे तेज पुंज, कांति, चमक, आभा अथवा नूर भी कहते हैं। ठीक उसी प्रकार प्रत्येक सजीव

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सूर्य व चंद्रमा के चारों ओर एक  प्रकाशीय वृत प्रतीत होता है। वह प्रकाश चक्र सूर्य व चंद्रमा का आभामंडल कहलाता है। जिसे तेज पुंज, कांति, चमक, आभा अथवा नूर भी कहते हैं। ठीक उसी प्रकार प्रत्येक सजीव प्राणी का भी एक आभा मंडल तथा निष्प्रभ मंडल होता है।

मनुष्य के शरीर में (1) मूलाधार चक्र, (2) स्वाधिष्ठान चक्र, (3) मणिपुर चक्र, (4) अनाहत चक्र, (5) विशुद्ध चक्र, (6) आज्ञा चक्र तथा (7) सहस्त्र चक्र आदिसात चक्र होते हैं, जिनसे आभामंडल बनता है। आभा मंडल का निर्माण मानसिक, शारीरिक व भावनात्मक शृंखलाओं के योग से होता है।  

मानव शरीर में लगभग साढ़े तीन करोड़ रोम छिद्र होते हैं। इन सातों चक्रों से उत्पन्न हुई ऊर्जा शरीर के सभी रोम छिद्रों के माध्यम से शरीर से बाहर प्रकट होकर 2 से 3 फुट तक की दूरी में इंद्रधनुष के रंगों जैसे अदृश्य ऊर्जा वृत्त का निर्माण करती है, जिसे व्यक्ति का ऊर्जा मंडल कहते हैं। मनुष्य के सातों चक्रों से सकारात्मक ऊर्जा प्रकट होती है तो वह उक्त व्यक्ति का आभामंडल कहलाता है। यदि सातों चक्रों से नकारात्मक ऊर्जा प्रकट होती है तो वह निष्प्रभ मंडल कहलाता है।

मूलाधार चक्र की सुदृढ़ता से ही सकारात्मक ऊर्जा की उत्पत्ति होती है। स्वाधिष्ठान चक्र का असंतुलित होना सीधा मनुष्य के आचरण व्यवहार तथा नस्ल को प्रभावित करता है। मणिपुर चक्र के असामान्य होने पर मानसिक तनाव इत्यादि पैदा होते हैं। अनाहत चक्र के असंतुलित होने पर छाती से संबंधित रोग घेर लेते हैं। विशुद्ध चक्र का संबंध कंठ से होता है। आज्ञा चक्र को नियंत्रित करके सभी चक्रों को नियंत्रित किया जा सकता है। सहस्त्र चक्र संतुलित होने वाला मनुष्य  प्रचंड आभा का स्वामी होता है। शरीर के दो रूप होते हैं - 1. स्थूल शरीर 2. सूक्ष्म शरीर।

स्थूल शरीर अर्थात बाहरी शरीर के द्वारा सभी संसारिक कार्यों को रूप प्रदान किया जाता है। इसे भौतिक शरीर भी कहते हैं। सूक्ष्म शरीर अर्थात प्राणशक्ति, जो संपूर्ण शरीर की सूक्ष्म अति सूक्ष्म नाडिय़ों में वायु प्रवाह का नियंत्रण करके ऊर्जा प्रदान करता है तथा शरीर को क्रियाशील रखता है। सूक्ष्म व स्थूल शरीर के सुंदर समन्वय से ही मनुष्य की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

प्रत्येक सजीव प्राणी का आभामंडल अथवा निष्प्रभ मंडल अपने संपर्क में आने वाले सभी प्राणियों को प्रभावित करता है। यह आभामंडल शरीर के चारों ओर वृत्ताकार किरणों के रूप में चक्रनुमा उत्सर्जित होता है।
 
शास्त्रों के अनुरूप एक साधारण व्यक्ति का आभामंडल 2 से 3 फुट तक होता है तो महापुरुषों व संतों का आभामंडल 30 से 60 मीटर तक का होता है , जो साधना, तप, ध्यान इत्यादि पर निर्भर करता है तथा इनके घटने और बढ़ने पर आभामंडल भी घटता और बढ़ता है। इसे आध्यात्मिक ऊर्जा मंडल भी कहते हैं।

आभामंडल को निस्तेज करने वाले तत्व काम, क्रोध, मोह, अहंकार, मद और दुव्र्यसन आदि हैं।  इनकी अधिकता से शरीर में नकारात्मक ऊर्जा पैदा होती है तथा शरीर में आभामंडल निष्प्रभ मंडल में बदल जाता है।

आभा मंडल की ऊर्जा का संबंध मनुष्य के कर्मों से है। सकारात्मक वातावरण, सत्संग,हवन, मंत्रोच्चारण, ध्यान, भजन और धार्मिक स्थानों के सान्निध्य में मनुष्य का आभामंडल विस्तृत होता है। इसके विपरीत नकारात्मक संग आभामंडल को घटाता है। अत: यह विशेष ध्यान देना चाहिए कि हम अपना समय कैसी संगत में बिताते हैं और हम कैसे लोगों के संबंध में अधिक रहते हैं।

सनातन धर्म में बहुत विस्तार से यह बताया गया है कि सनातन धर्म में प्रकृति को पूजनीय क्यों कहा गया है। सनातन धर्म के अनुसार  विशेष वनस्पति पूजनीय कही गई है जैसे कि पीपल, तुलसी, वटवृक्ष, पुष्पों में कमल, गुलाब, कनेर, सफेद आक आदि।

जीव-जंतुओं में  गौमाता को अति पूजनीय कहा गया है जिसमें 33 कोटि अर्थात 33 प्रकार के देवताओं का वास कहा गया है। केवल मात्र गाय ही नहीं अपितु गौ का दूध, गौ दुग्ध, गौ घृत  का भी महत्व कहा गया है। इस का मुख्य कारण आभामंडल ही है। मनुष्यों ,जीव-जंतुओं आदि का आभामंडल भिन्न-भिन्न होता है।

कुछ शास्त्र प्रमाणों के माध्यम से समझाते हैं कि किस वनस्पति अथवा जीव-जंतुओं का आभामंडल कितनी दूरी तक होता है तथा सनातन धर्म में पूजा पद्धति में उनका क्या महत्व है।

पीपल वृक्ष का आभामंडल 3.5 मीटर, तुलसी वृक्ष-6.11 मीटर, वट-10.1 मीटर, कदम-8.4 मीटर, नीम-5.5 मीटर, आम-3.5 मीटर, नारियल-10.5 मीटर, कमल पुष्प-6.8 मीटर, गुलाब पुष्प-5.7 मीटर, सफेद आक-15 मीटर, गाय-16 मीटर, गाय घृत-14 मीटर, गाय दुग्ध-13 मीटर और गाय दधि 6.9 मीटर होता है।

इस प्रकार प्रकृति में सभी मनुष्यों, जीव-जंतुओं, वनस्पतियों व पदार्थों का अपना-अपना आभामंडल होता है। सनातन धर्म में हवन यज्ञ, शालीग्राम व शिव अभिषेक इत्यादि में भिन्न-भिन्न पदार्थों को इसी कारण उपयोग किया जाता है कि उन पदार्थों के विशेष आभामंडल के संपर्क में आने से मनुष्य तथा वातावरण में सकारात्मक आभामंडल का विस्तार होता है। हवन में आम की लकड़ी, गौ घृत, जौ, तिल आदि की आहूति देने से वातावरण में विस्तृत आभामंडल बनता है। जो जीव उसके सान्निध्य में होंगे उनका भी आभा वृत् बढ़ता है।

अपनी नित्य दिनचर्या में यदि हम ध्यान दें तो महसूस करेंगे कि हमें कुछ विशेष लोगों को सोचने, देखने उनसे बात करने अथवा उनके सान्निध्य में बहुत अच्छा लगता है तथा उत्साह आनंद एवं ज्ञान में सकारात्मक वृद्धि का एहसास होता है। यह उक्त व्यक्ति के आभा मंडल का ही प्रभाव होता है। इसके विपरीत कुछ लोगों के विचार मात्र से ही मन खिन्न हो जाता है और नीरसता का अनुभव होता है। यह उस व्यक्ति के निष्प्रभ मंडल के कारण होता है।

आभा मंडल को अत्यधिक विस्तृत करने के लिए अर्थात आभा वृत्त का आकार बढ़ाने के लिए मनुष्य को अपने शरीर में विद्यमान इन सातों चक्रों को ध्यान योग  के द्वारा केंद्रित करके संतुलित रखना चाहिए।

बात करते हैं कि घर, दफ्तर और स्वयं के आभामंडल को कैसे बढ़ाएं; किसी व्यक्ति विशेष का आभा मण्डल ही उसको प्रभावशाली बनाता है। सात्विक कर्मों, वाणी, खान-पान व सान्निध्य का विशेष ध्यान रखना चाहिए।  सदैव सकारात्मकता प्रदान करने वाले व्यक्तित्व को बढ़ावा दें। ओजस्वी, तेजस्वी व बुद्धिमान लोगों के संपर्क में समय व्यतीत करें।

घर-दफ्तर में पेड़-पौधों का रोपण करें। प्रकाश की व्यवस्था सुचारू करें, स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें, घरों में हवन, मंत्रोच्चारण, दीप प्रकाश, शंख नाद आदि करते रहें। पांच तत्वों जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी तथा आकाश की शुद्धि का सदैव ध्यान दिया जाना चाहिए, इनसे संबंधित प्रदूषण करने से बचना चाहिए।

विशेषकर आत्ममंथन, आत्मनिरीक्षण, आत्म आकलन व अंतर्मुखी होने से ही अंतर्मन में आनंद का झरना फूटता है। स्वयं में स्वयं की खोज करने तथा शोध करने से ही आभा मण्डल सूर्य की भांति उदीप्तमान होगा।
  

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