विनोबा भावे की इस कहानी से सीखें प्रेम, समानता और सेवा का असली अर्थ

Edited By Updated: 22 Jun, 2026 01:13 PM

vinoba bhave story

बाल्यकाल में विनोबा भावे का एक मित्र भी उनके घर में साथ रहा करता था। कभी-कभी घर में बासी भोजन बच जाता था। उनकी माता भोजन फेंकने के विरुद्ध थीं, इसलिए बचा भोजन मिल-जुलकर थोड़ा-थोड़ा खा लिया जाता था।

Vinoba Bhave Story : बाल्यकाल में विनोबा भावे का एक मित्र भी उनके घर में साथ रहा करता था। कभी-कभी घर में बासी भोजन बच जाता था। उनकी माता भोजन फेंकने के विरुद्ध थीं, इसलिए बचा भोजन मिल-जुलकर थोड़ा-थोड़ा खा लिया जाता था। ऐसे अवसर पर माता विनोवा को बासी भोजन देकर उनके मित्र को ताजा खिलाने का प्रयास करती थीं। हालांकि विनोबा को इस पर कोई आपत्ति नहीं थी।

एक दिन मजाक में उन्होंने मां से कहा, 'मां, आपके मन में अभी भेद है।' मां प्रश्नवाचक दृष्टि से उनकी ओर देखने लगीं। विनोबा ने हंसते हुए कहा, 'मां, देखो न, आप मुझे बासी भोजन देती हैं और मेरे साथी को ताजा।' 

मां की उदारता को पक्षपात कहकर विनोबा ने मजाक किया था, किंतु माता ने उसे दूसरे ढंग से लिया। बोलीं, 'बेटा, तू ठीक कहता है। मानवीय दुर्बलताएं मुझमें भी हैं। तुझमें अपना बेटा दिखता है तथा तुम्हारे मित्र में अतिथि, जोकि भगवान का रूप होता है इसलिए यह पक्षपात हो जाता है। 

तुझे बेटा मानने के कारण तेरे प्रति अनेक प्रकार का स्नेह मन में उठता है। जब तुझे भी सामान्य दृष्टि से देख सकूंगी, तब पक्षपात की आवश्यकता नहीं रह जाएगी। बात कहीं की कहीं पहुंच गई थी, पर विनोबा को प्रसन्नता हुई। माता का एक और उज्ज्वल पक्ष उनके सामने आया। बालक विनोबा ने माता की शिक्षा गांठ बांध ली और जीवनभर इस पर अमल करते रहे।

शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ
 


 

Related Story

    img title
    img title

    Be on the top of everything happening around the world.

    Try Premium Service.

    Subscribe Now!