Edited By Mansi,Updated: 25 Jul, 2026 10:22 AM
फिल्म द इंडिया स्टोरी के बारे में श्रेयस तलपड़े ने पंजाब केसरी, नवोदय टाइम्स, जगबाणी और हिंद समाचार से खास बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश...
नई दिल्ली/टीम डिजिटल। देशभर में खाने-पीने की चीजों में मिलावट, रासायनिक खाद और कीटनाशकों के बढ़ते इस्तेमाल जैसे गंभीर मुद्दों पर आधारित फिल्म 'द इंडिया स्टोरी’ 24 जुलाई को सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। फिल्म में काजल अग्रवाल और श्रेयस तलपड़े मुख्य भूमिका में नजर आ रहे हैं। फिल्म को चेतन डीके द्वारा डायरेक्ट किया गया है। फिल्म द इंडिया स्टोरी के बारे में श्रेयस तलपड़े ने पंजाब केसरी, नवोदय टाइम्स, जगबाणी और हिंद समाचार से खास बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंश...
सवाल 1: आपकी फिल्म द इंडिया स्टोरी एक बेहद गंभीर सामाजिक मुद्दे पर आधारित है। एक कलाकार के तौर आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या थी?
सबसे पहले तो विषय का महत्वपूर्ण होना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि उस विषय को दर्शकों तक किस तरह पहुंचाया जाए। किसी भी बड़े मुद्दे पर बात करनी हो तो उसके लिए एक मजबूत कहानी चाहिए। आखिरकार यह एक फिल्म है, डॉक्यूमेंट्री नहीं। दर्शक फिल्म देखकर सिर्फ जानकारी नहीं, बल्कि एक अनुभव और संदेश भी लेकर जाएं, यही सबसे अहम बात होती है।
इस फिल्म में जिस तरह 'स्लो पॉइजन' के मुद्दे को कहानी के माध्यम से दिखाया गया है, वह आपको सोचने पर मजबूर करता है। कई बार हम किसी समस्या को सामान्य मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन जब उसके गंभीर परिणाम सामने आते हैं तो उसकी भयावहता समझ में आती है। मुझे निर्देशक का विजन और उनका इरादा बहुत साफ लगा। मैंने उनके साथ कई बार कहानी पर चर्चा की, अलग-अलग ड्राफ्ट सुने और जब लगा कि इस कहानी की आत्मा सही दिशा में है, तभी इस फिल्म का हिस्सा बनने का फैसला किया।
सवाल 2: आपने अपने करियर में कॉमेडी से लेकर गंभीर किरदार निभाए हैं। ऐसे अलग-अलग किरदारों की तैयारी में क्या फर्क होता है?
एक अभिनेता के तौर पर यही हमारा काम है। चाहे कॉमेडी हो या गंभीर भूमिका, दोनों के लिए लगातार ऑब्जर्व करना पड़ता है। मैंने थिएटर से अभिनय सीखा है और वहां हमें सिखाया जाता था कि सुबह आंख खुलते ही आपका अभ्यास शुरू हो जाता है। अपने आसपास के लोगों को देखिए, उनकी आदतें, व्यवहार और परिस्थितियों को समझिए। कई बार कॉमेडी में भी ट्रेजेडी दिखाई देती है और ट्रेजेडी में भी हास्य के पल मिल जाते हैं। मैं किसी भी किरदार के लिए स्क्रिप्ट कई बार पढ़ता हूं। उसके व्यक्तित्व, सोच, बैकस्टोरी और जीवन को समझने की कोशिश करता हूं। कई बार बैकस्टोरी लिखी होती है, कई बार नहीं होती, तब हमें खुद उसे गढ़ना पड़ता है। इसके बाद सह-कलाकारों के साथ रिहर्सल होती है। अगर किरदार की कोई विशेष जरूरत हो, जैसे सांकेतिक भाषा सीखना, किसी खेल की ट्रेनिंग लेना या किसी विशेष कौशल की तैयारी करना, तो वह भी की जाती है।
सवाल 3: इतने वर्षों के अनुभव के बाद भी क्या हर किरदार के लिए अलग तैयारी करनी पड़ती है?
बिल्कुल। अनुभव अपनी जगह है, लेकिन हर किरदार अलग होता है। जब भी मैं कोई नया किरदार निभाता हूं तो पूरी तरह उसी पर फोकस करता हूं। लोगों से बातचीत करता हूं, उनकी भावनाओं को समझता हूं। जब कोई अपनी कहानी सुनाता है तो उसकी आंखों में देखकर समझ आता है कि वह किस दर्द या भावना से गुजर रहा है। वही छोटी-छोटी बातें अभिनय में काम आती हैं। मेरा मानना है कि अभिनय का सबसे बड़ा अभ्यास लोगों को समझना है।
सवाल 4 : हर कलाकार की जिंदगी में कोई न कोई प्रेरणा होती है। आपके लिए सबसे बड़ी प्रेरणा कौन रहे हैं?
अगर बचपन की बात करूं तो अमिताभ बच्चन सर की पूरी यात्रा मेरे लिए सबसे बड़ी प्रेरणा रही है। हमने उनका सुपरस्टार बनना भी देखा और वह दौर भी देखा जब उनकी फिल्में नहीं चल रही थीं। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी, खुद को दोबारा स्थापित किया और फिर इतिहास रच दिया।
ऐसी कहानियां कलाकारों को उम्मीद देती हैं। जब आपके जीवन में असफलता आती है तो आप सोचते हैं कि अगर अमिताभ बच्चन जैसे महान कलाकार वापसी कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं? यही विश्वास आपको आगे बढ़ाता है। मराठी सिनेमा में नाना पाटेकर सर की यात्रा भी मेरे लिए बेहद प्रेरणादायक रही है। उन्होंने भी संघर्ष किया, सीखा और अपने दम पर एक अलग पहचान बनाई।
सवाल 5 : आज जब आप किसी फिल्म या किरदार का चुनाव करते हैं तो इसे लेकर आपका नजरिया कितना बदल चुका है?
मेरे लिए सबसे जरूरी बात यह होती है कि उस किरदार में कुछ नया और चुनौतीपूर्ण हो। ऐसा लगे कि उसमें मैं एक अभिनेता के तौर पर कुछ अलग कर सकता हूं या कुछ नया खोज सकता हूं। अगर किसी भूमिका में वह रोमांच नहीं है तो उसे करने में उतना मजा नहीं आता। मुझे लगता है कि यह सोच थिएटर से आई है। थिएटर के दिनों में जब हम कोई कहानी पढ़ते या सुनते थे तो मन में तुरंत आता था कि यह किरदार मैं निभाना चाहूंगा। कई बार गुरुजी वही भूमिका दे देते थे और कई बार कोई दूसरी। लेकिन अगर दूसरी भूमिका मिलती थी तो कोशिश रहती थी कि उसे इतनी अच्छी तरह निभाऊं कि लोगों को लगे कि मुझे वही बड़ा किरदार मिलना चाहिए था। शायद वही प्रतिस्पर्धी सोच आज भी मेरे अंदर है। फिल्म चुनते समय मैं देखता हूं कि उस किरदार में अभिनय की कितनी गुंजाइश है। मैं उसे एक चुनौती की तरह लेता हूं कि इसमें मैं क्या नया कर सकता हूं।
सवाल : फिल्म इंडस्ट्री में कलाकारों को अक्सर एक ही तरह के किरदारों में टाइपकास्ट कर दिया जाता है। आपके अनुसार इसे कैसे बदला जा सकता है?
मेरा मानना है कि हर दौर में कोई न कोई ऐसा निर्देशक जरूर होता है जो कलाकार को अलग नजरिए से देखता है। जैसे India Story में निर्देशक अभिजीत ने मुझे एक अलग तरह के किरदार में देखा। मेरी शुरुआत गंभीर भूमिकाओं से हुई थी, उसके बाद मैंने कॉमेडी भी की। ऐसे में लोग सोचने लगते हैं कि यह अभिनेता सिर्फ कॉमेडी करेगा या सिर्फ गंभीर किरदार निभाएगा। लेकिन कोई न कोई ऐसा इंसान होता है जो उस दायरे से बाहर सोचता है। उस समय कलाकार को भी जोखिम उठाना पड़ता है। आपको वह मौका पकड़ना होता है और उस पर भरोसा करना होता है। कोई हमेशा आपका हाथ पकड़कर आपको नई दिशा में नहीं ले जाएगा। मेरा मानना है कि कलाकार को अपना खुद का बेंचमार्क बनाना चाहिए।
सवाल : इस फिल्म ने आपकी निजी जिंदगी और लाइफस्टाइल पर कितना असर डाला?
सच कहूं तो इस फिल्म ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया। महाराष्ट्र में जिस तरह से खाने-पीने की चीजों को लेकर लगातार खुलासे हो रहे हैं चाहे बड़े ब्रांड हों, दूध हो, पनीर हो या दूसरी खाद्य सामग्री उसे देखकर डर लगता है।
जब मैंने इस फिल्म की स्क्रिप्ट पढ़ी तो उसके बाद मेरे मन में हमेशा यही सवाल रहने लगा कि आखिर मैं क्या खा रहा हूं। प्लेट में जो खाना रखा है, वह कितना सुरक्षित है, इसकी कोई गारंटी नहीं है। यह डर मेरे साथ रह गया। अगर मेरी लाइफस्टाइल की बात करें तो मैंने लगभग 90 प्रतिशत डेयरी प्रोडक्ट्स कम कर दिए हैं। दूध, पनीर जैसी चीजें बहुत कम कर दी हैं क्योंकि आज के समय में यह भरोसा करना मुश्किल हो गया है कि हम जो खा रहे हैं वह पूरी तरह शुद्ध है।
सवाल : आपकी फिल्म सिर्फ समस्या नहीं दिखाती, बल्कि समाधान की तरफ भी इशारा करती है। आपके अनुसार इस समस्या से निकलने का रास्ता क्या है?
हमारी कोशिश यही है कि फिल्म देखने के बाद लोग जागरूक हों और अपने परिवार के लिए सुरक्षित भोजन की मांग करें। लोग यह सवाल उठाएं कि उन्हें क्या खिलाया जा रहा है और जो खाद्य सामग्री बाजार में उपलब्ध है, वह कितनी सुरक्षित है।
मुझे लगता है कि सरकार को भी किसानों को ऑर्गेनिक खेती के लिए अधिक प्रोत्साहन और सब्सिडी देनी चाहिए। आज किसान कई बार मजबूरी में रासायनिक खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं। अगर उन्हें बेहतर विकल्प और आर्थिक सहयोग मिलेगा तो वे भी सुरक्षित खेती की ओर बढ़ेंगे। इस फिल्म के जरिए किसानों तक भी यह संदेश पहुंचेगा कि जिन रसायनों का इस्तेमाल किया जा रहा है, वे सिर्फ उपभोक्ताओं के लिए ही नहीं बल्कि किसानों के लिए भी नुकसानदायक हैं।
सवाल : आपके आने वाले प्रोजेक्ट्स कौन-कौन से हैं?
फिलहाल मेरी फिल्म गोलमाल पर थोड़ा-सा काम बाकी है। उम्मीद है कि यह फिल्म इस साल के अंत तक या अगले साल रिलीज होगी। इसके अलावा स्नैप नाम की एक और फिल्म है उम्मीद है कि वह भी इस साल के अंत तक दर्शकों के सामने आ जाएगी। फिलहाल यही दो प्रोजेक्ट्स मेरे हाथ में हैं।