यहां शिव-पार्वती की प्रतिमाओं से आती है ठंडी हवा, भीषण गर्मी में भी पुजारी ओढ़ते हैं कंबल

Edited By Updated: 04 Oct, 2020 06:12 PM

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प्रचंड ठंड का असर अब खत्म होता नज़र आ रहा है यानि कि अभी से गर्मी का एहसास शुरू हो चुका है। और मार्च आते-आते तक ठंडी जगह ढूंढना शुरू कर देंगे।तो इसलिए आज हम आपको उड़ीसा के एक शिव मंदिर के दर्शन करवाएंगे। जहां पर शिवलिंग से ठंडी हवा निकलती है। सुनकर...

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प्रचंड ठंड का असर अब खत्म होता नज़र आ रहा है यानि कि अभी से गर्मी का एहसास शुरू हो चुका है। और मार्च आते-आते तक ठंडी जगह ढूंढना शुरू कर देंगे।तो इसलिए आज हम आपको उड़ीसा के एक शिव मंदिर के दर्शन करवाएंगे। जहां पर शिवलिंग से ठंडी हवा निकलती है। सुनकर यकीन नहीं होगा। लेकिन ये सच है। उड़ीसा के टिटलागढ़ शहर में स्थित इस शिव मंदिर में चौबीसों घंटे शिवलिंग से ठंडी हवा निकलती रहती है। बता दें कि इस मंदिर में Ac तो क्या पंखे का इंतजाम नहीं है। इसके बावजूद भी इस मंदिर में इतनी ठंड होती है कि पुजारियों को भीषण गर्मी में भी कंबल ओढ़ना पड़ता है।
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मंदिर उड़ीसा के कुम्हड़ा पहाड़ के एक हिस्से में बना हुआ है। पथरीली चट्टानों वाले इस पहाड़ की ऊंचाई पर तापमान 55 डिग्री तक जाता है। लेकिन इस मंदिर में एसी से भी ज्यादा ठंडक रहती है। मंदिर में भगवान शिव-पार्वती मूर्ति स्थापित की गई है। मंदिर के पुजारियों के अनुसार मान्यता है कि यहां स्थापित देवप्रतिमाओं से ही ठंडक आती है। मंदिर के बाहर के वातावरण में जैसे-जैसे धूप बढ़ती है, वैसे-वैसे मंदिर के अंदर ठंड बढ़ती जाती है।

पुजारी बताते हैं कि मंदिर का दरवाजा बंद करने पर उस ठंडी हवा से पूरा मंदिर ठंडा हो जाता है। पंडित को कई बार कंबल भी ओढ़ना पड़ जाता है। जबकि उसी वक्त अगर कोई आदमी मंदिर के बाहर 5 मिनट भी खड़ा हो जाए तो वह पसीने से नहा जाएगा। हालांकि आज तक इसका कोई स्पष्ट कारण पता नहीं लग पाया है।
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तो वहीं दक्षिण भारत में एक और शिव मंदिर है जिसकी बनावट बाकी मंदिरों से बिल्कुल अलग है। आपको बता दें कि ये अद्भुत मंदिर बड़ और पीपल के पेड़ पर बना है। शायद आपको जानकर हैरानी होगी लेकिन जी हां बड़ और पीपल के पेड़ पर बना ये मंदिर करीब 300 साल पुराना है। लोग यहां शिव जी पूजा-अर्चना और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए आते हैं। और ये मंदिर देश भर में जगरामेश्वर शिव मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है।
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पौराणिक मान्यताओं के अनुसार बड़ और पीपल के पेड़ के तने से बने हुए इस मंदिर के निर्माण को लेकर एक कथा प्रचलित है। जो इस प्रकार है कि यहां एक पुजारी तपस्या में लीन थे। इसी दौरान उन्हें ऊपर से एक मंदिर गुज़रने का आभास हुआ। पुजारी ने अपनी तपस्या की शक्ति के दम पर मंदिर को वहीं उतार लिया और जगराम दुर्ग के पास स्थापित किया। ऐसा कहा जाता है कि ये मंदिर पेड़ पर ही उतरा गया था। जिसके बाद सन 1765 में इस मंदिर में महादेव की मूर्ति स्थापित कर इसका नाम जगरामेश्वर रखा गया। इसके साथ ही मंदिर में शिव परिवार की भी स्थापना की गई। बता दें कि मंदिर करीब 20 से 25 फीट की ऊंचाई पर है। इसके अंदर जाने के लिए सीढियां का इस्तेमाल होता है।

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