Mumbai's First Court: कुछ ऐसी थी मुम्बई की पहली अदालत

Edited By Updated: 02 Jan, 2026 09:31 AM

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Mumbai's First Court: घोड़ों की पीठ पर लदे तुरही व नगाड़ों का नाद था और लाव-लश्कर और चोबदारों और कर्मचारियों के साथ एक लंबा जुलूस धूमधाम से फोर्ट से बाजार गेट होते हुए कस्टम हाऊस के गिल्ड हॉल (अदालत) की ओर बढ़ रहा था। जुलूस में गवर्नर, जस्टिस ऑफ पीस...

Mumbai's First Court: घोड़ों की पीठ पर लदे तुरही व नगाड़ों का नाद था और लाव-लश्कर और चोबदारों और कर्मचारियों के साथ एक लंबा जुलूस धूमधाम से फोर्ट से बाजार गेट होते हुए कस्टम हाऊस के गिल्ड हॉल (अदालत) की ओर बढ़ रहा था। जुलूस में गवर्नर, जस्टिस ऑफ पीस एंड काऊंसिल और अन्य अंग्रेज अफसर सजे-धजे घोड़ों, बग्घियों और पालकियों में विराजमान थे, जबकि अटॉर्नी, मुवक्किल और कारागार अधिकारी पैदल।

यह था 1672 में मुंबई पहली कोर्ट ऑफ एडज्यूडिकेटर के उद्घाटन का नजारा। मौके की सबसे खास बात थी मुंबई और सूरत के गवर्नर औंगियार का भाषण, जिसमें उन्होंने न्यायाधीशों से राजा हो या प्रजा-सबको बगैर किसी भेदभाव के ‘एक ही नजर’ से देखने की अपील की थी, दूसरी ओर सामान्य जनता को भी आश्वस्त किया था कि सरकार के खिलाफ अपनी शिकायतें वे बेखौफ दर्ज करवाएं। मुंबई का ‘असली संस्थापक’ औंगियार को ही कहा जाता है।

परेल में लगी थी मुंबई की पहली अदालत
मुंबई में विधि प्रणाली की शुरूआत 12-13वीं शताब्दी में राजा बिंब के काल में परेल से हुई मानी जाती है। 16वीं सदी में निकटतम हाई कोर्ट वसई में हुआ करता था और उसके निर्णय को भी चुनौती देने की जरूरत आ पड़े तो गोवा जाना पढ़ता था। 1670 में मुंबई में अदालतें दो जगहों-कस्टम हाऊस और माहिम में लगती थीं।

सूरत के गवर्नर जनरल जेराल्ड औंगियार ने पहली औपचारिक अदालत की स्थापना ओल्ड कस्टम हाऊस के पास 8 अगस्त, 1672 को की। अटॉर्नी और बैरिस्टर की प्रणाली थी और धन के आदान-प्रदान का माध्यम सूरत की सोने की मोहरें। कभी मुंबई की सबसे शानदार इमारत रही ग्रेट वैस्टर्न बिल्डिंग को देख आज कोई अंदाज भी नहीं लगा सकता कि यह मौजूदा हाई कोर्ट का पुरखा होगी।
एक वक्त फोर्ट की दक्षिण तरफ सबसे आखिरी यह बिल्डिंग मुंबई की विशालतम पुरानी इमारत और निजी स्वामित्व वाली शहर की सबसे पुरानी (सन् 1715) इमारत हुआ करती थी। 1798 के चार्टर तले गठित रिकॉर्ड्स कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की सीटिंग्ज इसी इमारत में होती थीं।

मुस्लिम और पुर्तगाली शासन के विधि इतिहास का कोई लिखित प्रमाण उपलब्ध न होने से मुंबई का संबंधित इतिहास 1668 के चार्टर से प्रारंभ माना जाता है, जब यह ईस्ट इंडिया कम्पनी के ताबे में आई।  1753 में छोटे मुकद्दमों को निबटाने के लिए कोर्ट ऑफ रिक्वैस्ट बनी। 1773 में रिकॉर्ड्स कोर्ट की स्थापना की गई, जिसे 1824 में सुप्रीम कोर्ट का दर्जा दे दिया गया।

शहर की सबसे पुरानी इमारत
शहीद भगत सिंह मार्ग पर महलनुमा विशाल ग्रेट वैस्टर्न बिल्डिंग ‘मौजूदा हाई कोर्ट के आने से पहले यह मुंबई की हाई कोर्ट बिल्डिंग हुआ करती थी। यह मुंबई की विशालतम पुरानी इमारतों (4505.88 वर्ग मीटर) में और निजी स्वामित्व वाली शहर की सबसे पुरानी (1715) इमारत है। हाई कोर्ट बनने से पहले ग्रेट वैस्टर्न बिल्डिंग ने मुंबई के गवर्नरों के आवास, मुंबई के गवर्नमैंट हाऊस, देश के एडमिरल्टी हाऊस और रिकॉर्ड्स कोर्ट हाऊस के रूप में एक लंबी पारी खेली है। इन रूपों में इसने 1878 तक काम किया, जब तक हाई कोर्ट बन नहीं गया।

सबसे पुरानी ट्रॉयल कोर्ट
आजाद मैदान के ठीक सामने एस्प्लेनेड, मैट्रोपोलिटन, प्रैजीडैंसी मैजिस्ट्रेट या पुलिस कोर्ट शोभा देश का सबसे पुरानी ट्रॉयल कोर्ट कहलाता है। कुर्ला और पोरबंदर पत्थरों से बनी इस इमारत के छज्जों, अटारियों और मीनारों पर नक्काशीदार लुभावने प्रस्तर शिल्प दूर से ही ध्यान खींचते हैं।

खासकर, टस्कन शैली के स्तंभ, पथरीले कोरबेल्स और नक्काशीदार डिजाइन्स। इन शिल्पों में कंधे पर तराजू और कानूनी दांव-पेंच के रूप में दर्शाए गए सांप-नेवले की लड़ाई के दृश्य विशेषकर रोचक बन पड़े हैं। 800 वर्ग फुट लंबाई में मध्य कालीन गोथिक श्रेणी की यह इमारत जॉन ऐडम्स की कृति है। 1889 में पूर्ण हुए इस कोर्ट का निर्माण मंचेरजी मर्झबान ने अपनी देख-रेख में करवाया। अपने किले जैसी संरचना के कारण यह किला कोर्ट भी कहलाता है।

यहां लड़ा था गांधीजी ने पहला मुकद्दमा
स्माल कॉजेज कोर्ट वह स्थान है, जहां दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने ‘सत्य के साथ अपने प्रयोगों’ की शुरुआत की। वह इमारत, जहां गांधी जी ही नहीं, और पाकिस्तान के जनक मोहम्मद अली जिन्ना ने भी एडवोकेट के रूप में अपनी पारी शुरू की।

कलकत्ता और मद्रास की तरह मुंबई में भी लघुवाद न्यायालय 1850 से ही मौजूद है। जॉर्ज विटेट द्वारा पुनर्जागरण शैली की नीले कुर्ला पत्थर और मालाड पत्थरों पर गढ़ी यह कलाकृति की सबसे बड़ी शोभा है उसकी शिल्पकारी, खासकर खूबसूरत छज्जे।

पत्थरों से बनी चार मंजिल की यह इमारत 1818 में पूर्ण हुई तब उस पर 11.06 लाख रुपए की लागत आई थी। प्रशस्त कोर्ट रूम्ज, चौड़े-चौड़े  कारिडोर, चक्करदार सीढ़ियां, गोल काउंटर्स, पुराने जमाने की लिफ्ट्स-वक्त की ज्यादतियां सहते हुए भी अब तक न तो चार मंजिला इस इमारत की बुलंदी में कोई फर्क आया है, न शान और सुंदरता में।

सेक्रेटेरियट से कोर्ट
मुंबई आज देश की कारोबारी राजधानी है तो इसका एक बड़ा श्रेय सर हेनरी बार्टल एडवर्ड  प्रसेयर को भी जाता है, जो ईस्ट इंडिया कम्पनी का शासन खत्म होने के बाद यहां गवर्नर बने थे। यही सर प्रसेयर काला घोड़ा के पास ओवल मैदान के पूर्वी हिस्से में स्थित ओल्ड सेक्रेटेरियट बिल्डिंग के निर्माता हैं, जो सिटी सिविल एंड सैशन कोर्ट का स्थान है।

1865-74 के दौरान वेनेशियन गोथिक शैली में निर्मित इस इमारत की डिजाइन उस जमाने के जाने-माने वास्तुकार कर्नल हेनरी सेंट क्लेयर विल्कस की बनाई हुई है। केंद्रीय सीढ़ी पर ऊंचे टावर के साथ मेहराबदार बरामदे और पत्थरों पर बेहतरीन नक्काशी आज भी ध्यान खींचते हैं।

सिटी सिविल एंड सेशन कोर्ट की अदालतें संख्या चार शुरू में मुंबई हाई कोर्ट की एनेक्सी बिल्डिंग में स्थित थीं, जो 1967 में ओल्ड सेक्रेटेरियट बिल्डिंग में स्थानांतरित कर दी गईं। 1972 में नए एनेक्सी भवन का निर्माण किया गया। वर्ष 1985 या उसके आसपास, पुलिस महानिरीक्षक के कार्यालय को हटाकर ओल्ड सेक्रेटेरियट बिल्डिंग का प्रमुख हिस्सा अदालत को उपलब्ध कराया गया था। फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना 2003 में शिवडी में की गई।

फोर्ट स्थित इस कोर्ट का मौजूदा क्षेत्राधिकार कोलाबा से माहिम और मुलुंड तक है। उपनगरों में अदालती मामलों की संख्या में वृद्धि को ध्यान में रखते हुए कोर्ट की दिंडोशी शाखा 2007 में शुरू हुई, जिसका क्षेत्राधिकार बांद्रा से दहिसर तक है।     
     
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