Edited By Tanuja,Updated: 19 Jan, 2026 06:47 PM

पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस (PIA) के निजीकरण से सरकारी घाटा तो रुका, लेकिन इसकी भारी कीमत करदाताओं को चुकानी पड़ी। रिपोर्ट के अनुसार सरकार ने अरबों का कर्ज खुद उठाकर एयरलाइन बेची, जिससे यह सौदा नैतिक और आर्थिक रूप से विवादित बन गया।
Islamabad: पाकिस्तान इंटरनेशनल एयरलाइंस (PIA) के वर्ष 2025 में हुए निजीकरण ने भले ही एयरलाइन के रोज़ाना हो रहे घाटे को रोक दिया हो, लेकिन इसकी नैतिक और आर्थिक कीमत पाकिस्तान के करदाताओं को चुकानी पड़ी है। यह दावा एक नई रिपोर्ट में किया गया है। एक्सप्रेस ट्रिब्यून में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, सरकार द्वारा यह दावा करना कि आरिफ हबीब के नेतृत्व वाले कंसोर्टियम ने PIA की 75 प्रतिशत हिस्सेदारी 135 अरब पाकिस्तानी रुपये में खरीदी, भ्रामक और गुमराह करने वाला है। रिपोर्ट के लेखक और पाकिस्तान के पूर्व वाणिज्य मंत्री डॉ. मोहम्मद जुबैर खान का कहना है कि इस सौदे की संरचना ऐसी है कि 135 अरब रुपये में से अधिकांश रकम सरकार तक पहुंचती ही नहीं।
उनके अनुसार, पाकिस्तान सरकार को वास्तविक बिक्री मूल्य के तौर पर सिर्फ 10.125 अरब रुपये मिलेंगे। शेष 124.875 अरब रुपये बिक्री के बाद एयरलाइन में डाले जाएंगे। इसके अलावा, खरीदार समूह ने अपनी संपत्ति के मूल्य में अलग से 80 अरब रुपये निवेश करने की प्रतिबद्धता जताई है, जिससे सरकार को कोई सीधा लाभ नहीं होगा। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि PIA को “बेचने योग्य” बनाने के लिए सरकार ने पहले ही 654 अरब रुपये की देनदारियां अपने ऊपर ले ली थीं। इन सबको जोड़ने पर सरकार ने वास्तव में करीब 644 अरब रुपये खर्च कर एयरलाइन से छुटकारा पाया। डॉ. जुबैर खान ने इसे “घाटे में किया गया विनिवेश” बताया है, जिसका उद्देश्य केवल भविष्य में दी जाने वाली सब्सिडी को रोकना था।
रिपोर्ट में अधिकारियों की “रिवॉल्विंग डोर” भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। इसमें कहा गया है कि सरकार ने वाणिज्यिक कर्ज को 12 प्रतिशत निश्चित ब्याज पर संप्रभु गारंटी वाले बॉन्ड में बदल दिया, जिससे बैंकों को PIA के भविष्य से परे सुनिश्चित मुनाफा मिल गया। यह भी कहा गया है कि यदि न्यूयॉर्क स्थित रूजवेल्ट होटल एक अरब डॉलर में बिक भी जाता है, तो वह केवल ब्याज भरपाई के लिए पर्याप्त होगा, जबकि मूल राशि का बोझ अंततः करदाताओं पर ही रहेगा। रिपोर्ट के मुताबिक, यदि होटल पुनर्विकास में आठ साल लगते हैं, तो सरकार को इस दौरान 256 अरब रुपये का अतिरिक्त ब्याज देना होगा, जिससे संपत्ति का मूल्य बनने से पहले ही खत्म हो जाएगा।