Edited By Niyati Bhandari,Updated: 22 Jul, 2026 07:02 AM

Devshayani Ekadashi Vrat Katha देवशयनी एकादशी व्रत कथा: 25 जुलाई को आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी है। जिसे हरिशयनी, विष्णुशयनी, पदमा एवं शयन एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस व्रत के प्रभाव से लोक में भोग और परलोक में मुक्ति प्राप्त...
Devshayani Ekadashi 2026: हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व है, लेकिन आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आज ही के दिन से भगवान विष्णु चार महीनों के लिए योग निद्रा में चले जाते हैं, जिसे 'चातुर्मास' कहा जाता है। इस दौरान मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाता है और भक्त तप व साधना में लीन हो जाते हैं।

25 जुलाई को आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी है। जिसे हरिशयनी, विष्णुशयनी, पदमा एवं शयन एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस व्रत के प्रभाव से लोक में भोग और परलोक में मुक्ति प्राप्त होती है। अगर आप व्रत नहीं कर सकते तो इस व्रत कथा को अवश्य पढ़ें या सुनें। इससे आपके जीवन के समस्त पापों का नाश होगा।
Devshayani Ekadashi Vrat Katha देवशयनी एकादशी व्रत कथा
सत्युग में मान्धाता नाम के एक सत्यवादी एवं महान प्रतापी सूर्यवंशी राजा हुए हैं। जो अपनी प्रतिज्ञा के पक्के थे और अपनी प्रजा का पालन अपनी संतान की भांति किया करते थे। उनके राज्य में सभी लोग सुखी एवं खुशहाल थे। राजा वैदिक धर्म का आचरण पूरी निष्ठा के साथ करते थे। अत: उनके राज्य में अकाल, महामारी, सूखा, भूकम्प और अति वर्षा जैसे दैविक प्रकोप से कभी भी प्रजा पीड़ित नहीं हुई थी। उनकी प्रजा के भीतर किसी भी तरह का कोई भय एवं चिंता नहीं थी।
एक बार 3 साल तक वर्षा न होने के कारण फसल नहीं हुई और राज्य में सूखे की वजह से अकाल पड़ गया। धर्म-कर्म और यज्ञादि कार्यों पर विराम लग गया। लोग अन्न और जल के अभाव में कष्ट सहने लगे।

भूखमरी से दुखी होकर प्रजा राजा मान्धाता के पास गई और उनसे प्रार्थना की कोई ऐसा उपाय करें ताकि वर्षा होने लगे और फसलें पैदा हो। जिससे वह अपने परिवार का पालन-पोषन भले प्रकार से कर सकें। प्रजा के दुख से दुखी होकर राजा सेना को साथ लेकर वन की तरफ चल पड़ा। वर्षा न होने के कारण का पता लगाने की इच्छा से वह अनेक ऋषियों के पास गया तथा अंत में ब्रह्मा जी के पुत्र अंगिरा ऋषि से मिला। राजा ने ऋषि अंगिरा को अपने राज्य में वर्षा न होने के बारे में बताते हुए तुरंत वर्षा होने का उपाय पूछा।
ऋषि अंगिरा ने राजा को आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पदमा यानि हरिशयनी एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करने के लिए कहा। राजा ने अपने राज्य में आकर सारी प्रजा को सच्चे भाव से देवशयनी एकादशी का व्रत करने के लिए बोला। राजा की बात मानकर सभी ने धार्मिक परम्पराओं का पालन करते हुए व्रत किया, जिसके प्रभाव से खूब वर्षा हुई और सूखी धरती सिंचित हो गई। जिससे खूब अन्न पैदा हुआ और सारी प्रजा सुखी हो गई।
देवशयनी एकादशी व्रत के दिन यह कथा पढ़ने, सुनने और सुनाने वाले सभी जीवों पर श्री हरि विष्णु की अपार कृपा सदा बनी रहती है।
