भवसागर को पार करने के लिए अपनाएं ये साधन

Edited By ,Updated: 04 Apr, 2016 04:43 PM

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संसार की सम्पूर्ण चिंताओं के मूल में वासना है। उन्हें रोकने का एकमात्र उपाय उनके यथार्थ स्वरूप का चिंतन है। वासना जन्य चिंताएं हमारी अशांति का कारण हैं। इसकी एकमात्र औषधि है आत्मचिंतन। आत्मचिंतन सभी शक्तियों का मूल है, आनंद का स्रोत है तथा संयम का

संसार की सम्पूर्ण चिंताओं के मूल में वासना है। उन्हें रोकने का एकमात्र उपाय उनके यथार्थ स्वरूप का चिंतन है। वासना जन्य चिंताएं हमारी अशांति का कारण हैं। इसकी एकमात्र औषधि है आत्मचिंतन। आत्मचिंतन सभी शक्तियों का मूल है, आनंद का स्रोत है तथा संयम का एकमात्र साधन है। मानव संयम के बिना हमें मानव कहलाने का अधिकार नहीं है। इसलिए मनुष्य को प्रत्येक परिस्थिति में संयम बनाए रखकर अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। 
 
मानव शरीर बड़ी साधना और तपस्या के पश्चात मिलता है। यह ईश्वरी प्रसाद भी है। भवसागर को पार करने के लिए यह शरीर एक दृढ़ नौका के समान है। जो मनुष्य इस साधन का उपयोग करके भवसागर से पार नहीं उतरता, वह आत्मघाती है। आज धन-सम्पत्ति को सबसे अधिक महत्व दिया जा रहा है। सारी राजनीतिक व्यवस्था के मूल में अर्थव्यवस्था ही है। 
 
 

मानव के लिए अर्थोपासना ही आज सर्वस्व है। अर्थप्राप्ति और विनाश में ही सुख-दुख की कल्पना निहित है परंतु अर्थ की प्राप्ति से अर्थाभाव जन्य कष्टों का निवारण नहीं हो सकता क्योंकि अर्थ प्राप्ति आवश्यकताओं को जन्म देती है। 

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