Ramayana story: जब हनुमान जी ने किया लंका दहन...

Edited By Updated: 12 Aug, 2023 09:57 AM

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मेघनाद ने श्री हनुमान जी को रावण के सामने लाकर खड़ा कर दिया। हनुमान जी ने देखा कि राक्षसों का राजा रावण बहुत ही ऊंचे सोने के सिंहासन पर बैठा हुआ है।

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Ramayana story: मेघनाद ने श्री हनुमान जी को रावण के सामने लाकर खड़ा कर दिया। हनुमान जी ने देखा कि राक्षसों का राजा रावण बहुत ही ऊंचे सोने के सिंहासन पर बैठा हुआ है। उसके आस-पास बहुत से बलवान योद्धा और मंत्री आदि बैठे हुए हैं लेकिन रावण के इस प्रताप और वैभव का हनुमान जी पर कोई असर नहीं पड़ा। वह वैसे ही निडर खड़े रहे।

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हनुमान जी को इस प्रकार अपने सामने अत्यंत निर्भय और निडर खड़े देख कर रावण ने पूछा, ‘‘बंदर ! तू कौन है ? किसके बल के सहारे वाटिका के पेड़ों को तुमने नष्ट किया है ? राक्षसों को क्यों मारा है ? क्या तुझे अपने प्राण का डर नहीं है ? मैं तुझे बहुत निडर और उद्दंड देख रहा हूं।’’

हनुमान जी ने कहा, ‘‘जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी हैं, मैं उन्हीं भगवान श्रीराम चंद्र जी का दूत हूं। तुम चोरी से उनकी पत्नी का हरण कर लाए हो। उन्हें वापस कर दो, इसी में तुम्हारा और तुम्हारे परिवार का कल्याण है।’’

‘‘यदि तुम यह जानना चाहते हो कि मैंने अशोक वाटिका के फल क्यों खाए, पेड़ आदि क्यों तोड़े, राक्षसों को क्यों मारा तो मेरी बात सुनो। मुझे बहुत जोर की भूख लगी थी, अत: मैंने वाटिका के फल खा लिए। बंदर-स्वभाव के कारण कुछ पेड़ टूट गए। अपनी देह सबको बहुत प्यारी होती है, तो जिन लोगों ने मुझे मारा, उन्हें मैंने भी मारा। इसमें मेरा क्या दोष है ? लेकिन इसके बाद भी तुम्हारे पुत्र ने मुझे बांध रखा है।’’

रावण को बहुत ही क्रोध चढ़ आया। उसने राक्षसों को हनुमान जी को मार डालने का आदेश दिया। राक्षस उन्हें मारने दौड़े लेकिन तब तक विभीषण ने वहां पहुंच कर रावण को समझाया कि यह तो दूत है। इसका काम अपने स्वामी का संदेश पहुंचाना है। इसका वध करना उचित नहीं होगा। इसे कोई अन्य दंड देना ही ठीक होगा।

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यह सलाह रावण को पसंद आ गई। उसने कहा, ‘‘ठीक है। बंदरों को अपनी पूंछ से बड़ा प्यार होता है। इसकी पूंछ पर कपड़े लपेट कर, तेल डालकर आग लगा दो। जब यह बिना पूंछ का होकर अपने स्वामी के पास जाएगा, तब फिर उसे भी साथ लेकर लौटेगा।’’

 यह कहकर वह जोर से ठठाकर हंसा। रावण का आदेश पाकर राक्षस हनुमान जी की पूंछ पर तेल से भिगो-भिगोकर कपड़े लपेटने लगे। अब तो हनुमान जी ने बड़ा ही मजेदार खेल किया। वह धीरे-धीरे अपनी पूंछ बढ़ाने लगे। अंत में ऐसा हुआ कि पूरी लंका में कपड़े, तेल, घी आदि कहीं बचे ही नहीं। तब राक्षसों ने तुरन्त उनकी पूंछ में आग लगा दी। पूंछ में आग लगते ही हनुमान जी फुर्ती से उछलकर एक ऊंची अटारी पर जा पहुंचे। वहां से चारों ओर कूद-कूद कर वह लंका को जलाने लगे। देखते ही देखते पूरी नगरी आग की विकराल लपटों में घिर गई। सभी राक्षस, राक्षसियां जोर-जोर से रोने और चिल्लाने लगे। वे सबके-सब रावण की निंदा कर रहे थे। रावण को आग बुझाने का कोई उपाय न सुझाई दे रहा था। हनुमान जी की सहायता करने के लिए पवन देवता भी जोर-जोर से बहने लगे। थोड़ी ही देर में पूरी लंका जलकर नष्ट हो गई। हनुमान जी ने केवल विभीषण का घर छोड़ दिया। उसे नहीं जलाया।

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