Edited By Niyati Bhandari,Updated: 01 Sep, 2026 04:15 PM
Har Chhath (Lalhi Chhath) Vrat Katha 2026: अपनी संतानों के सुखी जीवन के लिए महिलाएं रखती हैं हरछठ का पावन व्रत। जानिए इस व्रत की वह पौराणिक कथा, जिसमें एक झूठ के कारण ग्वालिन को मिला गंभीर दंड और फिर हुआ बड़ा चमत्कार।
Har Chhath (Lalhi Chhath) Vrat Katha 2026: भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को बलराम जयंती का पर्व मनाया जाता है। जो भगवान श्रीकृष्ण के दाऊ भईया का जन्मोत्सव होता है। बलराम जयंती के शुभ दिन को हलष्ठी, हलछठ, ललई छठ चंदन छठ, तिनछठी, तिन्नी छठ, ललही छठ, कमर छठ खमर छठ या हरछठ के नाम से भी जाना जाता है। श्री कृष्ण के जन्म से दो दिन पहले भाद्रपद के कृष्णपक्ष की षष्ठी को उनके भाई बलराम जी का जन्म हुआ था। बलराम का शास्त्र हल व मसूल हैं, जिस कारण उन्हें हलधर भी कहा जाता है। वैसे तो इस रोज किसी को भी खेत में उगे हुए या हल से जोत कर उगाए गए अनाज और सब्जियों नहीं खाने चाहिए लेकिन व्रतधारियों पर ये नियम खास तौर पर लागू होता है।
हलषष्ठी का व्रत विशेषकर पुत्रवती महिलाएं करती हैं। जिससे उनके पुत्र की आयु लंबी होती है और और सुख-सम्पन्नता में वृद्धि होती है। इस दिन हल की पूजा का विशेष महत्व है। चूंकि भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम का अस्त्र हल था जिस कारण महिलाएं इस दिन हल का पूजन करती हैं। महिलाएं अपने पुत्र की सलामती के लिए निर्जल व्रत रखती हैं और ये कथा सुनती हैं। इस पौराणिक कथा के बिना अधूरी मानी जाती है पूजा।
हरछठ व्रत कथा
प्राचीन काल की बात है, एक गांव में एक ग्वालिन रहती थी, जो दूध, दही और मक्खन बेचकर अपना जीवन-यापन करती थी। वह गर्भवती थी और उसका प्रसवकाल अत्यंत निकट था। इसके बावजूद, उसका मन केवल अपने व्यापार में लगा हुआ था। उसे चिंता थी कि यदि उसके बच्चे का जन्म हो गया, तो उसका दूध और दही बिकने से रह जाएगा और उसका नुकसान हो जाएगा। इसी लालच के वश में होकर वह सिर पर दही और मक्खन की मटकी रखकर बेचने निकल पड़ी। मार्ग में जाते समय उसे अचानक असहनीय प्रसव-पीड़ा होने लगी। कोई रास्ता न देख, वह पास ही मौजूद झरबेरी की झाड़ियों की ओट में बैठ गई और वहां उसने एक अत्यंत सुंदर बालक को जन्म दिया। लेकिन लालच की पट्टी उसकी आंखों पर बंधी हुई थी। उसने अपने नवजात शिशु को एक कपड़े में लपेटकर वहीं झाड़ियों के पास लिटा दिया और खुद दूध बेचने गांव की ओर चली गई।
जब ग्वालिन गांव में दूध बेचने पहुंची, उस दिन पूरे गांव में महिलाओं का हरछठ (ललही छठ) का व्रत था। इस व्रत के नियम के अनुसार, व्रती महिलाएं केवल भैंस के दूध और दही का ही सेवन कर सकती हैं, गाय के दूध का सेवन इसमें पूरी तरह वर्जित होता है। ग्वालिन के पास जो दूध और दही था, वह गाय और भैंस दोनों का मिश्रित था। किंतु अधिक मुनाफा कमाने के लालच में उसने सभी व्रती महिलाओं से झूठ बोल दिया कि उसके पास केवल भैंस का ही शुद्ध दूध-दही है। ग्वालिन के इस झूठ पर विश्वास करके सभी महिलाओं ने वह दूध खरीद लिया और देखते ही देखते उसका सारा सामान बिक गया, जिससे वह बहुत प्रसन्न हुई।
उधर, जहां ग्वालिन अपने नवजात शिशु को अकेला छोड़ आई थी, उसी के समीप एक किसान हल चला रहा था। अचानक उसके बैल अनियंत्रित हो गए और तेजी से भागते हुए खेत की मेड़ पर चढ़ गए। इस भगदड़ में हल का एक हिस्सा झाड़ी में सो रहे ग्वालिन के शिशु से जा टकराया, जिससे उस मासूम का पेट फट गया। शिशु के रोने की आवाज सुनकर जब किसान वहां पहुंचा, तो खून से लथपथ बालक को देख उसके हाथ-पांव फूल गए। भय और असमंजस की स्थिति में किसान ने वहीं पास खड़ी झरबेरी के कांटों से ही शिशु के फटे पेट पर टांके लगा दिए और डर के मारे उसे वहीं छोड़कर भाग गया।

जब ग्वालिन अपना व्यापार समाप्त कर वापस लौटी, तो अपने कलेजे के टुकड़े को मृत अवस्था में देखकर उसका हृदय कांप उठा। वह फूट-फूटकर रोने लगी। रोते-रोते उसे अपनी भूल और पाप का अहसास हुआ। उसने मन में विचार किया कि यह भयंकर दुख उसे हरछठ का व्रत रखने वाली पवित्र महिलाओं से बोले गए झूठ और धोखे के कारण मिला है। ग्वालिन ने तुरंत निर्णय लिया कि वह अपनी इस अक्षम्य गलती को नहीं छुपाएगी। वह उसी क्षण वापस गांव की गलियों में पहुंची और विलाप करते हुए चिल्ला-चिल्लाकर अपनी गलती स्वीकार करने लगी। उसने पूरे गांव के सामने रोते हुए कहा, "मैंने आज जो दूध और दही बेचा, उसमें गाय का दूध मिला हुआ था। मैंने आपसे झूठ बोला और आपका व्रत भंग किया। मेरे इसी पाप के कारण भगवान ने मुझसे मेरी संतान छीन ली। मुझे क्षमा करें।"
ग्वालिन के इस सच्चे और हृदयविदारक विलाप को सुनकर व्रती महिलाओं का दिल पिघल गया। उसकी सत्यनिष्ठा और गहरे प्रायश्चित को देखकर सभी महिलाओं ने उसे हृदय से क्षमा कर दिया और उसे आशीर्वाद प्रदान किया। सभी से क्षमा-याचना करने के बाद जब ग्वालिन वापस उस झरबेरी की झाड़ी के पास पहुंची, तो वहां का दृश्य देखकर उसकी आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे। उसका पुत्र वहां पूरी तरह जीवित, स्वस्थ और सकुशल खेल रहा था।
इस अद्भुत चमत्कार को देखकर ग्वालिन ने हाथ जोड़कर भगवान का आभार व्यक्त किया और जीवन में कभी भी झूठ न बोलने का दृढ़ संकल्प लिया। उस दिन के बाद से वह स्वयं भी पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ हरछठ का व्रत रखने लगी।
