Edited By Niyati Bhandari,Updated: 17 Jul, 2026 03:47 PM

Chaturmas story: साल 2026 में 25 जुलाई से चातुर्मास शुरू हो रहा है। जानिए, राजा बलि और वामन अवतार की वह अमर कथा जिसके कारण भगवान विष्णु को पाताल लोक जाना पड़ता है।
Chaturmas katha: सनातन धर्म में चातुर्मास का विशेष महत्व है। साल 2026 में 25 जुलाई से चातुर्मास का आरंभ होने जा रहा है, जो 20 नवंबर 2026 तक चलेगा। इन चार महीनों के दौरान जगत के पालनहार भगवान श्री हरि विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और उनका निवास स्थान क्षीर सागर न होकर पाताल लोक होता है। इसी कारण इस अवधि में विवाह, मुंडन और गृह प्रवेश जैसे सभी मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है।लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर सृष्टि के स्वामी को अपना बैकुंठ धाम छोड़कर पाताल लोक में क्यों रहना पड़ता है? इसके पीछे छिपी है भक्त और भगवान की एक अटूट कथा।
Raja bali katha: एक समय की बात है- युद्ध में इन्द्र से हारकर दैत्यराज बलि गुरु शुक्राचार्य की शरण में गए। कुछ समय बाद गुरु कृपा से बलि ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। बलि अपार शक्तियों का स्वामी और साथ ही धर्मात्मा था। दान-पुण्य करने में वह कभी पीछे नहीं रहता था परंतु उसकी सबसे बड़ी खामी थी कि उसे अपनी शक्तियों पर घमंड था और वह खुद को ईश्वर के समकक्ष मानता था। वह देवताओं का घोर विरोधी भी था।
प्रभु की महिमा कितनी विचित्र है कि कल के देवराज इन्द्र आज भिखारी हो गए। वह दर-दर भटकने लगे। अंत में अपनी माता अदिति की शरण में गए। इन्द्र की दशा देखकर मां का हृदय फटने लगा। अपने पुत्र के दुख से दुखी अदिति ने अत्यंत कठिन व्रत रखा। व्रत के अंतिम दिन भगवान ने प्रकट होकर अदिति से कहा, ‘‘देवी! चिन्ता मत करो। मैं तुम्हारे पुत्र रूप में जन्म लूंगा। इन्द्र का छोटा भाई बनकर उनका कल्याण करूंगा।’’ यह कहकर वे अंतर्ध्यान हो गए।

आखिर वह शुभ घड़ी आ ही गई। अदिति के गर्भ से भगवान ने वामन के रूप में अवतार लिया। भगवान को पुत्र रूप में पाकर अदिति की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। भगवान को वामन ब्रह्मचारी के रूप में देखकर देवताओं और महर्षियों को बड़ा आनंद हुआ। उन लोगों ने कश्यप को आगे करके भगवान का उपनयन आदि संस्कार करवाया।
उसी समय भगवान ने सुना कि राजा बलि भृगुकच्छ नामक स्थान पर अश्वमेध यज्ञ कर रहे हैं। उन्होंने वहां के लिए यात्रा की। भगवान वामन कमर में मूंजकी मेखला और यज्ञोपवीत धारण किए हुए थे। बगल में मृगचर्म था। सिर पर जटा थी। इसी प्रकार बौने ब्राह्मण के वेष में अपनी माया से ब्रह्मचारी बने हुए भगवान ने बलि के यज्ञ मंडल में प्रवेश किया। उन्हें देखकर बलि का हृदय गद्गद हो गया। उन्होंने भगवान को एक उत्तम आसन दिया। बलि ने नाना प्रकार से भगवान वामन की पूजा की।
उसके बाद बलि ने प्रभु से कुछ मांगने का अनुरोध किया। उन्होंने तीन पग भूमि मांगी। शुक्राचार्य प्रभु की लीला समझ रहे थे। उन्होंने दान देने से बलि को मना किया। बलि नहीं माना। उसने संकल्प लेने के लिए जल पात्र उठाया। शुक्राचार्य अपने शिष्य का हित सोचकर पात्र में प्रवेश कर गए। जल गिरने का स्तर रुक गया। भगवान ने एक कुश उठाकर पात्र के छेद में डाल दिया। उनकी एक आंख फूट गई। बलि का संकल्प पूरा होते ही भगवान वामन ने एक पग में पृथ्वी और दूसरे में स्वर्ग नाप लिया। तीसरे पग में बलि ने अपने आपको ही सौंप दिया।

बलि के इस समर्पण भाव से भगवान प्रसन्न हुए। उन्होंने उसे सुतल लोक (पाताल का एक हिस्सा) का राज्य दे दिया। बलि ने भगवान को अपने अतिथि के रूप में साथ चलने को कहा जिससे वह मना नहीं कर सके।
जब लंबे समय तक विष्णु जी अपने धाम नहीं लौटे तो लक्ष्मी जी को चिंता होने लगी। तब नारद मुनी ने उन्हें राजा बलि को अपना भाई बनाने की सलाह दी और उनसे उपहार में विष्णु जी को मांगने को कहा। मां लक्ष्मी ने ऐसा ही किया और इस संबंध को प्रगाढ़ बनाते हुए उन्होंने राजा बलि के हाथ पर राखी या रक्षा सूत्र बांधा।
राजा बलि अपने वचन से बंधे थे, लेकिन वह भगवान को जाने भी नहीं देना चाहते थे। तब भगवान नारायण ने बीच का रास्ता निकाला। उन्होंने बलि को वरदान दिया कि वे हर साल आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) से कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी) तक पाताल लोक में ही निवास करेंगे।
