Kokila Vrat 2026: आखिर माता सती को क्यों लेना पड़ा कोयल का रूप? जानें, सावन पूर्णिमा पर इस व्रत का महत्व और पौराणिक कथा

Edited By Updated: 18 Jul, 2026 01:56 PM

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Kokila Vrat 2026: जानें, कोकिला व्रत 2026 की तिथि और पौराणिक कथा। क्यों भगवान शिव ने माता सती को दिया था कोयल बनने का श्राप? पढ़ें पूरी जानकारी।

Kokila Vrat 2026: सनातन धर्म में सावन का महीना शिव और शक्ति की उपासना के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है। इसी महीने की पूर्णिमा तिथि को कोकिला व्रत रखा जाता है, जो इस वर्ष 28 अगस्त 2026 को मनाया जाएगा। यह व्रत विशेष रूप से माता पार्वती के 'कोकिला' (कोयल) स्वरूप को समर्पित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सुहागिन महिलाएं अपने अखंड सौभाग्य और कुंवारी कन्याएं मनचाहा वर पाने के लिए यह कठिन तप और व्रत करती हैं। इस व्रत में आदिशक्ति के स्वरूप रूप कोयल की पूजा का विधान है। 

Kokila Vrat

Kokila Vrat puja vidhi 2026 कोकिला व्रत पूजा विधि 
प्रात: स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
व्रत का संकल्प लें।
कोयल (कोकिला) की प्रतिमा या चित्र बनाकर पूजा करें।
धूप, दीप, अक्षत, पुष्प, रोली, चावल से पूजा करें।
कोकिला व्रत कथा का श्रवण करें या पढ़ें।
दिन भर उपवास करें और संध्या समय चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत पूर्ण करें।
अधिकतर स्त्रियां इस दिन निर्जल उपवास रखती हैं या केवल फलाहार करती हैं। कुछ लोग व्रत कथा पढ़ने के बाद सात्विक भोजन करते हैं।

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Kokila Vrat katha कोकिला व्रत कथा: कोकिला पक्षी के रूप में देवी पार्वती की कथा इस व्रत से जुड़ी है। एक दंतकथा के अनुसार इस व्रत की शुरुआत माता पार्वती ने की थी और उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए यह व्रत रखा था। ऐसी मान्यता भी है कि मां पार्वती अपने जन्म को लेने से पहले करीब 10 हजार सालों तक कोयल बनकर नंदन वन में भटकती रही थी और इस दौरान उन्होंने वन में ही शिव की आराधना की थी। जिसके बाद उनका जन्म पर्वतराज हिमालय के घर हुआ।

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क्यों कहलाती हैं भगवान शिव की अर्धांगिनी 'कोकिला'?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, कोकिला व्रत का सीधा संबंध माता सती के त्याग और भगवान शिव के एक श्राप से जुड़ा है। कहा जाता है कि एक बार माता सती ने महादेव की आज्ञा के विरुद्ध जाकर अपने पिता राजा दक्ष के यज्ञ में भाग लिया था। वहां महादेव का अपमान सहने में असमर्थ होकर उन्होंने यज्ञकुंड की अग्नि में स्वयं को भस्म कर लिया। महादेव ने सती को उनकी अवज्ञा के कारण हजारों वर्षों तक कोयल बनकर जीने का श्राप दिया था। इसी श्राप के कारण देवी सती ने लंबे समय तक नंदन वन में कोयल के रूप में रहकर कठिन तपस्या की। बाद में उन्होंने माता पार्वती के रूप में जन्म लिया और पुन: भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त किया। माता सती के इसी तप की याद में कोकिला व्रत रखा जाता है।

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